02 May 2010

जादू का संडे-स्‍पेशल मौज-मस्‍ती बुलेटिन

  संडे को अमूमन पापा घर पर होते हैं। यानी ये दिन होता है मौज-मस्‍ती करने का। सबेरे सोकर उठा तो पापा ने कहा चलो सैर करके आते हैं। फिर हम गए गोराई-क्रीक जहां समुद्र के उस तरफ गोराई-विलेज से महिलाएं ताज़ा पत्‍तेदार सब्जियां लेकर आती हैं। मैंने पापा से कहा लौकी ताज़ा है, ले लीजिए। इलायची-केले (दक्षिण भारत या तटीय इलाक़ों वाले छोटे केले) बड़े अच्‍छे दिख रहे हैं, वो भी ले लीजिए। पत्‍ता-गोभी खाना सेहत के लिए अच्‍छा होता है, वो भी लीजिए। इस तरह पापा को सब्जियां ख़रीदवाईं मैंने। रास्‍ते में डॉगी दिखे, जिन्‍हें देखकर मैंने भू-भू किया। बिल्डिंग में मैं पूसी-कैट से भी बतियाया। उसने बताया कि आजकल गर्मी इतनी ज्‍यादा पड़ रही है कि दुबक कर ज़ीने (सीढियों) के नीचे बैठी हुई हूं।

अब बारी थी नाश्‍ते की। मम्‍मा ने मुझे नाश्‍ते में oats खिलाए। मुझे इस प्‍लेट में बिस्किट रखकर दे दिये गये थे। देखिए प्‍लेट से मैंने कैसे छिपा-छिपी खेलना शुरू कर दिया। IMG_6587IMG_6589इसके बाद हॉल में रखे अख़बारों पर मेरी नज़र पड़ी। पापा विविध-भारती पर कोई प्रोग्राम करते हैं जिसमें उन्‍हें अख़बारों, किताबों और इंटरनेट से जानकारियां जमा करनी पड़ती है। इसलिए हफ्ते भर के अख़बार उनके लिए बहुत अहम होते हैं। पर अख़बार तो मुझे बहुत समय से पसंद हैं। मौक़ा मिलते ही आजकल मैं अख़बारों के पुलिन्‍दे को बिखेर देता हूं। सिर्फ बिखेरता ही नहीं हूं। अख़बारों के एक-एक पन्‍ने को अलग-अलग कर देता हूं। देखिए उसके बाद मैंने अख़बारों का क्‍या हाल किया। हमेशा तो मम्‍मा मुझे रोक लेती हैं। पर पता नहीं क्‍यों आज उन्‍होंने मुझे रोका नहीं। बस हंसती रहीं।  IMG_6592 IMG_6594 IMG_6596 IMG_6597 IMG_6601अब इन अख़बारों को तारीख़वार जमाना बड़े ही धीरज का काम है। पापा-मम्‍मा के बस का तो नहीं है। लेकिन सच्‍ची आज मेरा संडे बड़ा-ही स्‍पेशल हो गया। 
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अब तक बड़ी देर हो चुकी थी। मुझे फिर-से भूख लग गयी थी। मम्‍मा ने मुझे apple काट-कर दिये। आजकल मैं हर चीज़ अपने हाथों से खाना पसंद करता हूं। इसलिए मम्‍मा मुझे टुकड़े करके दे देती हैं। एपल खाने का मेरा तरीक़ा क्‍या है, पता है? पहले एपल के टुकड़े को उठाइये। मुंह में डालिए। कुतरिये। रस चूस लीजिए। और लुगदी 'थू-थू' कर दीजिए। साफ-सफाई करने के लिए मम्‍मा हैं ना।
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मेरा संडे तो स्‍पेशल हो गया। आपने अपने संडे को स्‍पेशल बनाने के लिए क्‍या किया।


अब मैं फुटबॉल खेलने जा रहा हूं। मैं जादू हूं ना कुछ भी कर सकता हूं।

16 comments:

पारूल said...

जादू बाबू ..बड़े पढ़ाकू

ललित शर्मा said...

वाह भाई! जादू ने तो आज सारे अखबार पढ लिए।
ढेर सारा प्यार बेटा।

संगीता पुरी said...

मुझे जादू नहीं आती न .. मैं संडे को स्‍पेशल कैसे बनाऊं ??

Vivek Rastogi said...

अरे वा जादू का संडे स्पेशल बहुत अच्छा लगा।

विनीत कुमार said...

बहुत सही दिशा में जा रहे हो जादू।..जारी रखो।.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वाह! क्या स्पेशल संडे हैं। काश! हम भी ऐसा संडे मनाते। पर हम जब आप की उमर के थे तो अखबार घरों तक मुश्किल से पहुँचते थे।

Sanjeet Tripathi said...

shandar miyan jadu, machaye raho dhamaal. manate raho aise hi sunday

RAJNISH PARIHAR said...

अरे वा जादू का संडे स्पेशल बहुत अच्छा लगा।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

बेटे, जरा संभल के। ये मम्मी-पापा तुमसे काम करा रहे हैं। सावधान नहीं रहे तो धीरे धीरे पढ़ाई में भी जोत देंगे! :)

माणिक said...

पिताजी पर गया है क्या.पढ़ाकू निकलेगा

सादर,

माणिक
अपनी माटी
माणिकनामा

Dinesh Dard said...

(जादू ये बातें तुम्हारे लिए)

दोस्त ! बहुत ख़ुशनसीब हो तुम. तुम्हारे मम्मा-पापा अपनी मुस्कान की वजह तुम्हें मानते हैं. और ये दौलत दुनिया भर में तक्सीम भी करना चाहते हैं. मेरे दोस्त ! अभी बहुत छोटे, बहुत ही छोटे हो तुम. अभी तुम अखबार पढ़ो या फाड़ दो, ज़िद करो या रूठ जाओ. जो करना है कर लो. एप्पल खाओ या कुछ और फरमाइशी चीज़ पर टूट पड़ो. चाहे जैसे, चाहे जितना खाओ...खाओ तो खाओ या फेंक दो क्यूंकि तुम ख़ुशनसीब हो "दोस्त". वर्ना अपनी दुनिया में तुम जैसे बहुत से बच्चों को मनपसंद खाना तो दूर, खाने के नाम पर खाने जैसा कुछ भी मयस्सर नहीं होती. और तो और उन्हें मनपसंद खाना तो दूर कभी-कभी माँ-बाप तक नहीं मिलते. और शायद इनकी पूरी ज़िंदगी में कोई सन्डे या मंडे "स्पेशल" वाला दिन भी नहीं आता.

अब आपके (यूनुस भाई) लिए :-
भाईजान ! नमस्कार.
मेरा नन्हा दोस्त यानी "जादू" आपके और भाभी के लिए क्या है, ये बताने के लिए मुझे लफ़्ज़ों को परीशां करने की ज़रुरत महसूस नहीं होती. मेरे ख़याल से फरिश्तों (बच्चे फ़रिश्ता ही तो होते हैं) की मौजूदगी ही ख़ुद हज़ारहा पन्नों की हदीस (अल्लाह मुझे मुआफ करे) होती है.

ख़ैर ! जादू की शरारतों भरी तस्वीरें देखीं तो अपना वो बचपन जिसमे याद करने जैसा ज़ियादा कुछ भी नहीं, याद आ गया और मैं तड़पकर बेख़ुदी में न जाने क्या-क्या लिखता चला गया. लेकिन फिर मिटाने को जी भी नहीं किया. हाँ ! आपसे इतना ज़रूर कहूँगा कि "जादू" के नाम लिखा ये ख़त उसका बचपन गुज़र जाने तक उसकी हद से दूर रखिएगा क्यूंकि उसमें "जादू" की उम्र के लिहाज़ से काफी तल्ख़ बातें लिक्खी हैं. लेकिन उसके बड़े होने पर अगर ज़रुरत पड़े (अल्लाह करे कि ना पड़े) तो उसे ये ख़त ज़रूर बताइएगा. फिलवक्त इतना ही. फिर किसी और दिन किसी और बहाने अपनी खूँबार अँगुलियों से कोई और पन्ना सुर्ख करूँगा.

चलते-चलते डॉ.बशीर "बद्र" साहब का एक मशहूर शेर उनसे उधार लेकर लिखता चलूँ कि -

"उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवाओं में,
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते"

अल्लाह जादू को हर बुरी नज़र से बचाए.

रंजन said...

केवल तुम्हारे लिए..

प्यार...

aradhana said...

तभी मैं कहूँ इत्ती से उमर में जादूजी को इतना ज्ञान कैसे है. अखबार जो पढ़ते हैं, इत्ते ढेर सारे. वैसे जादूजी की कोई गलती नहीं. इनके मम्मा-पापा को अखबार ऐसे ज़मीन पर रखने ही नहीं चाहिये थे. अब अखबार ज़मीन पर हैं, तो जादूजी को तो पढ़ना पड़ेगा ही.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

:):) सारे न्यूज सडी हुयी है.. सब फ़ाडके फ़ेक दो.. कोई भी तो अच्छी न्यूज नही लिखता.. :)

annapurna said...

जादू, तुम्हारे अंगना में पहली बार आना हुआ।
अब गाना मत शुरू कर देना - मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम हैं...

आती रहूंगी जब तब तुमसे खेलने...
बाय !

baby kumari said...

bahut dino bad dikhe ho jadoo! god bless u dear. hmesha khush rho swastha rho.

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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