18 May 2010

जादू का गिटार और डॉक्‍टर मामा की कविता

पता है, अभी तक लोग पापा-मम्‍मा से फ़रमाईश करते थे। रेडियो पर या ब्‍लॉग पर। पर अब तो मुझसे भी करने लगे हैं। सच्‍ची। नीहारिका दीदी ने फ़रमाईश की है कि मैं गिटार बजाते हुए और गाते हुए अपनी तस्‍वीरें दिखाऊं।

ये तस्‍वीरें चार अप्रैल की हैं। पापा ने पता नहीं कहां गुमा दी थीं। वरना पहले ही दिखा देता और फ़रमाईश करने की नौबत नहीं आती। शायद तब की जब मैं ये गिटार लेकर आया था। पापा को स्‍टेशनरी ख़रीदनी थी। हम बोरीवली स्‍टेशन पर अनुपम-स्‍टेशनरी गए थे। पापा ने तो जो ख़रीदा सो ख़रीदा...पर वहीं बेसमेन्‍ट में toys की शॉप है। बस मैं तो वहां घुस गया। और दुकानदार को परेशान करके रख दिया। अखिरकार एक गिटार ख़रीदा गया और घर आकर मैं बन गया 'रॉक-स्‍टार'।
1

2 गद्दे पर खड़े होकर बहुत बजा लिया, अब ज़रा सोफ़े के पास आकर बजाया जाए।
3 गिटार बजाते-बजाते कसरत भी हो जाए तो क्‍या बुराई है। क्‍या आप ऐसा कर सकते हैं।
4गिटार बजाते हुए कसरत करने का एक और तरीक़ा है ये। ये सब आसन बाबा रामदेव ने मुझे सिखाए हैं ख़ास तौर पर।
5
बहुत कसरत हो गयी। अब बैठकर गिटार बजाया जाए। 6तो ली‍जिए निहारिका दीदी। आपकी फ़रमाईश पूरी हो गयी।
'मदर्स-डे' वाली मेरी पोस्‍ट पर डॉक्‍टर मामा ने एक कविता लिखी है टिप्‍पणी में। और कहा है कि ये किसकी कविता है, ये बतायेंगे उड़नतश्‍तरी अंकल। सुन रहे हैं ना अंकल तो आप सब पढिए कविता। जवाब तो वैसे भी उड़नतश्‍तरी अंकल को ही देना है।

यार जादू

इधर बहुत दिनों से कुछ ऐसा फँसे रहे कि कोई कविता नहीं सुना पाये हम तुम्हें। तुम्हारी आज की पोस्ट पढ़कर फिर एक कविता निकल आयी है । लो पकड़ो।
:
मम्मी माँ मम्मा अम्मा, मइया माई
जब जैसे पुकारा, माँ अवश्य आई
कहा सब ने माँ ऐसी होती है माँ वैसी होती है
पर सच में, माँ कैसी होती है
सुबह सवेरे, नहा धोकर, ठाकुर को दिया जलातीं
हमारी शरारतों पर भी थोड़ा मुस्काती
फिर से झुक कर पाठ के श्लोक उच्चारती
माँ की यह तस्वीर कितनी पवित्र होती है
शाम ढले, चूल्हा की लपकती कौंध से जगमगाता मुखड़ा
सने हाथों से अगली रोटी के,
आटे का टुकड़ा
गीली हथेली की पीठ से,
उलझे बालों की लट को सरकाती
माँ की यह भंगिमा क्या ग़रीब होती है?
रोज-रोज, पहले मिनिट में पराँठा सेंकती
दूसरे क्षण, नाश्ते की तश्तरी भरती
तेज क़दमों से, सारे घर में, फिरकनी सी घूमती
साथ-साथ, अधखाई रोटी, जल्दी-जल्दी अपने मुँह में ठूसती
माँ की यह तस्वीर क्या इतनी व्यस्त होती है?
इन सब से परे, हमारे मानस में रची बसी
सभी संवेदनाओं के कण-कण में घुली मिली
हमारे व्यक्तित्व के रेशे से हर पल झाँकती
हम सब की माँ, कुछ कुछ ऐसी ही होती है।
किसने लिखी है, यह बताने के लिये "उड़न-तश्तरी" अंकल हैं ही !
हम तो बस ये सोच रहे हैं कि काश कोई एक "मामा-दिवस" भी होता ।
तुम्हारे
डॉक्टर मामा

5 comments:

Udan Tashtari said...

मामा भी कैसे सवाल पूछते हैं ताऊ से..जादू के ताऊ को जानते नहीं क्या जो ईला कुमार जी की कवित सुनाने चले आये:

http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%81_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0_/_%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0


मामा को कहो कि इस लिंक पर पढ़कर समीर अंकल को सुलखी के लड्डू खिलायें..कटरा वाले!!

रंजन said...

बहुत प्यार है.. और तुम्हारे पास तो और भी अच्छा लग रहा है...


प्यार

SANJEEV RANA said...

बहुत ही प्यारा
बहुत सुंदर

anitakumar said...

अरे वाह जादू गिटार तो बहुत अच्छा बजा लेते हो तुम, अब गिटार आधारित कोई अच्छा सा गाना भी सुनाओ

देवेश प्रताप said...

बहुत खूब ......जादू गिटार के साथ बहुत जच रहे है .....सुन्दर कविता

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

Lilypie - Personal pictureLilypie Second Birthday tickers

  © Free Blogger Templates Spain by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP