30 March 2010

जादू पहुंचा बोधिसत्‍व अंकल...नहीं नहीं...भानी दीदी के घर

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक दिन यूं ही बैठे-बैठे तय हो गया कि हम लोग बोधिसत्‍व अंकल और आभा आन्‍टी के घर जायेंगे। अरे अरे उनके घर नहीं बल्कि भानी दीदी और मानस भैया के घर जायेंगे। बस उसके बाद क्‍या था। मैं तो कहीं भी घूमने जाने के लिए एकदम तैयार ही रहता हूं। और फिर ये भानी दीदी का घर तो हमारे घर से बहुत दूर थोड़ी
है। ये अलग बात है कि उस दिन मैंने तैयार होते वक्‍त मम्‍मी को बहुत तंग किया। कैसे...अरे बहुत सारे तरीक़े हैं।

 

 


--जब मम्‍मी हाथ-पैर धोने के लिए बुलाएं तो यहां वहां भागने लगो ।
--ऐन टाइम पर शू-शू कर दो ।


--ज़ोर-ज़ोर से रोने लगो ।


--मम्‍मी के बाल खींच दो ।


--पापा के साथ खेलने लगो ।
--सारे खिलौने कमरे में बिखेर दो ।
--ऐसे दिखाओ कि भूख लगी है । पर जब खाना मिले तो 'थू' 'थू' करने लगो
--

वग़ैरह ।



ऐसे तमाम कारनामों के ज़रिए मैंने मम्‍मी को 'लेट' करवा दिया। फिर हम पहुंचे भानी दीदी के घर। बोधिसत्‍व अंकल ने अपने घर का 'रेनोवेशन' करवाया है। मैं उनके घर दूसरी बार गया था। इसलिए नए-नए घर को पहचान नहीं पाया। पहली बार पता है कब गया था--जब मैं अपनी मम्‍मा के पेट में था। मकर-संक्रांति की खिचड़ी खाने के लिए।
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जब भी मम्‍मी-पापा बोधि अंकल के घर जाते हैं तो दो ग्रुप बन जाते हैं बात करने वालों के। एक ग्रुप मम्‍मा और आभा आंटी का। और दूसरा ग्रुप पापा और बोधि अंकल
का। हालांकि अकसर ये ग्रुप मिलकर एक ग्रुप भी बना लेते हैं। तो बस पहुंचते ही पापा किताबों और जाने किन-किन बातों में 'बिज़ी' हो गए। मुझे बिज़ी होने के लिए एक खिड़की नज़र आई। फौरन उस पर कब्‍जा कर लिया। और वहां खड़े होकर इत्‍ती जोर जोर से आवाज़ें लगाईं कि नीचे से गुज़रने वाले लोग पीछे मुड़-मुड़ कर देखने लगे।  बीच-बीच में मैं भानी दीदी के साथ मस्‍ती भी कर लेता था।  IMG_6128

फिर मैंने बोधि अंकल के टेलीफोन पर निशाना लगाया। घर पर भी मैं अपने टेलीफोन से खूब खेलता हूं। यहां खेलने का मतलब है टेलीफोन को तोड़ना। किसी तरह मम्‍मा ने बोधि अंकल के टेलीफोन को टूटने से उस दिन बचा ही लिया वरना तो.... 
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उसके बाद तो काफी चीज़ें थीं जिन पर हमला किया जा सकता था। मैंने गुलाब-जामुन पर भी हमला किया। उसे फौरन अपने पेट के हवाले किया। ऐसे कामों में देर थोड़ी करते हैं। भानी दीदी के साथ खेला। उनके बाल खींचे। बड़ा मज़ा आया।
IMG_6129भानी दीदी ने मुझे एक गिफ्ट भी दी। मैं अपने बर्थडे के कुछ ही दिनों बाद गया था
ना। इसलिए। भानी दीदी मुझसे कम थोड़ी हैं । बार-बार अपनी मम्‍मी के कान में कहती थीं कि जादू से कहिए गिफ्ट खोले । फिर वो खुद ही उसे खोलकर देखने को इन्सिस्‍ट भी कर रही थीं । मुझे लगा कि फौरन गिफ्ट खोल कर देख लेनी चाहिए। इसलिए देख भी ली और खिलौने से खेल भी लिया।


IMG_6108इसी दौरान हम मानस भैया के कमरे में भी चले गये । दरअसल उनका एक्‍ज़ाम था, बेचारे पढ़ रहे थे । बीच बीच में झपकी भी ले रहे थे । हमने सोचा कि उन्‍हें भी तो थोड़ा तंग किया जाए ।
IMG_6124 बड़ा मज़ा आया भानी दीदी के घर पर । बड़े लोग जाने क्‍या-क्‍या बातें करते रहे । कभी टी.वी. की । कभी ब्‍लॉगिंग की । कभी साहित्‍य की तो कभी कुछ और । पर हम बच्‍चे  मज़े करते रहे । जाते-जाते पता है क्‍या हुआ । ये देखिए भानी दीदी और मैं अपनी अपनी मम्‍मी की गोद में लाड़ दिखा रहे हैं  । और टा-टा-बाय-बाय कर रहे हैं । भानी दीदी इत्‍ती बड़ी होकर भी अपनी मम्‍मी की गोद में चढ़ी हैं । ही ही ही ।
IMG_6137उड़नतश्‍तरी अंकल ने कहा है कि बोधि अंकल का भी फोटो दिखाया जाए । ये रहा । मैंने बोधि अंकल के साथ भी बहुत मस्‍ती की । IMG_6120

लीजिए मैं तो भानी दीदी के घर हो आया । अब लिस्‍ट बना रहा हूं कि आगे मुझे किस-किस के घर जाना है । मैं जादू हूं ना मैं कुछ भी कर सकता हूं ।

28 March 2010

जादू लेकर आया है ताज़ा शरारतों का बुलेटिन

आज मैं कुछ बातें तय करके आया हूं । आज मैंने ये तय कर रखा है कि अपनी ताज़ा शरारतें आपको बताऊंगा ।

तो चलिए शुरू करते हैं मेरी ताज़ा शरारतों का बुलेटिन ।

 


 

 


1. हमारे शहर में पानी की किल्‍लत होने लगी है । इसलिए मम्‍मा ने एक बाल्‍टी भर रखी थी रसोई के कामों के लिए । पास ही स्‍टील की टंकी पर चावल का एक पैकेट रखा था । जो सामने वाली शॉप से 'जिगर' अंकल ने भेजा था । मम्‍मा बिज़ी रही होंगी तो उन्‍होंने उसे वहां छोड़ दिया । सारी व्‍यवस्‍था ऐसी थी कि एक हाथ मारा जाए तो badmash jadoo चावल का पैकेट बाल्‍टी में छलांग लगा देगा । मैं रसोई में पहुंचा और मार दिया हाथ । फिर क्‍या था । चावल गिर गए पानी में । और मैंने खूब छपाछप की । मम्‍मा ने कहा कि--'अरे जादू ये क्‍या किया तुमने' । मैं स्‍पीड भागा हॉल की तरफ और खिलौनों में ऐसे मगन हो गया जैसे कुछ हुआ ही ना हो । फिर चुपके से नज़रें उठाकर देखा, मम्‍मा  मुझे ग़ुस्‍से में देख रही थीं ।  मैंने उनकी निगाहों को 'इग्‍नोर' किया और अपने खिलौनों में मगन रहा ।  लेकिन मन नहीं माना तो फिर मम्‍मा की तरफ बडे प्‍यार से  देखा और मुस्‍कुरा दिया । मेरी 'स्‍माइल' से शायद मम्‍मा को प्‍यार आ गया । उन्‍होंने मुझे गोद में उठा लिया और बोलीं--'जादू तू बहुत नटखट है' । अगले दो तीन दिनों तक मम्‍मा चावल सुखाती रहीं । कभी धूप में तो कभी पंखे के नीचे । और मैं फैले हुए चावल पर हाथ पैर मारता हुआ अगली शरारत की प्‍लानिंग करता रहा ।



2. बेडरूम में मुझे बेड और उसके साथ लगी खिड़की पर खेलने में बड़ा मज़ा आता है । मैं रोज़ सुबह उठकर वहां पापा के साथ धमाचौकड़ी भी मचाता हूं । और परदे के पीछे छिपकर 'छिप्‍पी' (छिपा-छिप्‍पी) वाला खेल भी खेलता हूं । और 'हा हा हा' करके हंसता भी हूं । एक शाम मम्‍मा मुझे तैयार कर रही थीं । उनका ध्‍यान यहां-वहां भटका तो मैंने पता है क्‍या किया । टेल्‍कम पाउडर के डिब्‍बे को पूरा उलट दिया । बेड पर पाउडर ही पाउडर फैल गया और मैं सफेद मुंह का बंदर बन गया । थोड़ा सा पाउडर खाके भी देखा । पर उसके टेस्‍ट अच्‍छा नहीं लगा ।



3. आजकल पापा मुझसे बचके रहते हैं । अपने डेस्‍कटॉप पर काम करते हुए वो अगर B and W की-बोर्ड वाला सेक्‍शन बाहर खींच कर छोड़ दें तो मैं पंजों के बल उचकके उसे पकड़कर खड़ा हो जाता हूं और माउस से यहां वहां क्लिक करके खींचम-तान मचा देता हूं । की बोर्ड और माउस की पिटाई भी करता हूं । पापा फोन पर बात कर रहे थे । उनका कुछ काम चल रहा था 'पी.सी.' पर । मैंने मौक़ा देखा और जा पहुंचा वहां पर । माउस खींचा और उठा-पटक, खींचम-तान सब की । जब पापा लौटे तो देखा कि उनका तैयार 'वर्ड-डॉक्‍यूमेन्‍ट' गा़यब है । सारी विन्‍डोज़ बंद हो चुकी हैं । मीडिया-प्‍लेयर पर गाना बजाया जा रहा है । ये सब किसने किया बताईये । ....'जादू' से हो गया । हे हे हे ।

 

 

 



4. पापा कभी-कभी अपनी स्क्रिप्‍ट्स और रिसर्च का काम घर पर भी करते हैं । एक दिन उन्‍होंने अपने ब्‍लैंक-पेजेस का पूरा रीम शो-केस के एक सेक्‍शन में छिपा दिया । और उसमें से निकाल निकाल के वो अपना लिखने का काम करते रहते थे । अब 'जादू' की नज़रों से भला कुछ छिप सका है । मैंने शो-केस के मैगनेट से बंद रहने वाले दरवाजों को खींचने की अच्‍छी प्रैक्टिस कर ली है । बस एक दिन मौक़ा ताड़ के पापा की पूरी फाइल खीच ली और सारे कोरे काग़ज़ गिरा दिये । बाकी काम पंखे ने किया । कमरे में चारों तरफ कोरे काग़ज़ फैल गये । कुछ को मैंने मोड़ कर गुड़ी-मुड़ी भी कर
दिया ।

अख़बारों के साथ तो मैं रोज़ ही ऐसा करता हूं ।  

5. एक दिन पापा ने सोचा कि आई-पी-एल का अपना पसंदीदा मैच देखें । रिमोट ढूंढा । फर्श पर पड़ा था । उन्‍हें लगा कि रिमोट हल्‍का क्‍यों लग रहा है । अरे मैंने पिछले remote हिस्‍से को खोलकर बैटरियां निकाल ली थीं । उन्‍हें चूसा, पर उनमें टेस्‍ट ही नहीं था । फेंक दिया । पापा खोज-खोजकर परेशान हो गए तब जाकर उन्‍हें बैटरी मिली । पर एक ही मिली  । दूसरी बैटरी खोज-खोजकर थक गए तो अपने पास से एक नई बैटरी निकालकर रिमोट में लगाई और मैच देखा । तब तक कई ओवर निकल गए थे । मुझे बड़ा मज़ा आया । लेकिन अब रिमोट मेरी पहुंच से दूर रखा जाने लगा है । पर बैटरियों पर मेरी ख़ास नज़र रहती है ।

6. एक दिन मैं पापा की एक्‍सटर्नल हार्ड-डिस्‍क गिरा चुका हूं । अच्‍छा हुआ उनका डेटा लॉस्‍ट नहीं हुआ । वरना सबसे ज्‍यादा नुकसान तो गानों का होता ना ।

 

 


7. पिछले दिनों मैंने सोचा कि मम्‍मी पापा बंबई में बहुत बोर हो गए हैं । उन्‍हें कहीं घुमा लाऊं । खूब सोचा और फिर लगा कि अहमदाबाद चलना चाहिए । पास भी है, और वहां ज्‍यादा गर्मी नहीं पड़ती । जब एयर-पोर्ट के सिक्‍युरिटी-चेक पर पर महिला-सिक्‍यूरिटी ने अपना मेटल-डिटेक्‍टर मेरे सामने लाया तो मैंने झट-से उसे कसके पकड़ लिया और सोचा कि इसे घर ले चलते हैं । इससे खेलने में मज़ा आयेगा । सिक्‍युरिटी वाली आंटी को मज़ा आ गया । वो हंसके बोली--'ओह सो क्‍यूट बेबी' । मैंने उनकी बात पर कोई रिस्‍पांन्‍स नहीं दिया । लेकिन प्‍लेन में चढते वक्‍त 'क़तार' में एक आन्‍टी के लंबे बाल बड़े अच्‍छे लगे तो मैंने फौरन हाथ बढ़ाकर ज़ोर से खींच लिए । उन्‍होंने मुड़के देखा, मम्‍मा ने सॉरी कहा तो वो ज़ोर से हंस पड़ीं । और बोलीं--कोई बात नहीं । मेरा बेटा भी ऐसे ही बाल खींचता है । लो और खींच लो बाल ।

मुझे लगता है कि आज के बुलेटिन के लिए इतना काफी है । चलते चलते एक बात सुन लीजिए । एक लड़की है जो रोज़ शाम को मुझे नीचे बिल्डिंग के कंपाउंड में मिलती है । सात आठ साल ही होगी । मैं उसे दीदी-वीदी कुछ नहीं कहता । जब भी वो मिलती है मैं उसके बाल खींचता हूं । और वो हमेशा मुझे देखकर बाल खिंचवाने चली आती है । एक दिन मैंने उसकी आंख में उंगली भी डाल दी थी । हे हे हे ।

अब मैं चलता हूं शरारत करने । बाक़ी की शरारतों के बारे में बाद में बताऊंगा ।


मैं जादू हूं ना । मैं कुछ भी कर सकता हूं ।

07 March 2010

'जादू' पहली बार गया फिल्‍म देखने

 

 

 

पता है मैं मम्‍मा-पापा के साथ फिल्‍म देखने गया था । हालांकि इस बात को अब पंद्रह दिन से ज्‍यादा हो चुके हैं । लेकिन आपको इसलिए नहीं बता सका, क्‍योंकि मैं बेहद 'बिज़ी' जो था । अरे कितने काम हैं मेरे, अब बार-बार क्‍या गिनाऊं ।

 

ये मेरी देखी पहली फिल्‍म है । बताईये मैं कौन-सी फिल्‍म देखने गया होऊंगा ।


3-idiots-19d वैसे तो मैं पहले भी फिल्‍म देखता रहा हूं । लेकिन उस वक्‍त देखता नहीं सुनता था । अपनी मम्‍मा के पेट में जो था । मेरे पैदा होने के बाद हम तीनों की देखी ये पहली फिल्‍म थी । मैं ज्‍यादा परेशान ना करूं इसलिए मम्‍मा-पापा ने 'नाइट शो' का प्‍लान किया । लेकिन उन्‍हें ये पता नहीं था कि मैं भी पक्‍का 'पिक्‍चरबाज़' हूं । ये कैसा हो सकता था कि मम्‍मा-पापा पिक्‍चर के मज़े लें और मैं ना देखूं । मैंने भी खूब मज़े लेकर फिल्‍म देखी ।

 



अरे फिल्‍म में आमिर अंकल कितने जंच रहे थे । वैसे भी उनकी एक्टिंग तो लाजवाब भी होती है । लेकिन 'शेम-शेम' । शी शी । इत्‍ते कम कपड़े । अरे इत्‍ते कम कपड़े तो मैं भी नहीं पहनता जबकि मैं इत्‍ता छोटा हूं ।

एक मज़ेदार बात बताऊं । फिल्‍म में ' अपनी मम्‍मी के पेट में मौजूद एक 'बच्‍चा 'ऑल इज़ वेल' सुनकर किक मारता है । ये मुझे बड़ा अच्‍छा लगा । पता है मैं जब गर्भ में था तो कुछ गाने सुनकर और 'फै़ज़' की ग़ज़लें सुनकर 'किक' मारता था । आइसक्रीम, केक और बाक़ी सारी मीठी चीजों पर मेरी यही प्रतिक्रिया होती थी ।

हां...तो मैं एक घंटे तक मस्‍त होकर फिल्‍म देखता रहा । फिर लगा कि अरे मम्‍मा-पापा का तो मेरी तरफ ध्‍यान ही नहीं है । तो मैंने ज़ोर से रोना शुरू कर दिया । पापा मुझे लेकर हॉल से बाहर आए । जब उजाले में आए तो वहां टॉकीज़ के कैन्‍टीन और सजावट को देखकर मुझे मज़ा आ गया । पॉप-कॉर्न बनते देखकर मुझे बड़ा अच्‍छा लगा । मैं चुप हो गया और हम फिर से हॉल में चले गए । मैं स्‍क्रीन वाले चबूतरे पर जाना चाहता था पर पापा ने जाने नहीं दिया ।


कुल मिलाकर मैंने पूरी फिल्‍म बहुत मजे लेकर देखी । बीच में थोड़ी झपकी भी ले ली । और खूब खुश होकर घर लौटा । अब मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि मम्‍मा-पापा मुझे कौन सी फिल्‍म दिखाने ले जायेंगे ।

01 March 2010

जादू ने देखा होलिका-दहन

मैं मुंबई में जहां रहता हूं वहीं पास में है पेप्‍सी ग्राउं

ड है । इस ग्राउंड में यूं तो बच्‍चे खेलते हैं और लोग 'वॉक' करने आते हैं । पर यहां प्रवचन भी होते हैं और सांस्‍कृतिक आयोजन भी । राजनीतिक-रैलियां भी होती हैं और प्रदर्शनियां भी । मैं इस ग्राउंड में वॉक करने इसलिए नहीं जाता क्‍यों‍कि क्रिकेट खेलते बच्‍चों की बॉल आकर लग जाये तो क्‍या हो । इसी ग्राउंड में हर साल होली जलाई जाती है । कल मैं पहली बार होली देखने इस ग्राउंड पर गया । पिछले साल जब होली आई तो मैं बहुत छोटा था ना इसलिए पिछले साल नहीं गया था । होली की लपटों को देखकर और आंच को महसूस करके मुझे बहुत अच्‍छा लगा ।
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मम्‍मी-पापा जब मुझे पेप्‍सी ग्राउंड लेकर गए तो वहां 'लपटों' को देखकर मैं दंग रह गया । पहली बार जो मैं ऐसा नज़ारा देख रहा था । मेरी तो नज़रें वहां से हट ही नहीं रही थीं । 
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मम्‍मा ने मुझे होली की कहानी सुनाई । बताया कि होली का त्‍यौहार क्‍यों मनाया जाता है । वहां काफी भीड़-भाड़ थी । और मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था । 4 IMG_6075वहां ढोल और नगाड़े बजाते हुए 'हुरियारों' की टोली देखकर मुझे अच्‍छा लगा । मारवाड़ी मंडल के ये लोग होली के गीत गा रहे थे । जो मेरी समझ में नहीं आये । पर इनकी मस्‍ती देखकर मुझे लगा बहुत अच्‍छा । 5 IMG_6076
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होली की मस्‍ती मुझ पर सवार हो चुकी है । कल एक आंटी ने बोला कि वो मुझे रंगने के लिए तैयार हैं । मैंने उनसे कह दिया है कि सिंथेटिक-रंग मत लगाईयेगा । जितना हो सके कुदरती-रंग लगाईये । मैं होली के लिए तैयार हूं । तो बताईये कौन-कौन नेचरल कलर से मुझे रंगने आ रहा है ।


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जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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