28 September 2012

जादू की घुड़सवारी

कल जब पापा ऑफिस से लौटे तो मैंने उन्‍हें एक पुराना प्रॉमिस याद दिलाया। लास्‍ट वीक में जब मैं पापा के साथ 'सावरकर उद्यान' गया था, तो वहां बड़ा मज़ा आया था। लेक में मछलियां देखीं। लोग मछलियों को ब्रेड के टुकड़े खिला रहे थे। फिर वहां मैं बहुत दौड़ा। स्‍लाइड पर मस्‍ती की। झूला झूला। धमाचौकड़ी की। और हमेशा की तरह लास्‍ट में बलून लेकर वापस आ गया।

जब हम बलून ले रहे थे तो पापा ने कहा था कि बेटा अगली बार आपको घोड़े की सवारी करायेंगे।

ओर पापा भूल गये.....
कल जैसे ही दफ्तर से लौटे तो मैंने याद दिलाया पापा हॉर्स की सवारी करने कब चलना है, 'लकड़ी की काठी/ काठी पे घोड़ा..../ घोड़े की दुम पर जो मारा थथौड़ा'। हा हा हा। मैं जब भी 'थथौड़ा' गाता हूं तो मम्‍मा-पापा कहते हैं--थथौड़ा नहीं हथौड़ा।

जब हम तैयार होकर निकले तो हमेशा की तरह मैं सबसे पहले बिल्डिंग में रेस करने लगा। और जब दौड़ते हुए थक गया तो देखिए कैसे बैठ गया। अरे नहीं नहीं ग़लत मत समझिए....मैं कोई 'गड़बड़' नहीं करने जा रहा हूं। 


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जब पापा ने कहा, जल्‍दी करो, अंधेरा हो जायेगा। तो देखिए मैंने किस तरह मुंह चिढ़ाया। मुंह चिढ़ाना मैंने स्‍कूल में अपने फ्रेंन्‍ड्स से सीखा है। नाम बताऊं.....आलिया, अनुश्री, केविन, शिवाली और रणबीर।

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जब देखा कि मेरी मस्‍ती खत्‍म नहीं होगी, तो मम्‍मा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। और देखिए मैं कितनी 'शराफत' से जा रहा हूं सावरकर पार्क।
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वहां पहुंचते ही गेट पर खड़े घोड़े वाले अंकल दिख गये। पापा ने एक ऊंचा घोड़ा चुना और उस पर मुझे बैठा दिया गया। सबसे पहले बिना पकड़े।

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इसके बाद फौरन ही पापा ने पकड़ लिया। और हमने बोरीवली की एक कम बिज़ी सड़क पर घोड़े की सवारी की। घोड़ा अपनी पूंछ से मेरी पीठ पर गुदगुदी लगा रहा था। बड़ा मज़ा आया। पहले तो मुझे डर लगा, पर फिर बहुत म़ज़ा आया। पापा ने मुझे कसकर पकड़ रखा था।
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सैर पूरी होने के बाद मैंने घोड़े को और घोड़े वाले अंकल को थैंक-यू कहा।
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फिर एक बलून ख़रीदा और एक पुंगी भी। अब मैं घर पर पुंगी बजा बजाकर सबकी नींद और चैन हराम कर रहा हूं। जब गणेश-विसर्जन होगा ना कल, तो पुंगी मिलेगी, बाज़ार में। आप भी ख़रीदीयेगा और बजाईयेगा। अब मैं चलता हूं।
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12 September 2012

विलेज-मार्केट, गोट, हेन और फिश।

मुंबई के गोराई इलाक़े में है एक खाड़ी।
अरब सागर के समुद्र का हुक जैसे पतला हिस्‍सा।
उस पार है एस्‍सेल वर्ल्‍ड। और गोराई गांव। मनोरी गांव और अन्‍य छोटी बस्तियां। इस पार बोरीवली पश्चिम का इलाक़ा है।

ठीक खाड़ी पर सप्‍ताह के कुछ दिना विलेज-मार्केट लगता है। और अकसर मैं पापा के साथ वहां जाता हूं। सब्जियां ख़रीदने के लिए।
इस बार तो बड़ा मज़ा आया। आज सबेरे जब मैं वहां पहुंचा तो मेरा इंतज़ार कर रही थी एक GOAT. मुझे जानवर बहुत पसंद हैं। गोट देखते ही मैं उसकी तरफ भागा और उससे हाय किया। मैंने पूछा, हाय गोट कैसी हो। उसने बताया कि मैं ठीक ही हूं।


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मैंने पूछा, ठीक ही हो, मतलब। तो गोट बोली--असल में आजकल उसके खाने-पीने को कुछ नहीं मिलता। बस काग़ज और पॉलीथीन मिलते हैं। इसलिए वो सब्जियां खाने के चक्‍कर में विलेज मार्केट आ जाती है।

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ये सुनकर मैंने कहा, अरे तुमने पहले बताया होता। आइंदा भूख लगे तो मेरी बिल्डिंग में आ जाना। मैं तुम्‍हें हरी घास खिलवाऊंगा। और अगर तुम्‍हें चाहिए तो रोटी भी दे सकता हूं। गोट बहुत खुश हो गयी।

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गोट से बाय करने के बाद मैं आगे बढ़ा ही था कि वहां एक मुर्गी मिल गयी। अरे H FOR HEN…HEN.और एक मुर्गा़ भी। बस कुकडूं-कूं करके वो मेरे साथ खेलने लगे। उसका फोटो नहीं ले पाया। क्‍योंकि वो तो भागे जा रहे थे। आगे खाड़ी है। वहां बहुत सारा पानी है। पता है आजकल मुंबई में बारिश बहुत हो रही है। इसलिए पानी बहुत भर गया है। मैंने पापा से बताया, देखिए पापा सारे समुद्दर भर गये हैं। देखा....। और दूर एक बोट जा रही है। ध्‍यान से देखिए इस फोटो में।
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मैं तो जादू हूं ना। मुझे तो सब पता है। इसलिए मैंने पापा को बताया कि इस खाड़ी में एक क्रोकोडाइल रहता है। वो फिश को खा जाता है। पता है मुझे कैसे पता चला। अरे पंचतंत्र वाली डीवीडी से। मैं अकसर देखता हूं ना। तो यहां समुद्दर में सारी फिश क्रोकोडाइल ने खा ली हैं। और  पता है यहां एक मंकी आता है। वो क्रोकोडाइल पर जंप लगा देता है। ......................मैं स्‍टोरी सुना रहा था और पापा मोबाइल से
फोटो ले रहे थे।

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पता है वहां दूर उस किनारे पर एक विपश्‍यना पैगोडा भी है। वो उस पार। मैंने पापा से कहा है मुझे वहां ले चलें।

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पता है ये वही फिश है जो क्रोकोडाइल ने खा ली थी। देखिए कितनी बड़ी बड़ी फिश।
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यहां सब्जियां, फिश, क्रैब सब बिकता है।

मैंने सब्जियां लीं। और घर आ गया। आपने देखा। मैं पॉलीथीन का इस्‍तेमाल नहीं करता। कपड़े का थैला लेकर जाता हूं। अच्‍छा अब ब्रेक-फास्‍ट तैयार है। मैं तो चला। आप भी ब्रेक-फास्‍ट कर लीजिए। और बताईये आपने क्‍या खाया।
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अरे हां। सायकिल वाली फोटोज़ कल।
एक बात तो कहना भूल ही गया---मैं जादू हूं ना, मैं कुछ भी कर सकता हूं।

11 September 2012

'पिचकारी ली जाये या वॉच'

आज जादू को पता नहीं कहां से एक पुरानी पिचकारी मिल गयी।
फिर उसमें पानी भरने की शरारत शुरू हुई। जादू तो हैं ही खुराफाती। बेडरूम की गैलेरी में जा पहुंचे। और वहां लगे split AC के पाइप से पानी निकालने की कोशिश की। पर उसमें तो पानी था नहीं। इसलिए मम्‍मी-पापा के नज़र से बचकर चुपचाप बेसिन से पानी भर लिया गया।


अब पानी की बौछार शुरू। यहां-वहां गीला करने के बाद पता नहीं कैसे

कैसे उसके पानी भरने वाले चैम्‍बर का ढक्‍कर गुमा दिया गया।
और अब नयी पिचकारी की जिद शुरू कर हो गयी। पापा के पास आकर बोले, पापा मुझे नयी पिचकारी दिलवाईये। पापा ने समझाया, ‘बेटा पिचकारी तो होली के वक्‍त मिलती है’। जादू का जवाब था, ‘नहीं ना, अभी भी मिलेगी। टॉयज़ की शॉप पर।’
हमने पूछा—‘अरे पर कहां’।

तो जादू ने रास्‍ता बताना शुरू कर दिया, ‘पहले राइट, फिर लेफ्ट, फिर लेफ्ट और बाद में यू-टर्न लीजिए, टॉयज़ की शॉप आ जायेगी। वहां पिचकारी मिल जायेगी।‘।
पापा ने नाउम्‍मीदी के साथ समझाया। पर अचानक हैरत भरे तरीक़े से समझ भी आ गया।
उसके बाद नयी डिमान्‍ड—‘पापा मुझे वॉच दिलवाईये। पिचकारी नहीं चाहिए। वॉच चाहिए। जैसी आप लगाते हैं वैसी वॉच’
फिर एक और तीर छोड़ा—‘मम्‍मा आप यहीं रूकिए, जादू पापा के साथ वॉच लेने जा रहा है’।

और जादू गये पापा के साथ वॉच लेने। रेड कलर की वॉच पसंद की गयी।
देखिए कैसी लग रही है।

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और साथ में इन दिनों umbrella के साथ जादू की मस्‍ती की दो तस्‍वीरें।
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ताज़ा ख़बर:
जादू की नई सायकिल आ गयी है।
संडे को।
सायकिल के साथ जादू की तस्‍वीरें जल्‍दी ही।

बताईये आपने वॉच और सायकिल ख़रीदी या पिचकारी।

08 March 2012

जादू की होली

इस बार की होली की तस्‍वीरें। कल रात जादू ने पहले तो होलिका-दहन देखा।
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फिर मम्‍मा के साथ पूजा भी की।
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और चूंकि होली पेप्‍सी-ग्राउंड में जलाई जा रही थी। इसलिए वहां खेलना तो बनता था ना। इसलिए थोड़ी देर मस्‍ती भी की।

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झूला भी झूला।

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और आज खेली मम्‍मा-पापा के साथ होली। और हां पिचकारी तो जादू ने कल से ही शूरू कर दी थी। यूरो-किड्स में कल जादू ने क्‍लास में सबके साथ होली खेली। मम्‍मा को टीचर ने बताया कि जादू सबसे ज्‍यादा होली खेल रहा था। मम्‍मा को पता था, इसलिए एक जोड़ी सूखे कपड़े साथ रख दिये गये थे बैग में। मम्‍मा-पापा जब जादू को लेने सकूल पहुंचे तो पता चला कि सब बच्‍चों के गीले कपड़े बेचारी टीचर को बदलने पड़े। ऐसी चल रही है जादू की होली।


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गुझिया और खीर के बिना भला कहां होली। जादू गुझिया भी खा रहा है। और सबको कह रहा है कि जादू आपको भिगो देगा। पितकाली चला देगा।
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आप सभी को जादू की ओर से होली मुबारक। होली है।

26 February 2012

प्‍यारे जादू को Happy Birthday.

तीन बरस........
कितनी जल्‍दी बीत गए।
जादू की शरारतों, उसकी मासमूमियत से रोशन है हमारी दुनिया।


जादू....तुम्‍हें जन्‍मदिन बहुत मुबारक।
....................मम्‍मा-पापा


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07 February 2012

जादू बन गया मिल्‍क-मैन

आज जादू मिल्‍क-मैन बनकर गया था।

जी हां 'दूधवाला'
पता है आज पापा-मम्‍मा बहुत परेशान हुए।
क्‍यों।
इसलिए क्‍योंकि इस तस्‍वीर में जो हरा जैकेट मैंने पहन रखा है ना
उसे जादू ने कहीं छिपा दिया था। और पापा ने आज बड़े प्‍यार से जादू को धोती कुर्ता पहनाया था। पर ऐन वक्‍त पर जैकेट नहीं मिली।
फिर ढूंढने का सिलसिला शुरू हुआ। और बड़ी मुश्किल से ये जैकेट मिला।


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दूध ले लो दूध। पापा की डेस्क पर चढ़कर जादू बेच रहा है दूध।
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और अब दूध के बर्तन पर ज़ोर-आज़माईश।


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एक बार फिर---अरे भैया दूध ले लो दूध। बड़ी मुश्किल है। कोई कहता ही नहीं।
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अच्‍छा चलता हूं। डायरी में देखना है कल क्‍या बनकर जाना है स्‍कूल में।


क्‍या आप कभी मिल्‍क-मैन बने।

05 February 2012

जादू के स्‍कूल में स्‍पोर्ट्स-मीट

शनिवार को मेरे स्‍कूल में स्‍पोर्ट्स डे था।

जादू कुछ दिन पहले से ही तैयारी कर रहा था। पापा को तब पता चला जब मैं एक दिन स्कूल से आया और पापा से बोला--पापा रेडी स्‍टेडी गो।
दौडिए। पापा समझ गए कि मेरे स्‍कूल में रेस की प्रैक्टिस होती है।

फिर तो अकसर ही पापा के साथ मैंने रेस की।

बल्कि रोज़ स्‍कूल से लौटने पर पापा और मेरी रेस होती है कि बिल्डिंग के गेट से लिफ्ट तक सबसे पहले कौन पहुंचेगा। रोज़ मैं ही जीतता हूं। पापा हार जाते हैं। सच्‍ची।

हम लोग सुबह-सुबह नौ बजे शिम्‍पोली में ग्राउंड में पहुंचे तो सबसे पहले नज़र पड़ी इस बैनर पर।
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और फिर वो चीज़ नज़र आई जो मुझे सबसे ज्‍यादा प्‍यारी लगती है। जी हां बलून्‍स। जादू को बलून बहुत पसंद हैं। पापा अकसर मुझे बलून दिला देते हैं। और मैं उससे बहुत खेलता हूं। स्‍कूल में बलून्‍स से कितनी अच्‍छी सजावट की गयी थी। और गैस वाले बलून का क्‍लस्‍टर तो उड़ भी रहा था।

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मम्‍मा कहती हैं कि मौसम सर्दियों का है। पर उस दिन ग्राउंड में तेज़ धूप थी। और सब बच्‍चे अपने मम्‍मी-डैडी के साथ बैठे थे। इवेन्‍ट्स शुरू करने का इंतज़ार कर रहे थे।
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और ये देखिए जादू की रेस।
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और रेस के बाद आराम और ड्रिंक्‍स
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लीजिए ये रही दूसरी रेस। स्‍कूल-बैग तैयार करने की रेस। टीचर समझा रही हैं कि इस रेस में मम्‍मा-पापा को क्‍या करना है।
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और जादू का हाथ पकड़कर ये दौड़ी मम्‍मा

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और अब पापा दौड़ रहे हैं। सब सामान उठाकर बैग तक जाना है। एक हाथ से मुझे पकड़े रखना है।

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जल्‍दी जल्‍दी जल्‍दी कीजिए पापा।

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रेस खत्‍म और नाश्‍ता शुरू। धूप इतनी थी कि मम्‍मा ने मुझे अपना दुपट्टा उढ़ा दिया।

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और ये रहा सर्टिफिकेट और मेडल। तालियां।

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बस बहुत हुआ। अब मैं घर जा रहा हूं। बाय सी यू।

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जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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