10 September 2010

जबलपुर यात्रा 2 : भैया और गैया

आप तो जानते ही हैं कि आजकल मैं अपने दादा-दादी के पास जबलपुर आया हुआ हूं। जबलपुर पहुंचते ही मैंने बहुत शरारत शुरू कर दी है। यहां के बड़े और खुले-खुले से घर में दौड़ने में मुझे बड़ा मज़ा आता है। वैसे मेरा सारा ध्‍यान आजकल बाहर घूमने में रहता है। क्‍योंकि बाहर निकलते ही कभी डॉगी दिखता है तो कभी म्‍याऊं तो कभी गैया और कभी कभी चूं चूं चिडिया। दादी की क्‍यारियों में तो तितलियां भी आती हैं। इसलिए कभी शेबी दीदी तो कभी शाना बुआ और अकसर दादाजी के साथ मैं घर से बाहर निकल जाता हूं। और घूम फिर कर वापस आ जाता हूं।

बेड, कुर्सियों, सोफे और मसहरी पर चढ़ना सीख लिया है मैंने। इस काम में फ़ाजिल भैया मेरा साथ निभाते हैं। एक मज़ेदार बात और हुई है। शेबी दीदी फाजिल भैया की बड़ी बहन हैं और बड़ा होने के नाते वो हमेशा फाजिल भैया पर रौब जमाती रहती हैं। ऐसे में बेचारे फाजिल भैया को बड़ा शौक़ है कि वो भी किसी के बड़े भैया हों। और उनकी ये तमन्‍ना मैंने पूरी करवाई है। मेरे आते ही सबने फाजिल भैया को बताया कि मैं उनका छोटा भाई हूं। उसके बाद वो बदमाशियां छोड़कर 'जिम्‍मेदार' बन गए हैं। अब वो स्कूल से वापस आकर टी.वी. नहीं चलाते बल्कि मेरे साथ खेलते हैं। स्‍कूल जाने से पहले वो मुझे देखने आते हैं। पर उस वक्‍त मैं सो रहा होता हूं।

हां तो आजकल हर वक्‍त मेरे साथ होते हैं फाजिल भैया। मेरी हर बदमाशी और शैतानी के साथी। IMG_7719
उन्‍होंने अपने खिलौने भी मुझे दे दिए हैं खेलने के लिए। और मेरे खिलौने तो हैं ही। हम दोनों मिलकर घर में तूफान मचाए रहते हैं। बेचारी शेबी दीदी...हमसे बड़ी है पर हम उसे भी तंग कर डालते हैं। वो भी मेरे साथ खूब खेलती हैं। मुझे गोद में उठाकर वो घुमाने ले जाती हैं।

पापा, बबलू चाचा और हम सब बच्‍चे मिलकर घर में हंगामा मचाए रहते हैं। ये देखिए ऐसा ही एक नज़ारा:
IMG_7691अब आज सबेरे का किस्‍सा सुनिए। एकदम सबेरे-सबेरे मैं दादाजी के साथ पोर्च में खेल रहा था। दादी की लगाई क्‍यारियां देख रहा था। और दौड़ रहा था।
IMG_7699तभी एक गैया आ गयी जिसे रोज़ हमारे घर से रोटियां मिलती हैं। मैंने कहा मैं गैया को रोटी खिलाऊंगा। मुंबई में फ्लैट में कहां गैया आएगी। ये मेरे लिए सुनहरा मौक़ा था। और मैं गैया के साथ खूब खेला। IMG_7711इसका मतलब ये हुआ कि जबलपुर में मैं दो लोगों के साथ खूब खेला। एक फाजिल भैया और दूसरी ये वाली गैया।

अन्‍नपूर्णा आंटी ने पूछा है कि 'खोए की जलेबी' क्‍या होती है। ज़रा इंतज़ार कीजिए। मैं तस्‍वीर सहित आपको बताऊंगा। तब आप कहेंगी कि इंतज़ार का फल 'मीठा' होता है। अब मैं चला भैया और गैया के साथ खेलने क्‍योंकि मैं जादू हूं ना, मैं कुछ भी कर सकता हूं।  

अरे अरे, एक बात तो सुन लीजिए। कल मीठी ईद है। आप सभी को ईद की बहुत बहुत मुबारकबाद।  

3 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत मस्ती में जादू जी इस समय ... क्या बात है खुश रहो.... सब मौजा मौजा हा न हमारे शहर जबलपुर नगरिया में ...

मीठी ईद की बधाई और ढेरों शुभकामना ...

महेंद्र मिश्र
जबलपुर.

प्रवीण पाण्डेय said...

जादू भैया,
साथ में गैया,
देखें गायें,
सब ता थैया।

sunheriyaadein said...

Hamesha aise hi hanste-khelte raho. Faazil bhaiya aur Shebi didi ko bhi hamara pyaar dena. Aur milke khoob masti aur shararat karna.
Eid ki bahut bahut mubarakbaad aapko aur aapki poori parivaar ko.

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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