29 August 2009

डॉक्‍टर मामा कहते हैं कविताई छुतहा रोग है

सब लोगों को जादू की राम राम नमस्‍ते । कैसे हैं आप । पता है इलाहाबाद वाली ईषिता दीदी ने एक कविता भेजी है । कविता वाले डॉक्‍टर मामा ने सही कहा था कि कविताई छुतहा रोग है । अब सबके सब कविता कर रहे हैं । इससे पहले भी ईषिता दीदी एक कविता भेज चुकी हैं ।


जादू भैया कैसे हो
दिन भर जादू-सा दिखलाते
जाने क्‍या तुम जतन लगाते
कैसे कैसे शो दिखलाते
शो दिखलाकर रौब जमाते
ये सारे शो हिट हो जाते
मंद मंद मुस्‍काते हो
जादू भैया कैसे हो ।।
सुनते हैं तुम अच्छे हो
मन के कोमल सच्‍चे हो
छोटे से तुम बच्‍चे हो
जादू भैया कैसे हो ।
मोबाइल देख मुस्‍काते हो
जैसे कुछ समझाते हो
जाने क्‍या क्‍या कहते सुनते
दिन भर हंसते रोते गाते
खुद ही कहते खुद ही सुनते
खुद ही समझ इतराते हो
जादू भैया कैसे हो ।
कभी एक संग हंसते रोते
मुस्‍का मुस्‍का कर दू धू पीते
शू शू करते पॉटी करते
गला फाड़ चिल्‍लाने लगते
गुस्‍सा होने पर मम्‍मी का
हंसकर दिल बहलाने लगते
जादू भैया कैसे हो ।।
अदा बहुत दिखलाते हो
हमको बहुत रिझाते हो
सबका दिल बहलाते हो
इलाहाबाद नहीं क्‍यों आते हो
क्‍यों इतना भाव खाते हो
जादू भैया कैसे हो ।।


डॉक्‍टर मामा तो कवता और गीत भेजते ही रहते हैं । देखा आपने है ना कविताई छुतहा रोग ।

27 August 2009

जादू चला फोटो-स्‍टूडियो

पता है कल मेरा 'मंथली बर्थडे' था । कल मैं पूरे छह महीने का हो गया ।
अब आप सोच रहे होंगे कि कल मैंने क्‍या किया ये भी तो आपको बताऊं । कल मम्‍मी-पापा मुझे 'रवि-अंकल' के पास लेकर गए । अरे रवि-रतलामी अंकल नहीं भई । रवि IMG0043A अंकल तो हमारे फोटोग्राफर हैं । मम्‍मी के 'प्रेग्‍नेन्‍सी-फोटोज़' भी उन्‍होंने ही खींचे थे । हमारे घर के सारे फोटोज़ वो ही खींचते हैं । कल जब मैं उनके पास फोटो खिंचवाने गया तो बड़ा मज़ा आया । सब-के-सब मुझे हंसाने की कोशिश में लगे थे । पर स्‍टूडियो का अंधेरा और तेज़ स्‍पॉट-लाइट्स देखकर मैं ज़रा-भी नहीं हंसा । बल्कि चेहरे पर परेशानी वाले भाव ले आया । फोटोग्राफर अंकल ने जब मेरी गोद से ज़रा-सी दूर 'रिफ्लेक्‍टर' रखा और फोटो खींचने के लिए फोकस किया...मैंने झट से 'रिफ्लेक्‍टर' पर हाथ मार दिया । बेचारे.....आखि़रकार उन्‍हें फिर से सारी तैयारी करनी पड़ी । तो इस तरह उन्‍हें एकाध शॉट मेरे हंसने का मिल ही गया । खिलखिलाने के जो शॉट पापा ने लिए हैं वो तो नहीं ही मिल पाए ।  कुछ तस्‍वीरें रवि अंकल ने खींचीं हैं और जैसा कि हर पेशेवर-फोटोग्राफ़र को 'मर्ज़' होता है...वो उन्‍हें 'करेक्‍ट' करेंगे उसके बाद प्रिंट करके देंगे । तब तक मैं बेसब्री से इंतज़ार कर रहा हूं । हां रवि-अंकल ने कहा है कि जादू को एक बार फिर से लेकर आईये । मैं फिर से 'ट्राइ' करूंगा और उसके 'नेचुरल फोटो' लूंगा । करिए करिए रवि अंकल, 'ट्राइ' करके देख लीजिए । पर याद रखिए मेरे 'मूड' का कोई ठिकाना नहीं है ।




आजकल मैं 'पल्‍टी-मास्‍टर' हो गया हूं । दिन भर पलट-पलटकर आसपास रखी चीज़ों को झपटने का काम करता हूं । कभी मोबाइल, कभी रिमोट, कभी तकिया, कभी चादर, कभी अख़बार या पत्रिकाएं....जो कुछ 'ग़लती-से' मेरे आसपास छूटा उसे मैं अपने क़ब्‍ज़े में करता हूं और फिर सीधे उसे 'चखने' की कोशिश करता हूं । ये लीजिए मेरी पल्‍टी मारने की कुछ और तस्‍वीरें देखिए ।
IMG_3729सामने जो खिलौना पड़ा है उसे देखकर मैं उसे पकड़ने लपका हूं । और ये आ गया खिलौना मेरे क़ब्‍ज़े में
IMG_3730 लेकिन इतने से भला मुझे तसल्‍ली कहां होने वाली है । अब मैं देख तो कैमेरे पर रहा हूं ( जो कि मेरी आदत है, सामने कैमेरा हो तो मैं भला कहीं और क्‍यों देखूं ) लेकिन मुझे चाहिए कुछ और । जाना है कहीं नज़रें हैं कहीं ।


IMG_3732 ओफ्फो कितना काम करना पड़ता है मुझे । देखिए ना कितना थक गया हूं । ये मेरे आराम करने की एक 'अदा' है ।
IMG_3735 चलो चलो अब ज़रा शोर किया जाए । हल्‍ला-गुल्‍ला मचाया जाए ।

IMG_3739कविता वाले डॉक्‍टर मामा ने मेरे लिए एक गीत भेजा है । लेकिन मैं उसे आज नहीं सुनवा पा रहा हूं । कल सुनवाता हूं । इंतज़ार कीजिए । मैं तो चला । 

25 August 2009

जादू, सावनी और बाक़ी लोग

कल मैंने आपको बताया था कि मैंने मंगेश अंकल और शिल्‍पा आंटी के घर जाकर कैसे 'गणपति-दर्शन' किया । लेकिन मैंने आपको सब कुछ कहां बताया था । अरे वहां मैंने बहुत सारे गुल खिलाए । मैं 'जादू' हूं ना...कुछ भी कर सकता हूं । तो चलिए ज़रा आगे की तस्‍वीरें देखिए और जानिए कि क्‍या क्‍या हुआ 'गणपति-दर्शन'  के वक्‍त ।
IMG_3762-2यही है वो पूजा की थाली जिस पर मैंने हाथ मारा था । और यही वो केले हैं जो मैं 'चढ़ाना' नहीं चाहता था । सच्‍ची ।  अरे हां । वहां मुझे एक नई दोस्‍त भी मिली । शिल्‍पा आंटी की भतीजी सावनी ।
IMG_3750पहले तो हमारी 'जम' नहीं रही थी । देखिए वो कैसे दूर भाग रही है ।


IMG_3751-1लेकिन फिर हमारी दोस्‍ती हो गयी । हमने साथ-साथ फोटो भी खिंचाया । IMG_3753-1
मैं जहां भी जाता हूं अपना कितना सारा साज़ो-सामान लेकर जाता हूं इस तस्‍वीर में देखिए ज़रा ।
 IMG_3769 अब ज़रा देखिए कि ऋत्विक भैया मेरे साथ कैसे खेल रहे हैं ।
IMG_3771 ये देखिए मंगेश अंकल के घर की खिड़की से कैसा नज़ारा दिखता है ।
IMG_3770 अरे सब लोग ज़ोर से बोलो रे...गणपति बप्‍पा मोरया ।


कल का दिन बड़ा ख़ास है । पर उसकी बातें तो कल होंगी ना ।

टा टा बाय बाय । सी यू ।

24 August 2009

जादू ने किया गणपति-दर्शन और ऐसी लागी लगन

मैंने आपको कल ही बता दिया था कि मैं शिल्‍पा आंटी और मंगेश अंकल के घर गणपति-दर्शन के लिए जाने वाला हूं । 'बारिश-मौसी' झमाझम बरस रही थीं । पर मैंने कहा--ख़बरदार जो मुझे रोका तो । आज मैं रूकने वाला नहीं हूं । अच्‍छा बताईये कहां से शुरू करूं । शुरू से । ठीक है । हुआ ये कि दिन में ढाई बजे कि आसपास प्रदीप अंकल और रेशमा आंटी आईं । रेशमा आंटी से ये मेरी दूसरी मुलाक़ात थी । जब मैं क़रीब पंद्रह दिन का था तब आईं थी मुझसे मिलने । अब इतने में ही जान-पहचान गहरी थोड़ी होती है ना । इसलिए आते ही रेशमा आंटी ने मुझे गोद में लिया तो मैंने अपना 'इमरजेन्‍सी अलार्म' बजा दिया । जे देखिए ।
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लेकिन बाद में मेरी रेशमा आंटी से अच्‍छी दोस्‍ती हो गयी । जिसकी तस्‍वीरें आप 'जादुई-तस्‍वीरें' पर क्लिक करके देख सकते हैं । ख़ैर..इसके बाद हम सब मंगेश अंकल और शिल्‍पा आंटी के घर पहुंचे । और वहां गणपति के दर्शन किए ।
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मैंने तो आपको कल ही बताया था कि मुझे तो गणपति अपने फ्रैन्‍ड जैसे लगते हैं । इसलिए वहां पहुंचते ही मुझे लगा कि मुझे उनके साथ खेलना चाहिए । किसी तरह सबने समझा-बुझाकर मुझे बैठा दिया । देखिए मम्‍मी की गोद में बैठा हूं पर 'नज़र' वहीं टिकी है ।
IMG_3749-1देखिए मेरी नज़र यहां टिकी हुई थी । मंगेश अंकल और शिल्‍पा आंटी ने कितनी बढिया सजावट की है ना । IMG_3756मम्‍मी किसी से बातें कर रही हैं । और मैं.....। मेरी नज़रें 'वहीं' 'वहीं' 'वहीं' ।
IMG_3758-1जब मम्‍मी ने पूजा शुरू की और प्रसाद चढ़ाया तो मुझे लगा कि ये मेरे 'केले' कहां जा रहे हैं ।  वैसे मैंने प्रसाद की थाली पर भी ज़ोर से झपट्टा मारा । वो तो पापा-मम्‍मी ने संभाल लिया वरना.....।IMG_3764फिर ये भी हुआ
IMG_3765-1वो आए मम्‍मी की गोद में ये उनकी फितरत है
कभी गणपति को कभी बाकी लोगों को देखते हैं ।


IMG_3767-1मंगेश अंकल ने वहां अनूप जलोटा की सीडी लगा रखी थी । सब लोग मस्‍त होकर गुनगुना रहे थे--'ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन' । पापा ने बताया कि अपने बचपन में उन्‍होंने अनूप जलोटा का एक कंसर्ट देखा था जिसमें अनूप जलोटा अंकल ने गले की कलाबाजियां करते हुए देर तक 'ऐसी लागी लगन--मीरा हो गयी मगन' गाया
था । फिर पापा ने बताया कि उन्‍हें 'जाना था गंगा पार प्रभू केवट की नाव चले' भी बहुत पसंद है । वो भी बचपन में खूब सुनी रचना है । चलते चलते उनकी तस्‍वीरें जिन्‍होंने जादू को 'गणपति-दर्शन' के लिए बुलाया ।
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IMG_3776-1 यहां सामवेद भैया की भी तस्‍वीर होनी चाहिए थी । पर वो तो अपने दोस्‍तों के साथ खेल रहे थे । इसलिए मैं उनकी फोटो नहीं ले पाया ।



अरे सब छोटे-बड़े जोर से बोलो रे 'गणपति बप्‍पा मोरया' ।
कल मैं इसी मौक़े की कुछ और तस्‍वीरें दिखाऊंगा ।


अरे हां ज्ञान-अंकल को कल लगाया गया 'बाल-गणेश' वाला वीडियो बड़ा पसंद आया । वो तो खूब नाचे । आपने देखा क्‍या वो वीडियो । आप नाचे क्‍या ।

23 August 2009

अपनी धुन में मस्‍त गजानन, थिरक रहे हैं भूल के तन-मन

पता है आज मैं शिल्‍पा आंटी और मंगेश अंकल के घर गणपति के दर्शन करने जाने की सोच रहा हूं । हमारे शहर में बारिश खूब हो रही है । लेकिन बारिश-वारिश से मैं भला कहां रूकने वाला हूं । पता है जब मैं अपनी मम्‍मी जी के गर्भ में था तब भी तो गया था पिछले साल । सच्‍ची ।
Smile
गणपति बड़ों के देवता हैं, हम 'बच्‍चों' के तो फ्रैन्‍ड हैं । अरे आपने गणपति पर बनी इत्‍ती सारी ऐनीमेशन फिल्‍में नहीं देखीं क्‍या । मैं सोच रहा हूं कि क्‍यों ना आपको आज एक बढिया सा गीत दिखाया जाए । बहुत शरारती गीत है । तो हो जाए । अरे सब बड़े और छोटे ज़ोर से बोले रे...गणपति बप्‍पा मोरया ।

अब सब लोग गाओ मेरे साथ.....उड़नतश्‍तरी अंकल, डॉक्‍टर मामा, सागर अंकल, मीनू आंटी, प्रशांत अंकल, सभी अंकल आंटी और मेरे नन्‍हे दोस्‍त आदित्‍य और लवीज़ा... अरे सब गा रहे हैं ना । अब ठीक है । 


 

शंकर जी का डमरू बाजे mfg
पार्वती का नंदन नाचे
बर्फीले कैलाश शिखर पर
जय गणेश की धूम ।।

ओ जय हो, ओ जय हो ।।
नाचे धिन धिन धिन ताक हो नाचे ।।
मनमोहक मनभावन नटखट
मूषकगण सब भागे सरपट
विघ्‍न-विनायक, संकट मोचन
वक्रतुंड, कजरारे लोचन
झूमें गाएं बाल-गणेश
भक्‍त-जनों के कटें कलेश
नाचे धिन धिन धिन ताक हो नाचे ।।
सुनकर इतना ज्‍यादा शोर
पार्वती आईं उस ओर
डरकर माता उमा के आगे


दुम दबाकर मूषक भागे
पर अपनी धुन में मस्‍त गजानन


थिरक रहे हैं भूलके तन-मन
गणपति बप्‍पा मोरया
मंगलमूर्ति मोरया
गणपति बप्‍पा मोरया


मंगलमूर्ति मोरया ।।

22 August 2009

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोए थे : जादुई कविता

अरे अरे बहुत दिनों से मैंने कोई कविता नहीं सुनाई । पता है पिछली पोस्‍ट पर मैंने लिखा था कि मेरे चाचाजी फ्लैट ख़रीदने के बारे में मुझसे राय मांग रहे थे । इस पर कोई अनाम जी हैं उन्‍होंने लिखा कि लगता है काफी पैसे वाले हैं तुम्‍हारे मामा और चाचा । इस पर 'कविता वाले डॉक्‍टर मामा' ने मुझे एक ऐसी कविता भेज दी जो मेरे पापा ने बचपन में अपने कोर्स में पढ़ी थी । साथ में डॉक्‍टर मामा ने क्‍या टिप्‍पणी की है वो आप यहां पढ़ सकते हैं ।

फिलहाल तो पढिये ये कविता ।

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,
और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !
पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।
सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।
मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।
मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,
ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।
अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।
औ' जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की
गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।
भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।
मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।
किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे
टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।
देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी -
जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।
निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,
बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे
और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,
नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।
तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे
अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ
हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे
बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को
मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है
यह धरती कितना देती है । धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को
नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को
बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।
इसमे सच्ची समता के दाने बोने है
इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है
इसमे मानव ममता के दाने बोने है
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले
मानवता की - जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।


कविता तो अच्‍छी है । डॉक्‍टर मामा ने हमेशा की तरह पूछा है कि इसके कवि कौन
हैं । मुश्किल सवाल नहीं है । पर मैं तो चला । नींद आ रही है मुझे इत्‍ती लंबी कविता सुनकर ।
IMG_2894 आप बताईये इसके रचयिता कौन हैं । खासतौर पर उड़नतश्‍तरी अंकल ।

20 August 2009

जादू और चाचू की शिखर-वार्ता

आप मेरे बबलू चाचू को तो जानते ही हैं ना । अरे वही जिन्‍होंने मेरा नाम 'जादू' रखा babloo2
है । बबलू चाचू अकसर मेरे घर आते रहते हैं और अकसर मेरा उनके साथ 'विचार-विमर्श' होता रहता है । दरअसल बबलू चाचू भी मेरी तरह बहुत पढ़ाकू हैं ना इसलिए हमारी अच्‍छी 'छनती' है । आप तो जानते ही हैं कि जब दो 'पढ़ने लिखने वाले' मिलते हैं तो देश-दुनिया की कित्‍ती सारी बातें होती हैं । सो जब बबलू चाचू संडे को आए..मैंने सोचा कि इससे पहले कि वो अपने बड़े भैया यानी मेरे पापा के साथ बातों के बुलबुले बनाने लगें, चलो उनसे दुनिया के बारे में कुछ विचार-विमर्श कर लिया जाए ।

 



आजकल बबलू चाचू एक फ्लैट ख़रीदने का सोच रहे हैं । वो पूछने लगे कि बेटा जादू बताओ कि 'स्‍लो-डाउन' का 'प्रॉपर्टी-मार्केट' पर अब तक जो असर पड़ा है तुमको क्‍या लगता है कि वो अभी कायम रहेगा, या फिर 'प्रॉपर्टी-मार्केट' अब चढ़ने लगेगा । मैं समझ गया कि चाचू अभी 'प्रॉपर्टी' के दामों में और गिरावट का इंतज़ार कर रहे हैं ।  cha 1 मैंने चाचू से कहा कि देखिए मैंने अख़बारों में पढ़ा है कि अब 'मार्केट' सुधर रहा
है । हो सकता है कि 'वर्ल्‍ड-इकॉनॉमी' में अच्‍छा सुधार देखने को मिले । वैसे भी ईद-दशहरा-दीवाली आ रहे हैं । ज़ाहिर है कि बाज़ार ऐसे मौक़ों पर सुधर सकता है । आप और ज्‍यादा गिरावट का रास्‍ता मत देखिए और फटाफट एक फ्लैट ख़रीद लीजिए । हो सकता है कि ज्‍यादा इंतज़ार आपके लिए घाटे का सौदा बन जाए । IMG_3633चाचू को मेरे इस जवाब से मज़ा आ गया । फिर मैंने चाचू से कहा कि अच्‍छा मेरी एक समस्‍या हल कर दीजिए । मेरे पास कुछ पैसे हैं । कितने सारे लोग मुझे 'शगुन' के तौर पर पैसे देते रहते हैं, अब सबको मना तो नहीं कर सकता ना, वो बुरा मान गए तो...वैसे भी मैं इतना छोटा हूं । तो बताईये कि इन पैसों को मैं किस 'स्‍टॉक' में लगाऊं । चाचू से ये सवाल इसलिए पूछा क्‍योंकि उन्‍हें 'स्‍टॉक्‍स' की समझ मुझसे ज़रा ज्‍यादा ही है ।
cha 2चाचू तो लगे मुस्‍कुराने । बोले, बेटा जादू इत्‍ती जल्‍दी क्‍या है । फिलहाल 'स्‍टॉक्‍स' के बारे में सोचो भी मत । जब वक्‍त आयेगा तो मैं खुद ही तुमको सब सिखा दूंगा । अभी तो तुमको अपना एक सेविंग्‍स-अकाउंट खोलना है । और उसमें सारे पैसे जमा करते रहना है । बाक़ी बातें समय आने पर । तो मैंने चाचू से कहा अभी तो मम्‍मा ने सारे पैसे एक सुंदर से पैकेट में तारीख़ों और नामों के साथ सहेज कर रखे हैं ।

इसके बाद सवाल पूछने की बारी चाचू की थी । चाचू ने कहा--बोलो जादू इन दिनों कोई फिल्‍म देखी क्‍या तुमने । मैंने चाचू की तरफ देखा ।
cha 3
और बोला--अरे चाचू..आपको पता नहीं है क्‍या कि आजकल 'स्‍वाइन-फ्लू' फैला हुआ है । और सार्वजनिक-स्‍थानों पर नहीं जाना है । वैसे जो लास्‍ट फिल्‍म मैंने देखी थी, वो थी 'ओए लकी ओए' । तब मैं अपनी मम्‍मा के गर्भ में था । वैसे उस ज़माने में मैंने 'दसविदानिया', 'सिंग इज़ किंग', 'आपकी क़सम', 'लक बाइ चांस' 'रॉक-ऑन' और 'स्‍लमडॉग मिलिनेयर' जैसी फिल्‍में देखी थीं । आप बताईये आजकल कौन-सी फिल्‍म अच्‍छी है । चाचू बोले--'यार जादू, मैं तो हर हफ्ते फिल्‍म देखता हूं । इन दिनों मैंने 'कमीने' देखी । अच्‍छी नहीं लगी । 

हम बात ही कर रहे थे कि तभी खाना तैयार हो गया । और चाची ने आकर मुझे अपनी गोद में उठा लिया । बातें ख़त्‍म हुईं  । IMG_3627 

ये बातें आपको कैसी लगीं ज़रा बताईये तो सही ।


नूपुर दीदी ने पूछा है कि दो-चार दिनों से मैं कहां ग़ायब था । पता है मेरे घर का नेट-कनेक्‍शन अस्‍सी घंटों से बंद था । बताईये मैं क्या करता ।

16 August 2009

यही दिन देसवा स्‍वतंत्र भए : मेरा पहला स्‍वतंत्रता दिवस

पंद्रह अगस्‍त हमारे देश की आज़ादी का दिन होता है । मेरी जिंदगी में ये दिन पहली बार आया । ज़ाहिर है कि मुझे खूब धूम-धाम से इसे मनाना था । इसलिए सबेरे-सबेरे मम्‍मा मुझे एक सोहर सुनाया--

 



'यही दिन देसवा स्‍वतंत्र भए जगमह खुशी छाई हो,
ललना यही सुख राख्‍यो सम्‍हारि मिलहिं बड़ी मुश्किल,
मिलहिं बड़ी मुश्किल हो' ।

 



फिर सविता मौसी का फोन आ गया । उन्‍होंने मुझे एक सोहर सुनवा दिया । यानी कल के दिन मेरे लिए सोहर की बरसात ही होने लगी ।



जौनि अजदिया के बिरवा तिलक-गांधी दिहलन,
तिलक-गांधी दिहलन हो


हो सकता है कि ऐसे कई सोहर कविता वाले डॉक्‍टर मामा को याद हों । नानी के यहां ये परंपरा है कि बच्‍चा पैदा होने पर सोहर गाया जाता है । हां तो मैं बता रहा था कि वैसे तो कल तैयार होकर पापा-मम्‍मी के दफ्तर जाने की योजना थी । फिर अपनी बिल्डिंग में भी तो तिरंगा मुझे ही फहराना था । लेकिन तैयार होने में देर हो गई और मैं दफ्तर नहीं जा सका । हां बिल्डिंग के झंडा-वंदन में ज़रूर शामिल हुआ । फिर घर आकर मैंने अपना तिरंगा लहराया । ये रहीं तस्‍वीरें ।
IMG_3689भारत माता की जय ।

भारत माता की जय ।
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  IMG_3677मेरी बाक़ी तस्‍वीरें आप जादुई-तस्‍वीरें पर देख सकते हैं ।
स्‍वतंत्रता-दिवस की देरी से ही सही शुभकामनाएं । भारत माता की जै ।


14 August 2009

डॉक्‍टर-डॉक्‍टर सुनो पुकार.....

 

 

पिछले छह-सात दिनों से मैं ग़ायब था । आप लोगों ने मुझे पूछा ही नहीं । अरे मैं वही 'जादू' हूं...शरारती जादू । दरअसल मैं इसलिए अपने 'ब्‍लॉग' पर नहीं आ पाया क्‍योंकि इन दिनों मेरी तबियत ज़रा 'नासाज़' थी । नहीं..नहीं कोई बड़ी बात नहीं थी, बस ज़रा उल्‍टी-वुल्‍टी हो रही थी । हुआ यूं कि डॉक्‍टर-अंकल की सलाह पर मम्‍मा ने मुझे दाल-चावल, फलों का जूस, पल्‍प वग़ैरह खिलाना शुरू किया । इसमे मुझे banana और apple खाने में बड़ा मज़ा आया । केला मम्‍मी अपनी उंगली से खिलाती हैं....मुझे लगता है कि मम्‍मा के हाथ में ही मिठास है इसलिए मैं उनकी उंगली पकड़ पकड़ के चूसने की कोशिश करने लगा हूं ।  और ऐसा मैं दिन में कई बार करता हूं । ये देखिए । मैं किस तरह केला खाता हूं । IMG_3655अरे हां 'आलू का चोखा' खिलाने के लिए मम्‍मी को कहा था डॉक्‍टर मामा ने, अरे वही कविता वाले डॉक्‍टर मामा । मुझे 'चोखा' बड़ा पसंद आया । इसे कुछ लोग 'आलू का भुर्ता' भी कहते हैं । मैंने खूब चटख़ारे लेकर खाया । लेकिन फिलहाल दाल-चावल मुझे ज़रा भी पसंद नहीं आया । मैं लगातार नख़रे कर रहा था फिर भी मम्‍मी खिलाए जा रही थीं ज़बर्दस्‍ती । सो मैंने उल्‍टी कर दी । और अगले दिन मम्‍मी ने फिर वही किया, मैंने फिर उल्‍टी कर दी । अब मम्‍मी को कौन समझाए कि मैं ज़रा बड़ा हो रहा हूं, मेरी पसंद-नापसंद भी कोई चीज़ है । क्‍यों खिलाया मुझे दाल-चावल । लो अब भुगतो । फिर मुझे दो-तीन दिन तक दाल-चावल खाने पर उल्‍टी होती रही । ''दाल-चावल मतलब पिसे-हुए दाल-चावल का पानी'' । लेकिन अब मम्‍मी 'डर' गयी हैं और मुझे दाल-चावल देना फिलहाल बंद कर दिया है । और इस बात को लेकर चिंतित हैं कि मुझे प्रोटीन कहां से मिलेगा । और मुझे क्‍या-कैसे खिलाया जाए ।
IMG_3656वैसे आपको बता दूं कि जब मैं अपनी मम्‍मा के गर्भ में था तभी से मुझे 'मीठा' बहुत पसंद है । पापा अकसर मम्‍मा के लिए 'घसीटा' के गुलाब-जामुन लाते थे, और इसे खाते ही मैं मम्‍मा के गर्भ में उछलकूद मचा देता था । एक और चीज़ मम्‍मा के गर्भ में रहते हुए मुझे बड़ी पसंद थी और वो थी आईसक्रीम । 'नेचुरल' की आईसक्रीम मम्‍मा को बहुत पसंद है और अकसर वो इसे खाती-रहती थीं । उनके खाते ही मैं उछलकूद मचा देता था । 

ये तो हुईं खाने-पीने की बातें । उन्‍हीं दिनों में मेरी मम्‍मा मुझे कविताएं और कहानियां पढ़-पढ़कर सुनाती थीं और उन्‍हें सुनकर भी मैं उछलकूद मचा देता था । पता है फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' की कुछ ग़ज़लें और नज़्में मुझे बहुत पसंद आती थीं और आज भी पसंद हैं । इसी तरह 'वह कदंब का पेड़' भी मुझे अच्‍छी लगती थी । और भी कुछ चीज़ें हैं जो पसंद आती थीं । 

 



मम्‍मी की ओर से आज एक कविता---जो बचपन में उन्‍होंने खूब गाई ।


डॉक्टर डॉक्‍टर सुनो पुकार gudia

मेरी गुडिया पडी बीमार
रात को बरसा झम-झम पानी 
उसमें भीगी गुडिया रानी
गीले कपडे दिए उतार
फिर भी गुडिया पडी बीमार
ओहो, इसको तेज बुखार
सौ से ऊपर डिग्री चार
दवा की है ये चार खुराक
सुबह-दोपहर-शाम और रात
फीस लगेगी हर इक बार
आज नगद और कल हो उधार
फीस ?
जब तक गुडिया रहे बीमार
तब तक पैसे रहे उधार।


 


अरे हां, डॉक्‍टर मामा ने एक मज़ेदार बात लिखी है पिछली पोस्‍ट पर टिप्‍पणी में । पढिए ज़रा ।

भई जादू जी,
देखा हमारा असर ?
इशिता और अनुवर्तिका दीदी भी कविता सुनाने लग गयीं ; सुनाने क्या लिखने ही लग
गयीं !
तो,इसी बात पर
कुछ भी नहीं हैं उनसे कम
कविता लिख सकते हैं हम
हमारे लिये भी बायें हाथ का खेल है यह
और लो; "फटाफट" लिख भी डाली (हालाँकि लिखी है दाहिने हाथ से) :

राखी आयी राखी आयी
जादू जी की राखी आयी
प्यारी नन्ही गोल कलाई
उस पर पहली बार सजाई
की उस दिन जो खीर-चटाई
या फिर रबड़ी दूध-मलाई
और जो "टीथर" मम्मी लायी
उनमें मजा नहीं वो भाई
मौज नहीं वो उनमें आयी
जो अब जाकर मैंने पायी
राखी खायी राखी खायी
जादू जी ने राखी खायी

वैसे एक बात बता दें तुम्हें - बच कर रहना ।
दुनिया में सबसे छुतही बीमारी है - कविता ।
देखो ना; हमसे इशिता और अनुवर्तिका दीदी को लग गयी और फिर उनसे वापस हमें !
पाण्डे अंकल (ज्ञानदत पाण्डेय) को जो लगी,सो अलग !!
है कि नहीं ?


अच्‍छा अब मैं चला । नींद आ रही है मुझे । आपको भी कविता की बीमारी लगी क्‍या......और हां । 'जादुई-तस्‍वीरें' पर क्लिक कीजिए और मेरी नई तस्‍वीरें देखिए । अब लगातार आयेंगी मेरी नई तस्‍वीरें ।  


06 August 2009

जादू की पहली राखी

मैंने उस दिन आपको बताया था ना कि मेरी राखी आ गयी है और मैं उसे 'खाने' जा रहा हूं । मुझे पता नहीं था कि राखी बंधवाई जाती है 'खाई' नहीं जाती । वो तो कल 'रक्षाबंधन' के दिन मम्‍मी ने मुझे बताया । ये देखिए तस्‍वीरें कैसे बंधवाई मैंने अपनी राखी । 1पहले तो मैं इस तरह एकदम तैयार हो गया । नहा-धोकर, नए कपड़े पहनकर । एकदम तैयार । 2उसके बाद मैंने ईशिता और अनुवर्तिका दीदी की लिखी चिट्ठी को पढ़ा । फिर जब रंग-बिरंगी चिट्ठी कुछ ज्‍यादा ही अच्‍छी लग गयी तो उसे 'चख' लिया । 3फिर राखी बांधने के लिए थाली सजाई गई । मेरे 'दोस्‍त' ने थाली सजाने में कैसे मदद की, इस तस्‍वीर में आप देख सकते हैं ।  4    फिर मुझे राखी बांध दी गयी । ये देखिए : 5और उसके बाद..उसके क्‍या बाद क्‍या हुआ........ये देखिए । राखी खाई जा रही है ।
6फिर मम्‍मी ने बताया कि राखी खाई नहीं जाती । खाया तो कुछ और जाता है । मम्‍मी की गोद में मैं कैसा लग रहा हूं ।
7अच्‍छा अब ज़रा मेरी ईशिता और अनुवर्तिका दीदी की चिट्ठी पढ़ लीजिए जो उन्‍होंने मेरे नाम लिखी है । ( बॉक्‍स में उनकी तस्‍वीर भी है, बाईं ओर छुटकी अनुवर्तिका दीदी और दाहिनी ओर बड़की ईशिता दीदी )
   

प्रिय जादू
क्‍या कर रहे हो । सो रहे हो । बहुत सोते हो । कुछ काम-धाम किया करो । जाग didi जाओ और देखो दीदी ने लाल-हरी राखी भेजी है । लाल रंग तुम्‍हारे जीवन में उत्‍साह भरने के लिए और हरा रंग इसलिए कि तुम्‍हारा जीवन समृद्ध और सदा गतिमान रहे । कभी रूके नहीं, कभी झुके नहीं । टुकुर टुकुर देख रहे हो । दीदी को तो अभी तुमने देखा भी नहीं है । पहचानोगे कैसे । कोई बात नहीं । जब कभी मिलोगे तो दीदी तुम्‍हें पहचान लेगी । वैसे जान-पहचान बाहर से नहीं भीतर से हुआ करती है । सही पहचान तो तब होती है जब मन का दर्पण साफ़ हो । मैं मन के दर्पण में तुम्‍हें हमेशा देखा करती हूं । जब से तुम पैदा हुए हो ना तब से । तुम जब थोड़े-से बड़े हो जाओगे तो अपने आप मन के भीतर की पहचान होने लगेगी ।

सुना है कि तुम मेरी बुआ को बहुत हैरान करते हो । अच्‍छी बात है । बुआ को भी अच्‍छा ही लगता है । लेकिन धीरे-धीरे अपनी शरारतें कम करो । अच्‍छे बनो । इतने अच्‍छे कि तुमसे अच्‍छा कोई ना हो ।

अच्‍छा ये बताओ कि घर कब आओगे । तुमने अपना ब्‍लॉग बना लिया है । समय तो कम ही मिलता होगा ना । लेकिन समय निकालकर कभी बुआ को लिवा कर चले आओ । तुम्‍हारी दीदी तुम्‍हारा इंतज़ार कर रही है ।

समय से दूध पी लिया करो । थोड़ा पढ़ाई-लिखाई शुरू कर दो । हां मिठाई तो शायद तुम खा नहीं सकते इसलिए तुम्‍हें नहीं भेज रही हूं । घर आओगे तो सबसे अच्‍छी मिठाई खिलायेंगे तुम्‍हें । मेरी बुआ और फूफा को प्रणाम कहना । पढ़ने के बाद काफी थक गए होगे । इसलिए अब सो जाना ।

रक्षाबंधन की शुभकामनाओं के साथ
तुम्‍हारी दीदी
ईशिता ।

 

 

 

 

 

 

 


ईशिता दीदी की ये चिट्ठी काफी रंग-बिरंगी है । मैं इसे 'स्‍कैन' करके 'जादुई-तस्‍वीरें' पर चढ़ाने वाला हूं । क्‍या करूं टाइम नहीं होता है मेरे पास । जब फुरसत मिलेगी तो चढ़ाऊंगा ।

 



राखी से ठीक पहले मेरे 'कविता वाले डॉक्‍टर मामा' का मेल आया  । उन्‍होंने लिखा---

जादू जी !

तो अब राखी खाने की तैयारी है ?

एक तो तुम दिन भर वैसे ही जाने क्या-क्या खाते रहते हो; ऊपर से तुम्हारी मम्मी पूछती रहती हैं कि क्या खिलाएँ ?

इधर दो-चार दिनों से तुम्हें कोई कविता भी नहीं सुना पाये हम ।

तो,सारी कसर एक साथ पूरी किये दे रहे हैं ।

हमें लगता है कि ज़्यादा लम्बी कविताएँ तुम अभी याद नहीं कर पाओगे,तो लो सुनो एक छोटी कविता,जो हम अपने मामा जी को सुनाया करते थे (जब हमारा ......................खाने का मन होता था) :
Rasgulle

ओ मामा ओ मामा

जब तुम घंटाघर जाना

गोल-गोल रसगुल्ले लाना

उनको खाकर पढ़ने (अभी तो छू-छू करने) जाऊँ

राजा बेटा मैं बन जाऊँ :


Gulabjamun 
ये तस्‍वीरें भी मामाजी ने ही भेजी हैं ।

 

 

 

 

 

 


अरे हां ईशिता दीदी ने भी एक कविता भेजी है जो उन्‍होंने मेरे लिए ही लिखी है ।

ये पढ़ना तो बहुत ज़रूरी है ।
जादू भैया जादूगर
ऐसा कोई जादू कर
दीदी भैया साथ रहें
मीठी मीठी बात करें
जल्‍दी से तू आ जा घर
ऐसा कोई जादू कर
राखी है ये प्‍यार भरी
मुस्‍की मारो प्‍यार भरी
दीदी ताके रोज़ डगर
जल्‍दी से तू आ जा घर

04 August 2009

कर पग गहि अंगूठा मुख मेलत

पता है आजकल मैं नये-नये करतब करने लगा हूं । पहले मैं सिर्फ अंगूठा चूसता था अपने हाथ का अंगूठा । लेकिन उसके बाद हुआ ये कि मैंने कोशिशें कीं और अब दोनों पैरों के अंगूठे मेरी गिरफ्त में आ गये हैं । आजकल मम्‍मी का काम बहुत बढ़ गया
है । पहले वो मेरे हाथ धुला-धुला कर परेशान थीं अब बार बार उन्‍हें मेरे पैर भी धुलाने पड़ते हैं । वैसे तो मम्‍मी मेरे लिए तरह तरह के 'टीथर्स' लाई हैं । पर कई बार मैं उन्‍हें चबा-चूस कर 'बोर' हो जाता हूं । इसलिए मां-पापा का ज़रा-सा ध्‍यान यहां-वहां भटका और मैं ये करतब करता हूं । देखिए । IMG_3545 कहते हैं कि श्रीकृष्‍ण भी अपना अंगूठा चूसा करते थे । सूरदास की ये पंक्तियां देखिए ज़रा--

कर पग गहि अंगूठा मुख मेलत
प्रभु पौढे पालने अकेले हरषि-हरषि अपने संग खेलत
शिव सोचत, विधि बुध्दि विचारत बट बाढयो सागर जल खेलत
बिडरी चले घन प्रलय जानि कैं दिगपति, दिगदंती मन सकेलत
मुनि मन मीत भये भव-कपित, शेष सकुचि सहसौ फन खेलत
उन ब्रजबासिन बात निजानी। समझे सूर संकट पंगु मेलत ।

ये रहा इन पंक्तियों का भावार्थ--


श्यामसुन्दर अकेले पलने में सोये हैं, बार-बार हर्षित होकर अपनी धुन में खेल रहे हैं । हाथों से चरण पकड़कर (पैर के) अँगूठे को वे मुख में डाल रहे हैं । इससे शंकर जी चिन्ता करने लगे, ब्रह्मा अपनी बुद्धि से विचार करने लगे (कि प्रलय का तो समय आया नहीं, क्या करना चाहिये?) अक्षयवट बढ़ने लगा, समुद्र का जल उमड़ पड़ा, प्रलयकाल के मेघ प्रलयकाल समझकर चारों ओर बिखरकर दौड़ पड़े (क्योंकि प्रलय के समय ही भगवान बालमुकुन्द-रूप से पैर का अँगूठा मुख में लेते हैं), दिक्पाल लोग (भूमि के आधारभूत) दिग्गजों को समेटने (वहाँ से हटाने) लगे। (सनकादि) मुनि भी मन-ही-मन भयभीत हो गये, पृथ्वी काँपने लगी, संकुचित होकर शेषनाग ने सहस्र फण उठा लिये (कि मुझे तो प्रभु की प्रलय-सूचना से पहिले ही फणों की फुंकार से अग्नि उगलकर विश्व को जला देना था,जब मेरे काम में देरी हुई।) लेकिन (यह सब आधिदैविक जगत में हो जाने पर भी ) उन व्रजवासियों ने (जो नन्दभवन में थे) कोई विशेष बात नहीं समझी । सूरदास जी कहते हैं-वे तो यही समझते रहे कि श्याम (खेल में) छकड़े को पैर से हटा रहा है ।


तो देखा आपने सूरदास जी ने अंगूठा चूसने का कितना अच्‍छा वर्णन किया है । वैसे आपको बता दूं कि ये पंक्तियां मैंने नहीं मेरे मम्‍मी-पापा ने ढूंढी हैं । वो भी कविता-कोश से । मुझे अभी इस सबका पता कहां है । आजकल मैं एक और करतब करता हूं । और वो है 'पलटी मारना' । और मैं केवल एक ही पलटी नहीं मारता । एक साथ दो पलटी । इसलिए मम्‍मी पापा को हमेशा मेरे आसपास रहना पड़ता है । ताकि मैं कहीं पलंग से या 'सैटी' से छलांग ना मार दूं । ज़रा ध्‍यान यहां से वहां हुआ और मैं पलंग पर एक सिरे से दूसरे सिरे पर पहुंच जाता हूं । ज़मीन पर भी यही हाल है ।
IMG_3515यहां भी अंगूठा चूसने से भला कैसे बचा जा सकता है । ये देखिए मैं क्या करता हूं ।
IMG_3521 वैसे मम्‍मी-पापा रंजन अंकल की बताई दवा ले आए हैं और मुझे दी भी जाने लगी है । अच्‍छा अब मैं चलता हूं । इलाहाबाद से इषिता दीदी और अनुवर्तिका दीदी ने मुझे राखी और चिट्ठी भेजी है । मैं अभी उसे 'पढ़ने' और 'खाने' जा रहा हूं । बाय बाय ।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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