26 May 2010

जादू ने की कंप्यूटर पर टाइपिंग।

पता है कल किसी बात पर मेरा मूड ख़राब था। पापा ने मुझे बहलाने की कोशिश की। लेकिन मैं शांत हो नहीं रहा था। पापा कंप्‍यूटर पर कुछ कर रहे थे। मैं उनकी गोद में IMG_5519 था। अचानक मुझे लगा कि मुझे भी कंप्‍यूटर पर कुछ करना चाहिए। बस जिद पकड़ ली। और पापा ने मेरे वॉकर पर की-बोर्ड  और माऊस रख दिया। और मैंने काम शुरू किया।

 

 



ये देखिए मैंने क्‍या टाइप किया।

 

 



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आपको समझ में आया कि मैंने क्‍या लिखा।
ये कोई वैज्ञानिक समीकरण है। या कोई गुप्‍त-भाषा।

मैं जादू हूं कुछ भी कर सकता हूं।

25 May 2010

जादू पहुंचा 'विविध-भारती' के स्‍टूडियोज़ में

 

पता है जब भी हम घूमने जाते हैं, तो पापा-मम्‍मा के ऑफिस के सामने से निकलते हैं और मम्‍मा बताती हैं कि वो रहा हमारा ऑफिस यानी विविध-भारती। मैं जब बहुत-छोटा था तब एक बार मम्‍मा ऑफिस लेकर गईं थीं। जहां मैं कमल अंकल से मिला था। वो किस्‍सा मैं आपको फिर कभी सुनवाऊंगा। बहरहाल....शुक्रवार को पापा जब नाइट-ट्रांस्‍मीशन के लिए जा रहे थे, तो मैंने साफ़ तौर पर कह दिया कि मैं भी साथ चलूंगा।

अब मम्‍मा चक्‍कर में पड़ गयीं कि अब क्‍या होगा। आजकल वैसे भी जब पापा तैयार होकर घर से बाहर जाते हैं तो मैं अपने 'शूज़' लेकर दरवाज़े पर आ जाता हूं। इसका मतलब ये है कि मैं भी साथ चलूंगा। अगर मेरी बात मान ली गयी तो ठीक....पर अगर पापा मुझे छोड़कर अकेले चलें जाएं तो मैं आसमान सिर पर उठा लेता हूं। इसलिए अकसर पापा मुझे सुबह 'सैर' करवाने ले जाते हैं। ताकि मैं ऑफिस जाते वक्‍त उन्‍हें 'तंग' ना करूं। पर भला घूमने से 'जादू' का मन कभी भरता है। आप ही बताईये।

तो भई...मैंने तय कर लिया था कि पापा के साथ आज तो जाना ही है। पापा सोचने लगे कि अगर 'जादू' अकेला गया, तो फिर वो रेडियो पर अपने प्रोग्राम कैसे करेंगे। इसलिए तय किया गया कि मम्‍मा भी साथ जायेंगी। बस फिर क्‍या था....मैंने अपनी वॉटर-बॉटल और टिफिन पैक किया और शूज़ लेकर दरवाज़े के पास आ गया। 'शूज़' तो मम्‍मा-पापा ही पहनाते हैं ना। तो इस तरह मैं पहुंचा पापा के स्‍टूडियो। यानी विविध-भारती। जाते ही वहां मिल गये 'मंगेश-अंकल'। ( उनके बारे में मैंने पहले यहां और यहां बताया है, याद है ना) । मंगेश अंकल अपनी 'शिफ्ट' ख़त्‍म करके घर जा रहे थे। और चाहते थे कि मैं भी साथ चलूं। रास्‍ते में वो 'एलफान्‍सो मैंगो' भी लेने वाले थे, अपनी पसंदीदा 'शॉप' से। पर मैं तो विविध-भारती में ही रूकना चाहता था। इसलिए उनकी गाड़ी में बैठते ही मैंने 'हंगामा' कर दिया। आखिरकार मंगेश अंकल को अकेले ही जाना पड़ा। मैंने जाते-जाते उनसे कह दिया कि मैं 'फिर कभी' उनके घर ज़रूर आऊंगा। 

इसके बाद मुझे मिले अशोक सोनावणे अंकल। जिन्‍होंने अपना 'गॉगल' लगाया तो मैं उनके पास गया ही नहीं। मुझे 'गॉगल' तो बस आदि भैया, समीर अंकल के और अपने ऊपर ही अच्‍छा लगता है। सही है ना। 
Pविविध-भारती में इतनी सारी खुली जगह दिखी कि मैं फौरन वहां भाग-दौड़ करने लगा। इसके बाद मम्‍मा मुझे 'ड्यूटी-रूम' लेकर गयीं और बताया कि वहां क्‍या होता है। मैंने कैन्‍टीन भी देखा। धमाचौकड़ी भी की। इस दौरान पापा ट्रांसमीशन संभाल चुके थे। उनकी आवाज़ सुनकर मैं चौंक गया। मुझे लगा कि मेरे पापा की आवाज़ चारों तरफ कैसे सुनाई दे रही है, जबकि वो दिख तो रहे नहीं हैं। ये देखकर मम्‍मा बहुत हंसीं। और मुझे ले गयीं 'कन्‍ट्रोल-रूम'।

 



वहां 'कांच' के उस पार पापा ट्रांसमीशन करते दिख रहे थे। पहले तो मैं थोड़ी देर तक अपनी हॉकी से खेलता रहा वहां पर। उसके बाद मेरा मन किया कि मैं पापा के साथ खेलूं। अब भला पापा कहां खेल सकते थे। उन्‍हें तो रेडियो-प्रोग्राम करना था। मम्‍मा ने बड़ी मुश्किल से मुझे समझाया और 'स्टूडियो-कॉरीडोर' में ले गयीं। इत्‍ता लंबा, शानदार और ख़ाली गलियारा देखकर मुझे लगा कि यहां तो बहुत क्रिकेट और हॉकी खेली जा सकती है। मैं अपना बैट-बॉल और हॉकी लेकर गया ही था। बस मेरा खेल शुरू हो गया।

 

 



मौज-मस्‍ती काफी हो गयी थी। और फिर मुझे नींद भी आ रही थी, इसलिए मम्‍मा मुझे घर ले आईं।

लेकिन विविध-भारती के स्‍टूडियोज़ में जाकर बड़ा मज़ा आया। सच्‍ची।

21 May 2010

जादू ने किया 'गोलू-भालू' का इलाज।

बबलू चाचू और चाची पिछले हफ्ते इंदौर से मुंबई आए। और मेरे लिए लेकर आए दो मज़ेदार toys. एक तो सॉफ्ट-टॉय था और दूसरा बैटरी-से चलने वाला ये bear. ये बड़ा ही मस्‍तीबाज़ भालू है। मुझे देखकर मुंह चिढ़ाता है, गाना गाता है और डान्‍स भी करता है। जैसे-ही चाचा ने इसका हाथ  दबाया। ये डान्‍स करने लगा। मैंने सोचा ये है क्‍या बला।
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उसके बाद मेरी इस भालू से दोस्‍ती हो गयी है। गोलू-भालू अकसर मेरे साथ-साथ रहता है। मेरे पीछे लगा रहता है। कभी मेरे साथ बेडरूम में जाता है तो कभी हॉल में चला आता है। एक दिन तो कहने लगा कि तुम्‍हारे साथ बाहर चलूंगा घूमने के लिए। मैंने कहा--'बेटा अभी तुम छोटे हो, बड़े हो जाओ तो अपने साथ घुमाने ले चलूंगा।'  IMG_6622एक दिन मैं सुबह-सुबह मन ही मन लिस्‍ट बना रहा था कि आज मुझे क्‍या-क्‍या शरारत करनी है, तभी ये मेरे पास आकर ठंस गया। मैंने कहा, मुझे डिस्‍टर्ब मत करो। बहुत काम है आज मुझे। पर इसने मेरी एक ना मानी।
IMG_6625मैंने कहा, देखो, कह रहा हूं, तंग मत करो। पर जब ये हटा नहीं तो मैंने इसका पैर पकड़कर खींच लिया। IMG_6626 जब गोलू-भालू धड़ाम से गिरा, तो मैंने इसका 'चेक-अप' करना शुरू किया। इसके जूतों की जांच की। पता चला कि इसके पैरों में जो बैटरी लगी है, वो 'वीक' हो गयी है। इसलिए ये मेरे पीछे लगा था कि जल्‍दी से मेरी बैटरी बदलवा दो। पर मैं गोलू-भालू की बात समझ नहीं पा रहा था। IMG_6627उसने मुझे इतना 'बोर' कर दिया कि मुझे 'जम्‍हाई' आने लगी है। देखो कित्‍ता उनींदा हो गया हूं मैं। IMG_6628चलता हूं, सोने जा रहा हूं। आज की शरारतों की लिस्‍ट बहुत लंबी है। सोकर उठूंगा तो एक एक करके सारी शरारतें निपटाऊंगा। मैं जादू हूं ना, मैं कुछ भी कर सकता हूं। 

20 May 2010

जादू ने मम्‍मा को दिलवाया हारमोनियम।।

बहुत दिनों से मम्‍मा को नया हारमोनियम चाहिए था। लेकिन पता नहीं क्‍यों हम शॉप पर जा ही नहीं पा रहे थे। जब बहुत ज़्यादा दिन हो गये और टलता चला जा रहा था तो मैंने कहा--बस बहुत हो गया, आज तो मम्‍मा को नया हारमोनियम दिलाना ही होगा। बस फिर क्‍या था। मैंने मम्‍मा से कह दिया कि आज हम भार्गवाज़ जायेंगे। मुंबई के बांद्रा में है भार्गवाज़ म्‍यूजिक। जहां बढिया साज़ मिलते हैं।

हम एक डेढ़ घंटे का सफ़र तय करके भार्गवाज़ पहुंचे। मैंने वहां ज़रा भी परेशान नहीं किया। ना ही रास्‍ते में परेशान किया। मम्‍मी को नया हारमोनियम जो दिला रहा था भई। जब हारमोनियम आ गया तो मम्‍मा ने सोचा कि इसका उद्घाटन भी कर दिया जाए। बस मम्‍मा ने बॉक्‍स खोला और रियाज़ शुरू किया।
1
मैंने सोचा कि हारमोनियम तो मैंने दिलवाया और मम्‍मा अब अकेले रियाज़ करना चाहती हैं। ऐसा नहीं होगा। इसलिए मैंने फौरन मम्‍मा के पास अपनी जगह बना ली। पहले मम्‍मा के साथ ही हारमोनियम पर हाथ चलाए।
5उसके बाद मम्‍मा से कहा कि आप ज़रा बाज़ू हटिए। थोड़ा रियाज़ मैं अकेले करना चाहता हूं।
6मुझे पहली बार हारमोनियम मिला था। वैसे भी मेरी 'हाइट' अभी ज़रा कम ही है इसलिए मैं समझ नहीं पा रहा था कि बैठे बैठे बजाऊं या खड़े होकर बजाना ठीक रहेगा। 7ये देखिए अनूप जलोटा अंकल की तरह और गुलाम अली चाचा की तरह मैंने अपना हाथ कैसे हवा में लहराया है। आप पूछेंगे कि ये अदा मैंने किससे सीखी। तो जवाब होगा, किसी से नहीं। ये मेरा ओरीजनल स्‍टाइल है। 8फिर लगा कि मैं हारमोनियम बजाने में ज़रा कच्‍चा हूं। इसलिए मम्‍मा से थोड़ा सीखना चाहिए। तो मम्‍मा की गोदी में जा बैठा। और ध्‍यान से 'सरगम' सीखने लगा।
9अब तक मम्‍मा समझ गयीं थीं कि उनका रियाज़ हो नहीं रहा है। बल्कि सारी मस्‍ती मेरी हो रही है। इसलिए उन्‍होंने मुझे वॉकर पर बैठा दिया। उन्‍हें लगा होगा कि उनकी ये 'तरकीब' कारगर रहेगी। पर मैं तो जादू हूं ना, मैं कुछ भी कर सकता हूं।  10

ये देखिए। मैंने लगातार यही किया। वॉकर पर से भी हारमोनियम की कुंजियों पर हाथ चलाना जारी रखा। आजकल अकसर ही हो रहा है। मैं मम्‍मा को रेगुलर रियाज़ करवाता हूं। मैं ना करवाऊं, तो मम्‍मा रियाज़ करेंगी ही नहीं। कितना काम करना पड़ता है मुझे। कभी मम्‍मा के रियाज़ का ख़्याल तो कभी पापा के कंप्‍यूटर का। इस‍ीलिए तो मैं दिन भर बड़ा 'बिज़ी' रहता हूं।  11अच्‍छा अब अगर आपके पास हारमोनियम या कोई और साज़ है तो आप दस बार सरगम बजाईये। तब तक मैं ज़रा फुटबॉल खेलकर आता हूं। मैं जादू हूं ना, मैं कुछ भी कर सकता हूं।

19 May 2010

जादू के स्‍टंट: कंप्‍यूटर-ट्रॉली पर

थोड़े दिन पहले मैंने आपको बताया था कि कैसे मैं रसोई में ट्रॉलियों को

उलट-पुलट करता हूं। दरअसल जब से मैंने चलना शुरू किया है, तब से घर का कोई कोना मुझसे अछूता नहीं है। मैं सोफे पर चढ़ जाता हूं। और उसके टिकने वाले हिस्‍से पर भी चढ़ना चाहता हूं। मैं बेडरूम में खिड़की पर चढ़ जाता हूं। और चलते-फिरते मैं हर जगह खींचतान करता रहता हूं। कभी टेलीफोन का तार खींच देता हूं। तो कभी बेडरूम में जाकर पापा के कपड़ों की आलमारी खोलकर सारे कपड़े बिखेर-कर उनके ऊपर बैठ जाता हूं। ये सब मेरे पसंदीदा काम हैं।

एक दिन मैं मौका पाकर पापा के डेस्‍क-टॉप को explore करने लगा। आप सोच रहे होंगे कि मैं कंप्‍यूटर पर कुछ कर रहा था। जी नहीं....मैं तो बस ट्रॉली पर चढ़ गया और मैंने यहां-वहां हाथ मारना शुरू किया। सबसे पहले फाइल-रैक का दरवाज़ा खोला।
1उसके बाद लगा कि यहां तो काम की कोई चीज़ दिख नहीं रही है। 2फिर एक बात मन में आई। लगा कि पापा की गोद में बैठकर जैसे की-बोर्ड की पिटाई की जाती है, वैसे ही अकेले-अकेले की जाए।
3मैं की-बोर्ड की तरफ बढ़ा ही था कि तभी मेरा ध्‍यान पापा के पेन-स्‍टैन्‍ड तरफ चला गया। बस शामत आ गयी सब चीज़ों की। मैंने जैसे ही क़ैंची उठाई, मम्‍मा ने फ़ौरन मुझे ट्रॉली से नीचे उतार दिया। 4देखिए कितनी ऊंचाई पर चढ़ा था मैं। 5 मैं जादू हूं ना--मैं कुछ भी कर सकता हूं।

18 May 2010

जादू का गिटार और डॉक्‍टर मामा की कविता

पता है, अभी तक लोग पापा-मम्‍मा से फ़रमाईश करते थे। रेडियो पर या ब्‍लॉग पर। पर अब तो मुझसे भी करने लगे हैं। सच्‍ची। नीहारिका दीदी ने फ़रमाईश की है कि मैं गिटार बजाते हुए और गाते हुए अपनी तस्‍वीरें दिखाऊं।

ये तस्‍वीरें चार अप्रैल की हैं। पापा ने पता नहीं कहां गुमा दी थीं। वरना पहले ही दिखा देता और फ़रमाईश करने की नौबत नहीं आती। शायद तब की जब मैं ये गिटार लेकर आया था। पापा को स्‍टेशनरी ख़रीदनी थी। हम बोरीवली स्‍टेशन पर अनुपम-स्‍टेशनरी गए थे। पापा ने तो जो ख़रीदा सो ख़रीदा...पर वहीं बेसमेन्‍ट में toys की शॉप है। बस मैं तो वहां घुस गया। और दुकानदार को परेशान करके रख दिया। अखिरकार एक गिटार ख़रीदा गया और घर आकर मैं बन गया 'रॉक-स्‍टार'।
1

2 गद्दे पर खड़े होकर बहुत बजा लिया, अब ज़रा सोफ़े के पास आकर बजाया जाए।
3 गिटार बजाते-बजाते कसरत भी हो जाए तो क्‍या बुराई है। क्‍या आप ऐसा कर सकते हैं।
4गिटार बजाते हुए कसरत करने का एक और तरीक़ा है ये। ये सब आसन बाबा रामदेव ने मुझे सिखाए हैं ख़ास तौर पर।
5
बहुत कसरत हो गयी। अब बैठकर गिटार बजाया जाए। 6तो ली‍जिए निहारिका दीदी। आपकी फ़रमाईश पूरी हो गयी।
'मदर्स-डे' वाली मेरी पोस्‍ट पर डॉक्‍टर मामा ने एक कविता लिखी है टिप्‍पणी में। और कहा है कि ये किसकी कविता है, ये बतायेंगे उड़नतश्‍तरी अंकल। सुन रहे हैं ना अंकल तो आप सब पढिए कविता। जवाब तो वैसे भी उड़नतश्‍तरी अंकल को ही देना है।

यार जादू

इधर बहुत दिनों से कुछ ऐसा फँसे रहे कि कोई कविता नहीं सुना पाये हम तुम्हें। तुम्हारी आज की पोस्ट पढ़कर फिर एक कविता निकल आयी है । लो पकड़ो।
:
मम्मी माँ मम्मा अम्मा, मइया माई
जब जैसे पुकारा, माँ अवश्य आई
कहा सब ने माँ ऐसी होती है माँ वैसी होती है
पर सच में, माँ कैसी होती है
सुबह सवेरे, नहा धोकर, ठाकुर को दिया जलातीं
हमारी शरारतों पर भी थोड़ा मुस्काती
फिर से झुक कर पाठ के श्लोक उच्चारती
माँ की यह तस्वीर कितनी पवित्र होती है
शाम ढले, चूल्हा की लपकती कौंध से जगमगाता मुखड़ा
सने हाथों से अगली रोटी के,
आटे का टुकड़ा
गीली हथेली की पीठ से,
उलझे बालों की लट को सरकाती
माँ की यह भंगिमा क्या ग़रीब होती है?
रोज-रोज, पहले मिनिट में पराँठा सेंकती
दूसरे क्षण, नाश्ते की तश्तरी भरती
तेज क़दमों से, सारे घर में, फिरकनी सी घूमती
साथ-साथ, अधखाई रोटी, जल्दी-जल्दी अपने मुँह में ठूसती
माँ की यह तस्वीर क्या इतनी व्यस्त होती है?
इन सब से परे, हमारे मानस में रची बसी
सभी संवेदनाओं के कण-कण में घुली मिली
हमारे व्यक्तित्व के रेशे से हर पल झाँकती
हम सब की माँ, कुछ कुछ ऐसी ही होती है।
किसने लिखी है, यह बताने के लिये "उड़न-तश्तरी" अंकल हैं ही !
हम तो बस ये सोच रहे हैं कि काश कोई एक "मामा-दिवस" भी होता ।
तुम्हारे
डॉक्टर मामा

17 May 2010

चलो जादू के संग किचन में उथल-पुथल मचाएं।

मैं कितना सीधा-सादा बच्‍चा हूं, ये तो आप सभी जानते हैं। पता नहीं क्‍यों और कैसे मेरी गिनी-चुनी बदमाशियों की ख़बरें लीक हो जाती हैं, और सबके-सब ये मान लेते हैं कि जादू बड़ा बदमाश है। सच्‍ची मैं बदमाश नहीं हूं।



अब देखिए ना....एक दिन मम्‍मी किचन में नहीं थीं। मैंने देखा कि रास्‍ता साफ़ है। तो मैं फ़ौरन किचन में पहंच गया। बताईये क्‍या ग़लत किया। रोज़ाना मैं मम्‍मी को किचन-ट्रॉली से डिब्‍बे निकालकर खाना बनाते देखता रहता हूं। और सोचता हूं कि आखिर इन ट्रॉलियों में भरा क्‍या है। जैसे ही मौक़ा मिला, तो मैंने सोचा, आज तो छानबीन करनी ही पड़ेगी।
1
ट्रॉली का पिंक-कलर मुझे बड़ा अच्‍छा लगता है। मैंने खींचकर बीच वाली ट्रॉली खोली ली। और देखा कित्‍ते सारे डिब्‍बे इसमें भरे थे। 2सबसे पहले मैंने बोर्नवीटा के डिब्‍बे पर हाथ मारा। इसे हाथ लगाने की देर थी कि अचानक बहुत सारी ताक़त आ गयी मेरे भीतर...मैं चौंक गया...पर फिर समझ आया कि ये बॉर्नवीटा का कमाल हो सकता है। अब मम्‍मी का किचन गया काम से। 
3इसके बाद एक और डिब्‍बा हाथ आया है। मैं इसे अपने दांतों से खोलने की नाकाम कोशिश कर रहा हूं। बताईये इसमें क्‍या ग़लत है। ये तो करना ही चाहिए ना।

4और ये गया दाल का पैकेट भी नीचे। देखिए नीचे गिराई जाने वाली चीज़ों की तादाद बढ़ती जा रही है। 
5 6
ओह...सौंफ़ का पैकेट। इसे दांतो से चबाया तो बड़ा अच्‍छा स्‍वाद मिला।
7आपको लग रहा होगा कि अब मैं आगे क्‍या करने वाला हूं। चिंता मत कीजिए अधूरा किस्‍सा बताकर भागूंगा नहीं। पर यहां पोस्‍ट लंबी हो जाए तो बहुत सारे लोगों को पढ़ने में दिक्‍कत होती है। इसलिए मैं यहां लेता हूं एक छोटा-सा ब्रेक। लेकिन आगे की तस्‍वीरों और शरारत के लिए आप क्लिक कीजिए यहां। और पहुंच जाईये मेरे तस्‍वीरों के ब्‍लॉग जादुई-तस्‍वीरों पर। 

09 May 2010

'मदर्स-डे' पर जादू की चिट्ठी अपनी मम्‍मा के नाम

मम्‍मा!
आज 'मदर्स-डे' है। मुझे ये तो नहीं पता कि ये दिन क्‍यों मनाया जाता है, एक ही दिन क्‍यों मनाती है दुनिया 'मदर्स-डे'। क्‍योंकि मेरा तो हर दिन 'मदर्स-डे' है। मेरी तो सुबह भी आपके नाम से होती है और शाम भी।
 
मुझे पता है मम्‍मा..मैं आपको बहुत तंग करता हूं, पर आप कभी मुझ पर ग़ुस्‍सा नहीं होतीं। मैं रात में अकसर आपको जगा देता हूं...मुझे भूख लगी होती है। इसी तरह दोपहर को जब आपको नींद आ रही होती है....तब मेरा खेलने का मन करता है। मेरी वजह से आप सो नहीं पातीं। पर क्‍या करूं।

मुझे आपके साथ खेलना बहुत अच्‍छा लगता है।
ख़ासतौर पर आपके बाल खींचना।
अच्‍छा लगता है आपकी कान की बाली से खेलना। आपके कड़े या चूडियों से खेलना। आपकी गोद में उछलना। आपके साथ छिपा-छिपी खेलना। जब आप गाना गाके मुझे सुलाती हैं--तो मुझे बहुत मज़ा आता है। कई बार तो नींद नहीं भी आ रही होती है तब भी मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं। और थोड़ी देर बाद फिर से खोल लेता हूं। देखना चाहता हूं कि आप क्‍या कर रही हैं।

जब आप नहाने के लिए बाथरूम में जाती हैं, तो मैं डर जाता हूं कि मेरी मम्‍मा कहां चली गयीं। इसीलिए तो बाथरूम के सामने खड़े होकर आपको आवाज़ देता हूं। आपका इंतज़ार करता हूं। जब आप मेरे लिए मेरे बाथ-टब में पानी भरकर उसमें मुझे छोड़ देती हैं तो उसमें छपाक-छपाक खेलना भी मुझे बहुत पसंद है। पानी से मुझे खेलते देख आप कितनी ख़ुश होती हैं। ये सच है कि मैं थोड़ा ज्‍यादा शरारती हूं। कभी चावल का पैकेट बाल्‍टी में गिरा देता हूं। कभी पापा का पर्स बालकनी से नीचे फेंक देता हूं। कभी cupboard खोलकर पापा के सारे कपड़े बिखरे देता हूं। कभी पूरे घर में अख़बार बिखेर देता हूं तो कभी किचन में जाकर ट्रॉली खोलकर डिब्‍बों से खेलता हूं। पर ये सब मेरे लिए नई चीज़ें हैं ना। मुझे इनसे जान-पहचान करना अच्‍छा लगता है। इनसे बातें भी करता हूं मैं।
जब हम बाहर घूमने जाते हैं...तो गाड़ी में मैं आपको कितना तंग करता हूं...उछल-कूद मचाता हूं। पर आप मेरा कितना ख़्याल रखती हैं मम्‍मा। समय से मुझे खाना और पानी देती हैं। मुझे धूप से बचाती हैं आप। ये वाली तस्‍वीर कहां की है..आपको याद है ना मम्‍मा।
पता है मैं अकसर खेलते-खेलते 'डा...डो' (जा....दू) क्‍यों बोलता हूं। क्‍योंकि आप अलग-अलग तरह से 'जादू' कहकर मुझे बुलाती हैं। मैं अकेले में इसकी नकल करता रहता हूं। फिर ज़ोर से बोलता हूं---'डा....डो'। और आपको मज़ा आ जाता है। जब आप हारमोनियम निकालकर रियाज़ करती हैं तो मुझसे रहा नहीं जाता। मैं भी आपके साथ रियाज़ करना चाहता हूं।  
मैं तो नींद में भी आपसे बातें करता हूं मम्‍मा। जब आप मुझे खाना खिलाती हैं तो कभी-कभी अपने नए-नए दांतों से आपकी उंगली काट लेता हूं मैं। और इसमें मुझे बड़ा मज़ा आता है। सुबह अगर नींद खुले और आप नहीं दिखें तो मैं 'डर' जाता हूं। फिर बुरा-सा मुंह बनाकर रोता हूं। अगर आप दिख गयीं तो मेरे रोने पर अपने आप 'ब्रेक' लग जाता है और मैं हंस पड़ता हूं। आप मुझे हंसती हुई बहुत अच्‍छी लगती हो मम्‍मा।
एक दिन मैंने रेडियो पर आपकी आवाज़ सुनी। और मैं पहचान गया...अरे ये तो मेरी मम्‍मा हैं। पर मेरी समझ में ये नहीं आया कि आप इस डिब्‍बे में कैसे बोल रही हैं। आजकल आप ऑफिस नहीं जा रही हैं, पापा जाते हैं। उनकी आवाज़ रेडियो पर आती है तो आप मुझे बताती हैं। आवाज़ पहचानने को कहती हैं। इस खेल में कितना मज़ा आता है ना मम्‍मा। 
 मैं 'मदर्स-डे' पर आपको मुबारकबाद दे रहा हूं मम्‍मा।

 


मैं आपसे बहुत प्‍यार करता हूं। सच्‍ची।
आपका


'जादू'

02 May 2010

जादू का संडे-स्‍पेशल मौज-मस्‍ती बुलेटिन

  संडे को अमूमन पापा घर पर होते हैं। यानी ये दिन होता है मौज-मस्‍ती करने का। सबेरे सोकर उठा तो पापा ने कहा चलो सैर करके आते हैं। फिर हम गए गोराई-क्रीक जहां समुद्र के उस तरफ गोराई-विलेज से महिलाएं ताज़ा पत्‍तेदार सब्जियां लेकर आती हैं। मैंने पापा से कहा लौकी ताज़ा है, ले लीजिए। इलायची-केले (दक्षिण भारत या तटीय इलाक़ों वाले छोटे केले) बड़े अच्‍छे दिख रहे हैं, वो भी ले लीजिए। पत्‍ता-गोभी खाना सेहत के लिए अच्‍छा होता है, वो भी लीजिए। इस तरह पापा को सब्जियां ख़रीदवाईं मैंने। रास्‍ते में डॉगी दिखे, जिन्‍हें देखकर मैंने भू-भू किया। बिल्डिंग में मैं पूसी-कैट से भी बतियाया। उसने बताया कि आजकल गर्मी इतनी ज्‍यादा पड़ रही है कि दुबक कर ज़ीने (सीढियों) के नीचे बैठी हुई हूं।

अब बारी थी नाश्‍ते की। मम्‍मा ने मुझे नाश्‍ते में oats खिलाए। मुझे इस प्‍लेट में बिस्किट रखकर दे दिये गये थे। देखिए प्‍लेट से मैंने कैसे छिपा-छिपी खेलना शुरू कर दिया। IMG_6587IMG_6589इसके बाद हॉल में रखे अख़बारों पर मेरी नज़र पड़ी। पापा विविध-भारती पर कोई प्रोग्राम करते हैं जिसमें उन्‍हें अख़बारों, किताबों और इंटरनेट से जानकारियां जमा करनी पड़ती है। इसलिए हफ्ते भर के अख़बार उनके लिए बहुत अहम होते हैं। पर अख़बार तो मुझे बहुत समय से पसंद हैं। मौक़ा मिलते ही आजकल मैं अख़बारों के पुलिन्‍दे को बिखेर देता हूं। सिर्फ बिखेरता ही नहीं हूं। अख़बारों के एक-एक पन्‍ने को अलग-अलग कर देता हूं। देखिए उसके बाद मैंने अख़बारों का क्‍या हाल किया। हमेशा तो मम्‍मा मुझे रोक लेती हैं। पर पता नहीं क्‍यों आज उन्‍होंने मुझे रोका नहीं। बस हंसती रहीं।  IMG_6592 IMG_6594 IMG_6596 IMG_6597 IMG_6601अब इन अख़बारों को तारीख़वार जमाना बड़े ही धीरज का काम है। पापा-मम्‍मा के बस का तो नहीं है। लेकिन सच्‍ची आज मेरा संडे बड़ा-ही स्‍पेशल हो गया। 
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अब तक बड़ी देर हो चुकी थी। मुझे फिर-से भूख लग गयी थी। मम्‍मा ने मुझे apple काट-कर दिये। आजकल मैं हर चीज़ अपने हाथों से खाना पसंद करता हूं। इसलिए मम्‍मा मुझे टुकड़े करके दे देती हैं। एपल खाने का मेरा तरीक़ा क्‍या है, पता है? पहले एपल के टुकड़े को उठाइये। मुंह में डालिए। कुतरिये। रस चूस लीजिए। और लुगदी 'थू-थू' कर दीजिए। साफ-सफाई करने के लिए मम्‍मा हैं ना।
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मेरा संडे तो स्‍पेशल हो गया। आपने अपने संडे को स्‍पेशल बनाने के लिए क्‍या किया।


अब मैं फुटबॉल खेलने जा रहा हूं। मैं जादू हूं ना कुछ भी कर सकता हूं।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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