09 May 2010

'मदर्स-डे' पर जादू की चिट्ठी अपनी मम्‍मा के नाम

मम्‍मा!
आज 'मदर्स-डे' है। मुझे ये तो नहीं पता कि ये दिन क्‍यों मनाया जाता है, एक ही दिन क्‍यों मनाती है दुनिया 'मदर्स-डे'। क्‍योंकि मेरा तो हर दिन 'मदर्स-डे' है। मेरी तो सुबह भी आपके नाम से होती है और शाम भी।
 
मुझे पता है मम्‍मा..मैं आपको बहुत तंग करता हूं, पर आप कभी मुझ पर ग़ुस्‍सा नहीं होतीं। मैं रात में अकसर आपको जगा देता हूं...मुझे भूख लगी होती है। इसी तरह दोपहर को जब आपको नींद आ रही होती है....तब मेरा खेलने का मन करता है। मेरी वजह से आप सो नहीं पातीं। पर क्‍या करूं।

मुझे आपके साथ खेलना बहुत अच्‍छा लगता है।
ख़ासतौर पर आपके बाल खींचना।
अच्‍छा लगता है आपकी कान की बाली से खेलना। आपके कड़े या चूडियों से खेलना। आपकी गोद में उछलना। आपके साथ छिपा-छिपी खेलना। जब आप गाना गाके मुझे सुलाती हैं--तो मुझे बहुत मज़ा आता है। कई बार तो नींद नहीं भी आ रही होती है तब भी मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं। और थोड़ी देर बाद फिर से खोल लेता हूं। देखना चाहता हूं कि आप क्‍या कर रही हैं।

जब आप नहाने के लिए बाथरूम में जाती हैं, तो मैं डर जाता हूं कि मेरी मम्‍मा कहां चली गयीं। इसीलिए तो बाथरूम के सामने खड़े होकर आपको आवाज़ देता हूं। आपका इंतज़ार करता हूं। जब आप मेरे लिए मेरे बाथ-टब में पानी भरकर उसमें मुझे छोड़ देती हैं तो उसमें छपाक-छपाक खेलना भी मुझे बहुत पसंद है। पानी से मुझे खेलते देख आप कितनी ख़ुश होती हैं। ये सच है कि मैं थोड़ा ज्‍यादा शरारती हूं। कभी चावल का पैकेट बाल्‍टी में गिरा देता हूं। कभी पापा का पर्स बालकनी से नीचे फेंक देता हूं। कभी cupboard खोलकर पापा के सारे कपड़े बिखरे देता हूं। कभी पूरे घर में अख़बार बिखेर देता हूं तो कभी किचन में जाकर ट्रॉली खोलकर डिब्‍बों से खेलता हूं। पर ये सब मेरे लिए नई चीज़ें हैं ना। मुझे इनसे जान-पहचान करना अच्‍छा लगता है। इनसे बातें भी करता हूं मैं।
जब हम बाहर घूमने जाते हैं...तो गाड़ी में मैं आपको कितना तंग करता हूं...उछल-कूद मचाता हूं। पर आप मेरा कितना ख़्याल रखती हैं मम्‍मा। समय से मुझे खाना और पानी देती हैं। मुझे धूप से बचाती हैं आप। ये वाली तस्‍वीर कहां की है..आपको याद है ना मम्‍मा।
पता है मैं अकसर खेलते-खेलते 'डा...डो' (जा....दू) क्‍यों बोलता हूं। क्‍योंकि आप अलग-अलग तरह से 'जादू' कहकर मुझे बुलाती हैं। मैं अकेले में इसकी नकल करता रहता हूं। फिर ज़ोर से बोलता हूं---'डा....डो'। और आपको मज़ा आ जाता है। जब आप हारमोनियम निकालकर रियाज़ करती हैं तो मुझसे रहा नहीं जाता। मैं भी आपके साथ रियाज़ करना चाहता हूं।  
मैं तो नींद में भी आपसे बातें करता हूं मम्‍मा। जब आप मुझे खाना खिलाती हैं तो कभी-कभी अपने नए-नए दांतों से आपकी उंगली काट लेता हूं मैं। और इसमें मुझे बड़ा मज़ा आता है। सुबह अगर नींद खुले और आप नहीं दिखें तो मैं 'डर' जाता हूं। फिर बुरा-सा मुंह बनाकर रोता हूं। अगर आप दिख गयीं तो मेरे रोने पर अपने आप 'ब्रेक' लग जाता है और मैं हंस पड़ता हूं। आप मुझे हंसती हुई बहुत अच्‍छी लगती हो मम्‍मा।
एक दिन मैंने रेडियो पर आपकी आवाज़ सुनी। और मैं पहचान गया...अरे ये तो मेरी मम्‍मा हैं। पर मेरी समझ में ये नहीं आया कि आप इस डिब्‍बे में कैसे बोल रही हैं। आजकल आप ऑफिस नहीं जा रही हैं, पापा जाते हैं। उनकी आवाज़ रेडियो पर आती है तो आप मुझे बताती हैं। आवाज़ पहचानने को कहती हैं। इस खेल में कितना मज़ा आता है ना मम्‍मा। 
 मैं 'मदर्स-डे' पर आपको मुबारकबाद दे रहा हूं मम्‍मा।

 


मैं आपसे बहुत प्‍यार करता हूं। सच्‍ची।
आपका


'जादू'

18 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

सुन्दर प्रस्तुति
मातृ दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें . देश की सभी माताओं को सादर प्रणाम

आदेश कुमार पंकज said...

बहुत सुंदर
मातृ दिवस के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें और मेरी ओर से देश की सभी माताओं को सादर प्रणाम |

mukti said...

ओ जादू ! तुमने तो मुझे भी बचपन की याद दिला दी... भावुक कर दिया. तुम बहुत प्यारे हो. तुम्हारे मम्मी-पापा बहुत लकी हैं कि उन्हें तुम मिले और तुम भी बहुत लकी हो, जो तुम्हें इतने प्यारे मम्मी-पापा मिले... हैप्पी मदर्स डे !

पुनीत ओमर said...

बेहद मार्मिक.. ह्रदयस्पर्शी..

अनूप शुक्ल said...

बहुत सुन्दर। प्रस्तुति, लिखना और फ़ोटो भी।

Vivek Rastogi said...

वाह हम तो सचित्र जादू की कारीगरी और मम्मा का समर्पण देखते गये।

अजय कुमार said...

समस्त माताओं को सादर नमन

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

जादू आप बहुत अच्छे बच्चे हो.. आपके पापा-मम्मी को आप पर हमेशा गर्व रहेगा.. चो च्वीट :)

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति. बधाई.

राजेन्द्र मीणा said...

नन्हे ....जादूगर ..आप अपनी माँ के साथ -साथ हमें भी बहुत प्यारे हो ......दुनिया की हर माँ के चरणों में शत-शत नमन ...haapy mothers day

Manish Kumar said...

जादू जब बड़ा होगा और इसे पढ़ेगा तो उसे भी उतना ही आनंद आएगा जितना माता पिता के रूप में उसके क्रियाकलापों को देखकर आप लोगों को आ रहा है।

वन्दना said...

सुन्दर प्रस्तुति
मातृ दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें…………॥आपकी पोस्ट को कल के चर्चा मंच पर ले लिया गया है।

फ़िरदौस ख़ान said...

मां तुझे सलाम...

डॉक्टर मामा said...

यार जादू ,

इधर बहुत दिनों से कुछ ऐसा फँसे रहे कि कोई कविता नहीं सुना पाये हम तुम्हें। तुम्हारी आज की पोस्ट पढ़कर फिर एक कविता निकल आयी है । लो पकड़ो :

मम्मी माँ मम्मा अम्मा, मइया माई
जब जैसे पुकारा, माँ अवश्य आई
कहा सब ने माँ ऐसी होती है माँ वैसी होती है
पर सच में, माँ कैसी होती है
सुबह सवेरे, नहा धोकर, ठाकुर को दिया जलातीं
हमारी शरारतों पर भी थोड़ा मुस्काती
फिर से झुक कर पाठ के श्लोक उच्चारती
माँ की यह तस्वीर कितनी पवित्र होती है
शाम ढले, चूल्हा की लपकती कौंध से जगमगाता मुखड़ा
सने हाथों से अगली रोटी के,
आटे का टुकड़ा
गीली हथेली की पीठ से,
उलझे बालों की लट को सरकाती
माँ की यह भंगिमा क्या ग़रीब होती है?
रोज-रोज, पहले मिनिट में पराँठा सेंकती
दूसरे क्षण, नाश्ते की तश्तरी भरती
तेज क़दमों से, सारे घर में, फिरकनी सी घूमती
साथ-साथ, अधखाई रोटी, जल्दी-जल्दी अपने मुँह में ठूसती
माँ की यह तस्वीर क्या इतनी व्यस्त होती है?
इन सब से परे, हमारे मानस में रची बसी
सभी संवेदनाओं के कण-कण में घुली मिली
हमारे व्यक्तित्व के रेशे से हर पल झाँकती
हम सब की माँ, कुछ कुछ ऐसी ही होती है।

किसने लिखी है, यह बताने के लिये "उड़न-तश्तरी" अंकल हैं ही !

हम तो बस ये सोच रहे हैं कि काश कोई एक "मामा-दिवस" भी होता ।

तुम्हारे
डॉक्टर मामा

Gourav Agrawal said...

सुन्दर प्रस्तुति :)

मदर्स डे के शुभ अवसर पर ...... टाइम मशीन से यात्रा करने के लिए.... इस लिंक पर जाएँ :
http://my2010ideas.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

PD said...

इतने प्यारे बच्चे को मुझे एक चपत लगाने का मन करता है, अरे दरों मत प्यार वाली चपत कि बात कर रहा हूँ. :)
आपके डा मामा कि कविता बहुत बढ़िया है, मगर वह हर बार उड़न-तश्तरी अंकल को फंसा कर निकल लेते हैं.. :D

शुभम जैन said...

arree wah jitne sweet tum ho utna hi sweet tumhara naam...bachche to hote hi hai jaadugar...apni ek muskaan se na jane kitne rang bhar dete hai zivan me...jaadu ko bahut sara pyara aur aasirwaad...

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

अरे वाह जादू! तुमने तो बड़े बडे साहित्यकारों की छुट्टी कर दी!
बहुत बढ़िया लिखा।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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