23 December 2010

जादुई रंगों वाली किताब

पिछले एक महीने से मैं एकदम ग़ायब ही था। मम्‍मा का बर्थडे बनाने के बाद मैं अपने ब्‍लॉग पर आया ही नहीं। हुआ यूं कि मैं ज़रा बिज़ी हो गया था।

मम्‍मा ऑफिस जाने लगी हैं। और मैं 'बेबी-सिटिंग' जाता हूं। पहले पहले तो मुझे समझ नहीं आता था कि मम्‍मा रोज़ रोज़ मुझे छोड़कर कहां जाती हैं। पर अब मुझे समझ में आ गया है कि मम्‍मा ऑफिस जाती हैं। कभी-कभी तो मैं भी मम्‍मा-पापा के साथ ऑफिस चला जाता हूं। वहां खेलने में बहुत मज़ा आता है। जब मम्‍मा-पापा रेडियो प्रोग्राम कर रहे होते हैं तो मैं कंट्रोल-रूम से उन्‍हें देखता भी रहता हूं।

बेबी-सिटिंग वाली आंटी के यहां जाकर मैं बहुत मस्‍ती भी करता हूं, खेलता हूं और सो भी जाता हूं। ये अलग बात है कि किसी किसी दिन मेरा मन करता है कि मैं मम्‍मा-पापा के साथ ही रहूं।

डॉक्‍टर मामा ने इलाहाबाद से मेरे लिए जून में 'जादुई रंगों वाली किताब' भेजी थी। और मम्‍मा ने मुझसे पहले भी थोड़ी पेन्टिंग करवाई थी। पर इस दौरान जब मैं अपने ब्‍लॉग से ग़ायब था...मैंने बहुत सारी जादुई पेन्टिंग की। बस ब्रश से पानी लगाकर इस जादुई किताब पर फेरना पड़ता है। और सब चीज़ों के रंग उभर आते हैं।
4मैंने फौरन ही समझ लिया कि ये पेन्टिंग कैसे की जाती है। वैसे भी पानी को कोई भी  खेल हो वो मुझे बहुत पसंद आता ही है। आजकल मैं नहाने से पहले बाथरूम में भी पानी से खेलना चाहता हूं।
1 2और ये लीजिए तैयार हो गयी पेन्टिंग। कितनी सुंदर है ना ये bird.  3   ये रही मेरी दोनों 'जादुई रंगों वाली किताबें'। 5और आपको ये भी तो बताना है कि आजकल मैं सिर्फ painting नहीं करता। drawing भी करता हूं। पापा मेरे लिए बड़ी बड़ी ड्रॉइंग-बुक लाए हैं। और साथ में प्‍लास्टिक वैक्‍स कलर्स भी।

6मेरी मानिए आप भी ड्रॉइंग और पेन्टिंग शुरू कर दीजिए। इससे आपको सारे टेन्‍शन से छुटकारा मिल जाएगा। 

अच्‍छा अब मैं चलता हूं। चम्‍मच से पोहा खाने की प्रैक्टिस करनी है मुझे।  

16 November 2010

आज मेरी 'मम्‍मा' का जन्‍मदिन है।

पता है....आज मेरी मम्‍मा का जन्‍मदिन है।
वैसे तो दो ढाई साल की छुट्टियों के बाद मम्‍मा अब ऑफिस जाने लगी हैं। और मुझे कुछ घंटों के लिए 'बेबी सिटिंग' वाली आंटी के पास रहना पड़ता है। पर मम्‍मा तो मम्‍मा हैं ना। आज जन्‍मदिन पर मेरे साथ रहने के लिए मम्‍मा-पापा ने छुट्टी ले रखी है। देखिए सुबह-सुबह मैंने मम्‍मा को कैसे हैपी-बर्थडे कहा।
IMG_8128मम्‍मा को बड़ा मज़ा आया। मम्‍मा कहती हैं कि आजकल मेरी शरारतें बढ़ती जा रही हैं। नीचे जाकर मैं बिल्‍ली मौसी की पूंछ खींच आता हूं। डॉगी को चिढ़ा कर आ जाता हूं। किचन की ट्रॉलीज़ को अस्त-व्‍यस्‍त कर देता हूं। अभी दो-तीन दिन पहले मैं ट्रॉली से अजवाइन का डिब्‍बा निकाल लिया और उसे खोल दिया। बस....उसके बाद मम्‍मा बेचारी अजवाइन साफ करती रह गयी। इससे पहले राई, ज़ीरा, मूंग की दाल, देसी-घी और ना जाने किन किन चीज़ों को मैं ऐसे ही गिरा चुका हूं। लेकिन आज मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला। मम्‍मा का बर्थडे है ना। उन्हें परेशान करना अच्‍छी बात नहीं है। है ना। 

ये तस्‍वीर देखी आपने। इसमे मैं मम्‍मा को राग चारूकेशी सिखा रहा हूं।
6वैसे जब जिक्र चल ही पड़ा है तो आपको अपनी ताज़ा शरारतों के बारे में बता दूं। आजकल जब मम्‍मा घर पर होती हैं तो मैं उनसे कहता हूं कि मुझे 'शू-शू' लगी है। मम्मा मुझे बाथरूम में ले जाती हैं। और वहां पहुंचते ही मैं फौरन पानी से खेलना शुरू कर देता हूं। पहले मम्‍मा समझ नहीं पाती थीं। पर आजकल समझ जाती हैं कि मैं पानी से खेलने का बहाना बना रहा हूं।

ये तस्‍‍वीर देखिए मैं मम्‍मा के साथ बीकाजी की जलेबी का स्‍वाद ले रहा हूं।  IMG_7147
एक और शरारत बताऊं। मम्‍मा ऑफिस जाती हैं इसलिए अब उनके पर्स में हमेशा पेन रहते हैं। और मुझे पता है कि वो पेन कहां रखती हैं। कल पता है मम्‍मा ऑफिस पहुंचीं तो पाया कि पेन का निचला हिस्‍सा बाक़ी है। ऊपरी हिस्‍सा, स्प्रिंग और रीफिल मैंने निकालकर फेंक दी है। आजकल मम्‍मा-पापा गाड़ी में एक्‍स्‍ट्रा पेन रखते हैं। घर में तो मेरे रहते पेन-पेन्सिल की ख़ैर नहीं होती।
 
और इस तस्‍वीर में मम्‍मा के साथ शरारत।


IMG_7504
यहां मम्‍मा मुझे ABCD सिखा रही हैं। वैसे मैं मम्‍मा को रोज़ न्‍यूज़पेपर देता हूं पढ़ने के लिए। बस दिक्‍कत ये है कि मैं पहले उसे पढ़ लेता हूं। उसके बाद वो मम्‍मा के पढ़ने लायक़ कितना रहता है--ये आप समझ सकते हैं। IMG_7517मम्‍मा-पापा से मैं हमेशा नीचे घूमने चलने की जिद करता रहता हूं क्‍योंकि मुझे घूमना बहुत पसंद है। नीचे जाते ही मैं गेट की तरफ भागता हूं। और मम्मा को दौड़ाता रहता हूं। मम्‍मा को मैं अकसर बहुत थका देता हूं। फिर उनके पैर भी दबाता हूं। आज मम्‍मा को परेशान नहीं करना है। उनका जन्‍मदिन है ना आज।  IMG_7545आजकल मैंने एक नया काम सीखा है। और वो है dusting का काम। मुझे जब भी कोई छोटी तौलिया या रूमाल या और कोई कपड़ा नज़र आता है तो मैं उससे चीज़ें साफ़ करने लगता हूं। बीच बीच में अपनी नाक भी साफ़ कर लेता हूं उससे। ये बड़ा मज़ेदार काम है। कभी आप भी करके देखिए। उसके बाद वो कपड़ा वॉशिंग मशीन में डाल दीजिएगा धुलने के लिए। क्‍योंकि मैं तो ऐसा ही करता हूं।

पर आज नहीं। आज मम्‍मा को परेशान नहीं करना है।  
IMG_7588 मैंने सोचा तो है कि आज मम्‍मा को ज़रा भी परेशान नहीं करना है। मम्‍मा के लिए पापा और मैंने मिलकर गिफ्ट भी लिए हैं। और शाम को हम पार्टी भी करने वाले हैं।

मैं जा रहा हूं मम्‍मा के लिए जलेबी लाने।
IMG_7783इस तस्‍वीर में है खोवे की जलेबी। ये तस्‍वीर पापा ने जबलपुर में खींची थी। अन्‍नपूर्णा आंटी आपने पूछा था कि खोवे की जलेबी क्‍या होती है। ये देखिए। इसे कहते हैं खोवे की जलेबी। 

मम्‍मा को मेरी तरफ से हैपी-बर्थडे।


चलता हूं। बहुत काम है।


मैं जादू हूं ना..मैं कुछ भी कर सकता हूं। 

05 November 2010

दीवाली पर बिल्‍ली मौसी ने की जादू से एक request.

पता है, कल मंगेश अंकल का जन्‍मदिन था। मैं पापा-मम्‍मा को लेकर उनके घर बोरीवली ईस्‍‍ट गया। और वहां मैंने उनके साथ केक भी काटा। ये देखिए मैं केक के एकदम क़रीब मौजूद हूं। आप सब तो जानते ही हैं कि मुझे केक कितना पसंद है। कल मैंने मंगेश अंकल के घर जमकर केक खाया।  

IMG_7954 केक के अलावा जो दूसरी चीज़ मेरी फेवरेट है वो है आइसक्रीम। मम्‍मा और मुझे आइसक्रीम बेहद पसंद है। पापा गला ख़राब होने के डर से अकसर आइसक्रीम avoid करते हैं। पर इतनी अच्‍छी चीज़ को भला मैं क्‍यों avoid करूं। मंगेश अंकल और शिल्‍पा आंटी ने मेरे लिए ख़ास तौर पर कुल्‍फी मंगवाई थी। इसलिए मैंने जमकर कुल्‍फी खाई। और जब अपनी कुल्‍फी खा ली तो बाक़ी लोगों से अपना 'शेयर' मांगने में भी संकोच नहीं किया।
IMG_7973अब आज सबेरे की बातें। आज सबेरे-सबेरे मैं पापा के साथ नीचे घूमने गया। पापा गाड़ी में फूलों की माला लगाने गए थे। इस दौरान मैं मस्‍ती करता रहा।
IMG_8001फिर मैंने देखा कि पार्किंग-लॉट में एक बाइक पर बिल्‍ली-मौसी विराजमान हैं। बिल्‍ली मौसी से मेरी अच्‍छी-ख़ासी दोस्‍ती है। जब भी मैं कहीं से वापस आता हूं तो सबसे पहले अपनी बिल्डिंग में रहने वाली बिल्‍ली मौसी को ज़रूर देखता हूं। कभी खिड़की पर तो कभी किसी घर की बालकनी पर नज़र आ जाती हैं वो। आज तो बाइक पर नज़र आ गयीं। 
IMG_7985

बाइक पर आपको बिल्‍ली मौसी ठीक से दिख रही होगी इसलिए ये लीजिए उनका क्‍लोज़-अप फोटो। अकसर पार्किंग-लॉट में बिल्‍ली मौसी किसी स्‍कूटर, बाइक या कार पर बैठी नज़र आ जाती हैं। 


IMG_7987-1पहले मैंने बिल्‍ली मौसी को दूर से देखा। बिल्‍ली मौसी ने मुझे देखते ही पहचान लिया और कहा--'म्‍याऊं म्‍याऊं...मैं सारे चूहे खा जाऊं.....म्‍याऊं म्‍याऊं जादू....हैपी दीवाली। और हां रात को बम मत फोड़ना। मुझे बहुत घबराहट होती है बमों की आवाज़ से'। मैंने बिल्‍ली मौसी से वादा किया है मैं ख़ुद भी बम नहीं फोड़ूंगा और दूसरों को भी मना करूंगा।
IMG_7987फिर मैंने बिल्‍ली मौसी से कहा कि अब मैं चलता हूं। देर हो रही है। दरअसल मैं पापा के साथ बाइक पर घूमने आया हूं। आजकल मुझे गाड़ी के बजाए बाइक पर घूमना बहुत पसंद है। हालांकि पापा को ये ख़तरनाक लगता है। पर एकदम सुबह कभी-कभी वो मुझे बाइक पर ले जाते हैं। बिल्‍ली मौसी ने मुझसे हाथ मिलाया और मुझे 'हैपी दीवाली' भी कहा। मैंने कहा कि शाम को मिलते हैं। मैं आपके लिए दूध-मिठाई लाऊंगा।   
IMG_7989तो इस तरह बिल्‍ली-मौसी से सुबह-सुबह बड़ी अच्‍छी मुलाक़ात रही। उन्‍होंने हम बच्‍चों से एक request भी की है, आवाज़ वाले पटाख़े ना फोड़ने की। हम सभी बिल्‍ली मौसी की बात मानेंगे। और कोशिश करेंगे कि हमारी दीवाली से उन्‍हें दिक्‍कत ना हो।  

IMG_7996इस तस्‍वीर में मैं पापा से कह रहा हूं कि बाइक लेकर चलिए।
अभी-अभी मैं अमृतसर की यात्रा से लौटा हूं। जल्‍दी ही इस सफर का ब्‍यौरा और तस्‍वीरें आपको दिखाता हूं।

पिछले महीने बहुत बिज़ी रहा। मुझे आजकल बच्‍चों को होने वाली बीमारी hand foot mouth हो गयी थी। एक हफ्ते में अपने आप वो ठीक हो गई। उसके बाद खाने की किसी चीज़ से एलर्जी हो गई है। मम्‍मा ने एक डायरी बनाई है और नोट कर रही हैं ताकि पता चले कि किस चीज़ से एलर्जी हुई है। शायद गाय के दूध से है एलर्जी।

अच्छा चलता हूं। बहुत काम है। पूरे घर को सजाना है।
आप सभी को दीपावली को हार्दिक शुभकामनाएं।

24 September 2010

जादू और गणपति बप्‍पा

पता है जबलपुर से लौटने के बाद मैं और भी बदमाश हो गया हूं। आजकल मेरी एक नई शरारत शुरू हुई है और वो है चीज़ों को उठाकर खिड़की से नीचे फेंक देना। उस दिन पापा ऑफिस से लौटे तो देखा कि मेरा बैट, हॉकी और मेरी एक चप्‍पल नीचे पड़ी है। उससे पहले मैंने एक दिन अपनी एक बुक नीचे फेंक दी थी। इसलिए पापा ने सोचा है कि घर की खिड़कियों पर 'पिजन नेट' लगवा दी जाए। ताकि ना तो कबूतर आ सकें और ना ही मेरी फेंकी चीज़ें नीचे जाएं।

गणपति-विसर्जन के दिन बड़ा मज़ा आया। पापा मुझे लेकर डॉन-बॉस्‍को स्‍कूल तक गए। आजकल पापा बाइक से जायें या गाड़ी से--मुझे उनके साथ जाना ही पड़ता है। मैं हर वक्‍त उनके साथ लगा रहता हूं ताकि घूमने जाने मिले। हां तो...मैं बाइक पर डॉन-बॉस्‍को स्‍कूल वाले स्क्वायर तक गया। और रास्‍ते में जहां भी बैंड बजता नज़र आया मैं हाथ हिला-हिलाकर डान्‍स करता रहा।

फिर लौटकर आए तो पापा ने कहा कि बिल्डिंग के सामने ही टहला जाए। जैसे ही एक गणपति-मंडल का कारवां सामने आया--बस मैं डान्‍स करने लगा। सब लोग मेरे साथ डान्‍स करने के लिए बेक़रार थे। बहुत लोगों के साथ उस दिन मैंने डान्‍स किया। IMG_7858सब लोग कहते हैं कि जादू के कान गणपति बप्‍पा जैसे हैं। इसलिए मैंने सोचा कि चलकर देखा जाए। उसके बाद एक जगह तो मैं झांकी वाले ट्रक पर ही बैठ गया। बड़ा मज़ा आया। मैंने गणपति बप्‍पा को प्रणाम भी किया। इसका वीडियो आगे है ज़रूर देखिएगा।  
IMG_7861मैं लगातार दौड़ दौड़कर पापा-मम्‍मा को दौड़ाता रहा। फिर पापा को लगा कि 'जादू' थक गया होगा--तो देखिए पापा ने किया इंतज़ाम जादू की शान की सवारी का।  
IMG_7866 और ये रहा गणपति बप्‍पा मोरया वाला मेरा वीडियो।


मैंने पापा से कितनी बार कहा है कि मेरे वीडियो एडिट करके तैयार कर दीजिए। ताकि मैं अपने वीडियोज़ आपको दिखा सकूं। पूरे एक-डेढ़ साल के वीडियो ऐसे ही पड़े हैं। ये वीडियो मैंने पापा के पीछे लगकर उनसे crop करवाया है ताकि आप आसानी से देख पाएं।

मैं जादू हूं ना मैं कुछ भी कर सकता हूं।

और हां कल आपको बताऊंगा जबलपुर में कैसे बुआ के साथ मैंने 'जैम' पोता अपने मुंह पर।

13 September 2010

जादू ने मनाई ईद और चाचू को दी 'ईदी'

 

 

 

जबलपुर में आपके जादू की मस्‍ती जारी है। 'गैया' और 'भैया' के साथ तो जादू रोज़ ही खेलता है। पर ईद के दिन बड़ा मज़ा आया। मैं बाक़ायदा कुर्ता-पैज़ामा-जैकेट पहनकर तैयार हो गया। देखिए तैयार होकर  मैं कैसा लग रहा था। 

  IMG_7725 IMG_7727 
ईद के दिन मैंने खूब सिवईं खाईं। सबसे 'ईदी' भी मिली मुझे। मैंने पहले सही अपने सारे पैसे अपनी 'गुल्‍लक' में डालना सीख लिया है। मेरी गुल्‍लक तेज़ी से भरती जा रही है।  

अब ईद के एक दिन पहले की एक मज़ेदार बात सुनिए। सब लोग अपनी बातों में मगन थे। मुझे अचानक मौक़ा मिला और वो भाग निकले। अब सबको मेरी आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। पर मैं नज़र नहीं आ रहा था। दादाजी सड़क की तरफ़ भागे। दादी दूसरी तरफ़। शेबी दीदी छत पर गयी। मम्‍मा एक कमरे में। पापा दूसरे कमरे में। सबके सब मुझे खोज रहे थे। आखिरकार पता चला कि मैं बाथरूम में एक बाल्‍टी से दूसरी बाल्‍टी में पानी डाल रहा था। और साथ में गाना भी गा रहा था। सबके सब इस नज़ारे को देखकर ख़ूब हंसे। ये जो ऊपर की तस्वीर में कुर्ता-पज़ामा दिख रहा है ना...ये पूरी तरह से गीला हो गया। फिर मेरे कपड़े गीले हो गए। 

ईद की शाम जब सब लोग मिलकर गप्‍पें कर रहे थे तभी अचानक फाजिल भैया डॉगी बनकर मुझे डराने लगे। मैंने उन्‍हें दौड़ाया। पर फिर मैं उनके ऊपर चढ़ गया और 'घोड़ा-घोड़ा' खेलने लगा। लेकिन मज़ा नहीं आ रहा था। इसलिए पापा ने कहा, मैं घोड़ा बनता हूं। अब मैं और फ़ाजिल भैया पापा की पीठ पर चढ़ गए और पापा को 'घोड़ा' बनाकर खूब खेले। ये नज़ारा देखकर दादा-दादी, मम्‍मा, बुआ, चाचा-चाची, शेबी दीदी सबको बड़ा मज़ा आया। देखिए पापा भी घोड़ा बनकर कैसे हंस रहे हैं।    
IMG_7747इसके बाद तो एक और मज़ेदार बात हुई। बबलू चाचू के पास दो मोबाइल हैं। एक बड़ा अच्‍छा और दूसरा उतना ही पुराना। चाचा इस हैन्‍डसेट को बदलने की ही सोच रहे हैं। पर आलस और लापरवाही की वजह से बदल नहीं रहे। ये हैन्‍डसेट मेरे हाथ लग गया। और मैं इससे फोन-फोन खेलने लगा। फिर सबने कहा 'जादू इस मोबाइल को फेंक दो'। मैं पहले तो समझ नहीं पाया कि ऐसा क्‍यों कहा जा रहा है। पर फिर मैंने सबकी बात मान ली और उसे फेंक दिया। फिर उठाया, फिर फेंका। कई बार फेंकने के बाद वो मोबाइल बेहोश हो गया। ये देखिए मोबाइल का आखिरी नज़ारा। इस तरह मैंने चाचू को ईदी दी। अब वो नया मोबाइल ख़रीदेंगे ना। समझ लीजिए कि वो नया मोबाइल मैंने ही दिलाया है।    

IMG_7751अगर आपके घर में कोई है जो पुराना हैन्‍डसेट इस्‍तेमाल कर रहा है और आलस या लापरवाही जैसी किसी वजह से उसे बदल नहीं रहा है तो मुझे बुला लीजिएगा। उस हैन्‍डसेट के इतने या इससे ज्‍यादा टुकड़े होने के गारन्‍टी लेता हूं मैं। मैं जादू हूं ना मैं कुछ भी कर सकता हूं।

कल मैंने जबलपुर में कई ब्‍लॉगरों से मुलाक़ात की 'सिटी कॉफी हाउस' में। बड़ा मज़ा आया। मैंने सबसे ब्‍लॉगिंग के बारे में कई गंभीर बातें सुनीं। 'बवाल' अंकल जब क़व्‍वाली गा रहे थे तब मैंने डान्‍स भी किया। एक और अंकल हैं, जिनका नाम याद नहीं शायद शुक्‍ला अंकल....उनके लोकगीत गाने पर मैं एकदम सन्न होकर सुनता रहा। कल की शाम यादगार रही मेरे लिए। 

आज शाम मैं मुंबई के लिए रवाना हो रहा हूं। मुंबई पहुंचकर अपनी ख़बर देता रहूंगा।
अब चलता हूं मुझे दादी की क्‍यारियों में पानी देना है।  

10 September 2010

जबलपुर यात्रा 2 : भैया और गैया

आप तो जानते ही हैं कि आजकल मैं अपने दादा-दादी के पास जबलपुर आया हुआ हूं। जबलपुर पहुंचते ही मैंने बहुत शरारत शुरू कर दी है। यहां के बड़े और खुले-खुले से घर में दौड़ने में मुझे बड़ा मज़ा आता है। वैसे मेरा सारा ध्‍यान आजकल बाहर घूमने में रहता है। क्‍योंकि बाहर निकलते ही कभी डॉगी दिखता है तो कभी म्‍याऊं तो कभी गैया और कभी कभी चूं चूं चिडिया। दादी की क्‍यारियों में तो तितलियां भी आती हैं। इसलिए कभी शेबी दीदी तो कभी शाना बुआ और अकसर दादाजी के साथ मैं घर से बाहर निकल जाता हूं। और घूम फिर कर वापस आ जाता हूं।

बेड, कुर्सियों, सोफे और मसहरी पर चढ़ना सीख लिया है मैंने। इस काम में फ़ाजिल भैया मेरा साथ निभाते हैं। एक मज़ेदार बात और हुई है। शेबी दीदी फाजिल भैया की बड़ी बहन हैं और बड़ा होने के नाते वो हमेशा फाजिल भैया पर रौब जमाती रहती हैं। ऐसे में बेचारे फाजिल भैया को बड़ा शौक़ है कि वो भी किसी के बड़े भैया हों। और उनकी ये तमन्‍ना मैंने पूरी करवाई है। मेरे आते ही सबने फाजिल भैया को बताया कि मैं उनका छोटा भाई हूं। उसके बाद वो बदमाशियां छोड़कर 'जिम्‍मेदार' बन गए हैं। अब वो स्कूल से वापस आकर टी.वी. नहीं चलाते बल्कि मेरे साथ खेलते हैं। स्‍कूल जाने से पहले वो मुझे देखने आते हैं। पर उस वक्‍त मैं सो रहा होता हूं।

हां तो आजकल हर वक्‍त मेरे साथ होते हैं फाजिल भैया। मेरी हर बदमाशी और शैतानी के साथी। IMG_7719
उन्‍होंने अपने खिलौने भी मुझे दे दिए हैं खेलने के लिए। और मेरे खिलौने तो हैं ही। हम दोनों मिलकर घर में तूफान मचाए रहते हैं। बेचारी शेबी दीदी...हमसे बड़ी है पर हम उसे भी तंग कर डालते हैं। वो भी मेरे साथ खूब खेलती हैं। मुझे गोद में उठाकर वो घुमाने ले जाती हैं।

पापा, बबलू चाचा और हम सब बच्‍चे मिलकर घर में हंगामा मचाए रहते हैं। ये देखिए ऐसा ही एक नज़ारा:
IMG_7691अब आज सबेरे का किस्‍सा सुनिए। एकदम सबेरे-सबेरे मैं दादाजी के साथ पोर्च में खेल रहा था। दादी की लगाई क्‍यारियां देख रहा था। और दौड़ रहा था।
IMG_7699तभी एक गैया आ गयी जिसे रोज़ हमारे घर से रोटियां मिलती हैं। मैंने कहा मैं गैया को रोटी खिलाऊंगा। मुंबई में फ्लैट में कहां गैया आएगी। ये मेरे लिए सुनहरा मौक़ा था। और मैं गैया के साथ खूब खेला। IMG_7711इसका मतलब ये हुआ कि जबलपुर में मैं दो लोगों के साथ खूब खेला। एक फाजिल भैया और दूसरी ये वाली गैया।

अन्‍नपूर्णा आंटी ने पूछा है कि 'खोए की जलेबी' क्‍या होती है। ज़रा इंतज़ार कीजिए। मैं तस्‍वीर सहित आपको बताऊंगा। तब आप कहेंगी कि इंतज़ार का फल 'मीठा' होता है। अब मैं चला भैया और गैया के साथ खेलने क्‍योंकि मैं जादू हूं ना, मैं कुछ भी कर सकता हूं।  

अरे अरे, एक बात तो सुन लीजिए। कल मीठी ईद है। आप सभी को ईद की बहुत बहुत मुबारकबाद।  

09 September 2010

जादू पहुंचा अपनी ददिहाल जबलपुर

पता है कल सबेरे-सबेरे मैं अपने दादा-दादी के पास जबलपुर पहुंच गया।
मैं पहली बार अपने दादा-दादी के पास आया हूं। जबलपुर तक का ये सफ़र मेरे लिए आसान नहीं रहा। कल रवाना होते वक्‍त सबसे बड़ी दिक्‍कत ये हुई कि मुंबई में ऑटो और टैक्‍सी की हड़ताल हो गई। हमें तो टैक्‍सी से ही छत्रपति शिवाजी टर्मिनस यानी वी.टी. तक आना था। बहरहाल...तरकीब ये निकाली गई कि प्रदीप अंकल हमारी गाड़ी में साथ में बोरीवली स्‍टेशन जायेंगे और फिर गाड़ी लेकर वापस आ जाएंगे। 

प्रदीप अंकल ऑफिस से निकलकर आए, थोड़ा उनका इंतज़ार भी करना पड़ा और किसी तरह हम पहुंचे बोरीवली स्‍टेशन। एक बार फिर टैक्‍सी वालों से बात की गई। पर कोई राज़ी नहीं था। प्राइवेट टैक्सियों वाले भी जाते हुए डर रहे थे। इसलिए तय हुआ कि लोकल-ट्रेन से जाना ही ठीक रहेगा। यूं तो लोकल-ट्रेन में मैं दूसरी बार बैठा था। पर मुझे इस बार भी बहुत मज़ा आया। IMG_7652हमारे पास समय कम था। और धीमी लोकल से हम पहुंचने वाले थे दादर। जहां ट्रेन दो ही मिनिट रूकती है। डेढ़ बजे दादर पहुंचे। अब सिर्फ पंद्रह मिनिट थे हमारे पास। अच्‍छी बात ये थी कि मेरे भारी-भरकम सूटकेस को उठाने के लिए अचानक ही एक कुली-अंकल मिल गये थे। और उन्‍होंने हमें ना केवल समय पर प्‍लेटफार्म पर पहुंचाया बल्कि ठीक से सामान भी जमा दिया। इस दौरान मैंने पापा-मम्‍मा को ये बातें करते सुना कि अगर गाड़ी छूट गयी तो किसी और गाड़ी में इंतज़ाम कर लेंगे।

इस दौरान कोई टेन्‍शन में नहीं आया। ना मैं, ना मम्मा-पापा। बैठते ही गाड़ी चल पड़ी। और मुझे मिल गयी विन्‍डो सीट। ये देखिए। विन्‍डो-सीट का 'जादू'।
IMG_7653जादू ट्रेन में जाए और मस्ती ना करे--ऐसा कैसे हो सकता है। इस पूरे सफ़र में मैंने सबसे दोस्‍ती कर ली। पूरी बोगी में सारे लोग यही कह रहे थे--'जादू यहां आओ' 'जादू ऊपर मत चढ़ो' 'जादू बिस्किट खाओगे' 'जादू टॉफी खाओगे'। सबने मेरा बहुत ख़्याल रखा। इससे सबसे ज्‍यादा राहत मिली मम्‍मा को। दोपहर को उन्‍होंने थोड़ी नींद ले ली। इस दौरान पापा मुझ पर 'नज़र' रखे हुए थे।     
IMG_7660जब दौड़ते-कूदते बोर हो गया तो ख़ाली मिडिल बर्थ बैठकर अपना ब्‍लॉक वाला गेम खेला। और जब इससे भी बोर हो गया तो सारे ब्‍लॉक उठा-उठाकर फेंके। ज़ाहिर है कि सबने ब्‍लॉक उठा-उठाकर दिये।  
IMG_7664

ट्रेन में मैंने खाना भी खाया। अब आप ये तो जानते ही हैं कि मै बिना शरारत के कोई काम नहीं कर सकता। खाना खाते वक्‍त मैंने मम्‍मा-पापा को बहुत तंग किया।
IMG_7658रात को मैं आसानी से सोया नहीं। और जब सोया तो बीच-बीच में जागता रहा। सुबह साढ़े पांच बजे जब नींद खुली तो मुझे बहुत तेज़ भूख लगी थी। मम्‍मा को लगा कि ए.सी. कम हो गया है इसलिए शायद मुझे गर्मी लग रही है। बड़ी देर बाद मम्‍मा-पापा को समझ आया कि मुझे भूख लगी है। खाना खाने के बाद मैं फिर से खेलने लगा। साढ़े छह बजे हम जबलपुर पहुंच गए। ये देखिए दादाजी के साथ मेरी मौज-मस्‍ती।
IMG_7670और ये रही हमारी हुड़दंगी टोली। एक तरफ फ़ाजिल भैया और दूसरी तरफ शेबी दीदी। हम तीनों मिलकर पूरे घर को सिर पर उठा लेते हैं। पता है मैं कल दोपहर ज़रा भी नहीं सोया। क्‍योंकि मुझे तो खेलना था ना। बड़ी मुश्किल से शाम को छह बजे ज़बर्द्रस्‍ती सुलाया गया।

IMG_7686 जबलपुर में मैं क्‍या-क्‍या मौज-मस्‍ती करूंगा--इसकी ख़बर आपको इस ब्‍लॉग और जादुई-तस्‍वीरों से मिलती रहेगी। मैं चला खोवे की जलेबी लेने।
मैं जादू हूं ना मैं कुछ भी कर सकता हूं।

04 September 2010

जादू बना कान्‍हा

पता है 'जन्‍माष्‍टमी' पर मैं कान्‍हा बना था।
जन्‍माष्‍टमी के एक हफ्ते पहले जब मम्‍मा-पापा मेरे लिए 'कान्‍हा-पोशाक' लेने 'सन-प्‍लाज़ा' गए तो मैं वहां बड़ी मस्‍ती कर रहा था। मम्‍मा ने नापने के लिए मुझे जब कान्‍हा का कुरता पहनाया तो मैं उसे पहनकर भाग निकला। सब के सब मेरे पीछे-पीछे भागे। सब कह रहे थे--'अरे कान्‍हा रूको। अरे कन्‍हैया रूको तो सही। अरे धोती तो पहनते जाओ।'
मैं हंसता हुआ भागता चला जा रहा था।

मैंने आपको पहले ही बताया कि आजकल मम्‍मा ऑफिस जा रही हैं। जन्‍माष्‍टमी पर  भी वो ऑफिस जाने वाली थीं। पर फिर नहीं गईं। दिन में तो मैं सोता रहा। पर शाम को मम्‍मा ने मुझे तैयार कर दिया।
2
बस मेरी मौज-मस्‍ती शुरू हो गई। सारे घर में मैं भाग-दौड़ करता रहा। सोफे पर चढ़ा। गाव-तकिये/मसनद को घोड़ा बनाकर चलाता रहा। पापा की रिवॉल्विंग-चेयर पर चढ़ा। कप्‍यूटर के कान मरोड़े। फ़ोन पर बात की। रसोई में गया। आजकल मैं रसोई के प्‍लेटफार्म से लटक जाता हूं। और वहां जो कुछ भी रखा होता है, उसे अपने क़ब्‍ज़े में कर लेता हूं।


1 मम्‍मा की गोद में मस्‍ती करने का मज़ा ही और है। मुझे मम्‍मा के बाल खींचने अच्‍छे लगते हैं।
3 घर पर मौज-मस्‍ती करने के बाद मैं बाहर निकला। पास में 'पेप्‍सी-ग्राउंड' है ना। वहां 'मटकी-फोड़' हो रहा था। जाने कहां कहां से टोलियां आई थीं गोविंदाओं की। लाखों का ईनाम था। शोर भी बहुत हो रहा था। भीड़ भी थी। पर मुझे तो वो सारा नज़ारा देखना था। इसलिए मैंने मम्‍मा से कहा, चलिए पेप्‍सी ग्राउंड में चलें। देखिए लिफ्ट में कितनी शराफ़त से खड़ा हूं मैं।  
7और ये निकला लिफ्ट से बाहर। मम्‍मा का हाथ पकड़े बिना दौड़ लगाकर भाग निकला था मैं। वो तो मम्‍मा ने भागकर मेरा हाथ पकड़ लिया।
8अब दौड़ने की पर‍मीशन मिल गयी है। चलो दौड़ा जाए। पूरे बिल्डिंग के लोगों ने मुझे ख़ूब दुलार किया। सबने मेरे सिर पर हाथ भी फेरा।

9लीजिए। कान्‍हा अपनी शरारतों के बाद थक गये हैं। और सोफे़ पर आराम फ़रमा रहे हैं।

last

मेरी जन्‍माष्‍टमी तो मज़े में बीती। बस 'प्रभात स्‍टूडियो' नहीं जा सका। गुरूवार को बंद होता है ना। शुक्रवार को बारिश बहुत थी। आज कोशिश करेंगे कि कान्‍हा-पोशाक में प्रभात स्‍टूडियो जाएं।

कान्‍हा के भेस में मेरी बाकी तस्‍वीरें देखने के लिए 'जादुई-तस्‍वीरें' पर आईये।

30 August 2010

मम्‍मा गईं स्‍टूडियो, जादू रहा घर पर

शुक्रवार को मम्‍मा मुझे घर छोड़कर पहली बार ऑफिस गईं। मम्‍मा-पापा को पता था कि ये मौक़ा बड़ा नाजुक है। इसलिए पापा ने छुट्टी ली थी। वैसे आजकल मैं थोड़ी-थोड़ी देर के लिए 'बेबी-सिटिंग' भी जाता हूं--सामने वाली बिल्डिंग में। मेरी एक फ्रैन्‍ड है वहां--वल्‍लरी। वो मुझसे कुछ साल बड़ी है। जब तक वो वहां रहती है तब तक तो मुझे अच्‍छा लगता है। वो जैसे ही स्‍कूल चली जाती है तो मैं रोना शुरू कर देता हूं। फिर मम्‍मा को मुझे लेने आना पड़ता है। मम्‍मा ने सोचा, कि जब जादू इतनी-सी देर बेबी-सिटिंग में नहीं रह सकता तो फिर सात घंटे मेरे बग़ैर कैसे रहेगा। इसलिए पापा ने छुट्टी ली। पापा और जादू घर पे। और मम्‍मा ऑफिस में।

पापा के साथ मैंने दिन भर ख़ूब मौज-मस्‍ती की। उन्‍हें तंग भी नहीं किया। लेकिन मम्‍मा की बात तो अलग ही है ना। वो मेरी हर बात समझ जाती हैं। किस वक्‍त मुझे भूख लगी है, प्‍यास लगी है, नींद आ रही है, खेलना है, 'शू' आई है, कब मुझे गाना सुनना है--ये सब मम्‍मा फ़ौरन समझ जाती हैं। पर पापा इस मामले में थोड़े-से कच्‍चे हैं। थोड़ा-बहुत वो भी समझ जाते हैं। IMG_7473बहरहाल...जब मम्‍मा ऑफिस जा रही थीं, तो काफ़ी उदास थीं। शायद उन्‍हें मुझे छोड़कर ऑफिस जाना अच्‍छा नहीं लग रहा होगा। वैसे भी क़रीब दो साल बाद वो ऑफिस जा रही थीं। अजीब-सा लग रहा होगा उन्‍हें। मम्‍मा जब निकलने वाली थीं, तो मैंने देखा कि उनकी आंखों में ऑंसू थे। मुझे प्‍यार करने के लिए जब उन्‍होंने गोदी में उठाया--तो मैंने उन्‍हें समझाया---'रो मत मम्‍मा। मैं पापा के साथ रह लूंगा। उन्‍हें तंग भी नहीं करूंगा'। मम्‍मा ने पापा को नसीहतों की लंबी फे़हरिस्‍त दी और फिर निकल पड़ीं।
IMG_7497मम्‍मा ऑफिस चली गयीं। और मैं सो गया। लेकिन जब उठा तो मुझे बिल्‍कुल अच्‍छा नहीं लगा। इसलिए मैं लंच-टाइम में उन्‍हें लेने ऑफिस चला गया। सोचा कि चलो खाना साथ खाया जाए। लंच में मैं मम्‍मा की गोद से नहीं उतर रहा था। लग रहा था कि अभी मम्‍मा मुझे छोड़कर ऑफिस चली जाएंगी। बहरहाल लंच के बाद भी मम्‍मा चली गयीं। मैं पापा के साथ खेलता रहा। फिर सो भी गया।
IMG_7461मम्‍मा के लौटने के बाद उठा। और झट से उनकी गोद में चला गया। हालांकि अभी मम्‍मा कुछ ही दिनों के लिए ऑफिस जाने वाली हैं। फिर थोड़े दिनों की छुट्टी। लेकिन अब इसकी आदत डालनी होगी। मम्‍मा ज्‍यादा दिन तो घर में नहीं रह सकतीं ना।


IMG_7504

हमारे शहर में दो-तीन दिनों से ज़ोरदार बारिश हो रही है। बारिश में मुझे बहुत मज़ा आता है। साइड-टेबल पर चढ़कर मैं हॉल की विन्‍डो से बारिश देखता हूं। शनिवार को जब हम 'हाइपरसिटी' से लौट रहे थे तो मैं गाड़ी की विन्‍डो और विन्‍ड-स्‍क्रीन पर पड़ती पानी की बूंदों को छूने की कोशिश कर रहा था। और उस पर पड़ती रोशनी देखकर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था। पापा जब छाता लगाकर मुझे ले जाते हैं तो मैं ऊपर मुड़कर छाता ही  देखता रहता हूं। और उसे हटाने की कोशिश भी करता हूं। आपके शहर में बारिश हो रही है या नहीं।

मम्‍मा इस पूरे हफ्ते ऑफिस में होंगी और मैं पापा के साथ घर पर। चलता हूं। जितनी देर मम्‍मा के साथ मस्‍ती कर लूं, उतना अच्‍छा है।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

Lilypie - Personal pictureLilypie Second Birthday tickers

  © Free Blogger Templates Spain by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP