30 January 2011

संडे मॉर्निंग-वॉक

हर संडे को मैं सुबह-सुबह पापा के साथ 'मॉर्निंग-वॉक' पर जाता हूं। आज सुबह ठंड थोड़ी ज्‍यादा थी। इसलिए मैं 'तैयारी' से बाहर निकला।  बिल्डिंग में नीचे आते ही मैंने पापा से कहा--'कहिए कहां चला जाए।'
IMG_8692
पापा तो मुझे गोराई बीच ले जाना चाहते थे। पर मैंने पापा से कहा कि इतनी सुबह जाना ठीक नहीं होगा। गोराई-बीच अगले हफ्ते चलेंगे। पहले से तैयारी करके। अभी तो गोराई-क्रीक ही चलते हैं। जैसे ही हम वहां पहुंचे--मैंने देखा कि चौराहे पर कौओं की फ़ौज तैनात है। मुझे कौए भगाने में मज़ा आता है। बस मैं शुरू हो गया। देखिए 'पापा की छांव में' मैं कौओं को निहारता हुआ।  
IMG_8694इसके बाद मैं एकदम से कौओं के पीछे भागने लगा। याद है ना...मैं कभी-कभी पेप्‍सी-ग्राउंड में भी कौओं को भगाने जाता हूं।  IMG_8695कौओं और कबूतरों को भगाने का मज़ा ही कुछ और है। वो भी संडे की सर्द सुबह। 
IMG_8696इसके बाद बारी आई सब्जियां ख़रीदने की। गांव की इतनी सारी सब्जि़यां देखकर मैं सोच में पड़ गया कि क्‍या ख़रीदूं। पापा ने मुझसे पहले कह दिया था कि आज सब्जियों का सिलेक्‍शन तुम्‍हें ही करना है।
IMG_8697अरे वाह। बैंगन तो एकदम ताज़ा है। इसका भुर्ता खाने में मज़ा आयेगा। IMG_8699आण्‍टी फूलगोभी क्‍या भाव दी।
IMG_8700अरे वाह लौकी है या मुगदर। इससे तो एक्‍सरसाइज़ भी की जा सकती है।   IMG_8701 सब्जियां बहुत सारी हो गईं थीं। थैला उठाना मेरे बस की बात थी नहीं। इसलिए मैंने पापा से कहा कि आप उठाईये थैला और मुझे ले चलिए वापस घर।



मेरी संडे मॉर्निंग-वॉक तो शानदार रही। और आपकी?

23 January 2011

शंकर अंकल के घर 'संडे' की मौज-मस्‍ती

पिछले संडे को शंकर अंकल ने अपने घर बुलाया था। मौज-मस्‍ती करने के लिए। शंकर अंकल से मेरी बहुत जमती है। इसलिए क्‍योंकि जब भी वो मिलते हैं मेरे साथ आ जाते हैं। और हर तरह की मस्ती में मेरा साथ देते हैं। मुझे संभालते हैं। और मेरी शरारतों से कभी परेशान नहीं होते। मुझे उनके घर जाना अच्‍छा लगता है क्‍योंकि उनके घर के आसपास बहुत खुली-खुली जगहें हैं। मैदान है। गार्डन है। बकरियां, गाय, मुर्गी, कौए, कबूतर, डॉगी, पूसी-कैट वग़ैरह हैं। उन सबके पीछे भागने में मज़ा आता है। 

वहां पहुंचने के बाद हम सीधे गार्डन में चले गए। गार्डन में बड़ा मज़ा आया। पापा हमेशा फुटबॉल गाड़ी में ही रखते हैं। फुटबॉल निकाली गई। और मैंने तुरंत खेलना शुरू कर दिया। फुटबॉल खेना मुझे बहुत पसंद है।  IMG_8511इसके बाद मुझे तुरंत ही 'स्‍लाइड' नज़र आ गयी। फिसलपट्टी दिख जाए तो मैं एकदम शरारती हो जाता हूं। मुझे इस पर चढ़ना होता है। अभी छोटा हूं। और इस स्‍लाइड पर अपने आप नहीं सरक सकता।
IMG_8513 IMG_8514ऊपर वाली तस्‍वीर पापा ने इस तरह खींची है कि उनकी छाया साफ़ नज़र आ रही है। मम्‍मा-पापा और शंकर अंकल ने मुझे फिसल-पट्टी पर फिसलाया। बड़ा मज़ा आया।
IMG_8551फिर बारी आई झूले की। झूले पर झूलकर बड़ा मज़ा आया। IMG_8525 गर्मी लगने लगी थी। प्‍यास लग रही थी। खेल रोककर मैंने एक ब्रेक लिया। पानी पिया। और फिर हुड़दंग शुरू कर दिया।
IMG_8526 इस खेल में मेरे साथ ध्रुव भैया भी थे। ध्रुव भैया को जब पता चलता है कि मैं आने वाला हूं तो वो बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। वो अपने toys भी मुझे दे देते हैं। मेरी उनकी खूब जमती है।  
IMG_8527 फिर मुझे एक ऐसा पेड़ दिखा जिस पर चढ़ा जा सकता था। देखिए मैं कैसे इस पेड़ पर चढ़ गया। मैं जादू हूं ना मैं कुछ भी कर सकता हूं। (यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे, मैं भी उस पर बैठ कन्‍हैया बनता धीरे धीरे)
IMG_8536 इतनी देर तक खेलने के बाद मैं थक चुका था। सोने का टाइम भी कब का पार हो चुका था। मम्‍मा ने गोद में लिया तो मुझे याद आया--अरे आज तो मैं सोया ही नहीं। बस फटाक से झपकी आ गयी।
IMG_8569 तो कैसी लगी आपको मेरी ये outing. क्‍या आप किसी संडे को एक साथ इतने सारे काम करते हैं। इस मौज-मस्‍ती की और तस्‍वीरें देखिए जादुई तस्‍वीरें पर यहां।

18 January 2011

'पतंग उड़ाना बहुत कठिन है'

मुझे 'मकर-संक्रांति' बहुत पसंद है। पिछले साल भी मैंने पतंग उड़ाई थी। 'जय हो' पतंग। और इस साल तो मकर-संक्रांति के पहले ही मैंने तिल के लड्डू खाने शुरू कर दिए थे। दिक्‍कत ये हुई कि तिल के लड्डू काफी कड़क होते हैं। इसलिए मम्‍मा पापा से मदद लेनी पड़ती है। छोटे-छोटे टुकड़े करवाके प्‍लेट में रखके चम्‍मच से खाता हूं मैं तिल के लड्डू।

शनिवार को मकर-संक्रांति के दिन मुझे बड़ा मज़ा आया। पापा की छुट्टी थी तो दिन भर उनका साथ मिल गया। मम्‍मा ऑफिस में थीं। उन्‍हें मैंने बहुत 'मिस' किया। मैंने उस दिन क्‍या-क्‍या किया ये आप पहले ही मेरे 'माइक्रो-ब्‍लॉग' 'जादू की पुडिया' पर पढ़ चुके होंगे। नहीं पढ़ा है तो आज ही मेरे इस नए ब्‍लॉग पर जाईयेगा।

हां तो मैं बता रहा था कि शाम को पतंग उड़ाने का प्‍लान था। आजकल मैं जिन 'आण्‍टी-दादी' के घर पर रहता हूं (उन्‍हें कभी मैं आण्‍टी कहता हूं, कभी दादी कहता हूं) वो शाम को चार बजे आ गयीं और कहने लगीं कि जल्‍दी से चलो पतंग उड़ाना है। मैंने उनसे कहा--'कौन उड़ायेगा पतंग, आप ?' । बोलीं--'अरे नहीं रश्मिन भईया और जादू उड़ायेंगे। मैंने सोचा कि चलो पतंग उड़ाई जाए। देखें मैं कितने लोगों की पतंग काटता हूं।  
1aऊपर पहुंचा तो देखा कि रश्मिन भैया पूरी तैयारी से हैं। ढेर सारी पतंगें और चरखियां। वो क्‍या है ना कि पिछले साल के बाद कभी पतंग उड़ाई नहीं तो मैं भूल गया था। इसलिए डिसाइड किया कि मैं चुपचाप सबको देखता रहूंगा और सीख जाऊंगा पतंग उड़ाना। तभी मुझे एक पतंग कोने में पड़ी नज़र आई। 1  फिर क्‍या था। फटाक से मैंने उसे अपने हाथ में उठाया। 2और देखा कि इस पतंग के सारे अस्थि-पंजर ठीक तो हैं ना। 3डॉक्‍टर मामा मरीज़ों की जांच करते हैं और मैं अपने खिलौनों और पतंग की सेहत की जांच करता हूं। खुद देख लीजिए।
4पतंग तो मिल गयी। चरखी भी थी। अब इसे उड़ाया कैसे जाए। तो मैंने शुरू किया मुआयना। रश्मिन भैया पेंच लड़ा रहे थे और मैं ठीक उनके बग़ल में खड़ा सब ध्‍यान से देख रहा था। उनका हौसला भी बढ़ा रहा था। मैंने कहा--आप घबराईयेगा मत। मैं हूं ना आपके साथ'।   5टेरेस पर एक और भैया पतंग उड़ा रहे थे। मैं उनके पास चला गया और उनका मुआयना करने लगा।
5bसब लोगों को ध्‍यान से देखा। कौन किस तरह पतंग उड़ा रहा है। किसकी पतंग किस कलर की है। किसकी डोरी उलझ गयी है।5cऔर जब-जब रश्मिन भैया ने दूसरों की पतंग काटी तो मैंने बहुत डान्‍स किया।
6फिर शुरू की अपनी पतंग उड़ाने की कोशिश। लेकिन ये शैतान पतंग तो उड़ ही नहीं रही थी।
7फिर ख्‍याल आया कि टेरेस की दीवार पर चढ़कर पतंग उड़ाई जाये। इससे मेरी 'हाईट' भी बढ़ जायेगी और पतंग अच्‍छे से उड़ेगी। अरे मैं जादू हूं ना मैं तो कुछ भी कर सकता हूं।


पर पापा, आन्‍टी, रश्मिन भैया सबने रोक लिया। 8अरे बाप रे। इतना कठिन है पतंग उड़ाना। अब मैं क्‍या करूं।  9मुझे निराशा हो रही थी। तभी पापा ने आकर मेरा हौसला बढ़ाया। उन्‍होंने बताया कि जब मैं थोड़ा और बड़ा हो जाऊंगा तो खूब पतंग उड़ा पाऊंगा। अभी तो ये सारी पतंगें ही मुझसे बड़ी हैं। और मांझे से उंगली भी कट सकती है। जैसे पापा की कट गयी पतंग उड़ाने के चक्‍कर में। पापा ने ये भी बताया कि 'मकर-संक्रांति' के एक दिन पहले पापा और उनके दोस्‍तों ने ऑफिस में पतंग उड़ाई थी। मैंने कहा--'ऑफिस में पतंग'। बस फिर हम दोनों खूब हंसे।
10टेरेस पर 5वें फ्लोर पर रहने वाले ऋत्विज भैया भी आए थे। पिछले साल भी उनके साथ तस्‍वीर खिंचाई थी। इस साल भी खिंचा ली।  11 उसके बाद नीचे आकर हम सबने बहुत सारे लड्डू खाए।
आपने 'मकर-संक्रांति' पर क्‍या किया।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

Lilypie - Personal pictureLilypie Second Birthday tickers

  © Free Blogger Templates Spain by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP