31 July 2009

मम्‍मी-पापा की बातें और 'छिपा-छिपी आगड़-बागड़ जाई रे'

मेरी मम्‍मी की तबियत अब ठीक है । मैंने उस दिन आपको बताया था कि उन्‍हें 'फ्लू' हो गया था । पता है एक दिन हम सब घूमने गए थे । मम्‍मी कुछ शॉपिंग कर रही थीं और उसी शॉप में एक 'बीन-बैग' रखा था । पापा ने मुझे 'बीन-बैग' पर डाल दिया । उसके बाद 'बीन-बैग' पर मैं ऐसे बैठा जैसे कोई शहंशाह बैठता है । ये देखिए:
IMG0034A'बीन-बैग' पर मैंने कुछ और अदाएं दिखाई हैं । जिन्‍हें आप मेरे तस्‍वीरों के ब्‍लॉग 'जादुई तस्‍वीरें' पर देख सकते हैं । मैंने तय किया है कि 'जादुई-तस्‍वीरें' पर आपको अपनी तस्‍वीरें नियमित रूप से दिखाता रहूंगा । ठीक है ना ।


अरे हां, पता है उस दिन डॉक्‍टर मामा ने अपने और 'जादू नंबर एक' और 'जादू नंबर दो' के खिलौनों की तस्‍वीरें भेजी थीं । जादू नंबर एक और दो तो समझ गए ना आप, डॉक्‍टर मामा के बेटे हैं ये । मुझे पुराने ज़माने के खिलौने देखकर बहुत अच्‍छा लगा । आप भी देखिएगा । सारी तस्‍वीरें मैंने 'जादुई-तस्‍वीरें' पर लगा दी हैं । झलक के तौर पर ये दो तस्‍वीरें देखिए । ये लकड़ी के खिलौने हैं । और इस पहली वाली तस्‍वीर में 'एयर इंडिया' के महाराजा कैसे ऊपर वाले से पनाह मांग रहे हैं । ज़रूर जादू नंबर एक या दो ने उनके साथ कोई ज़ुल्‍म किया होगा ।


Toys-35जब मैंने डॉक्‍टर मामा को ये बात बताई तो उन्‍होंने फौरन 'महाराजा' का ऑपरेशन कर दिया । सर्जन हैं ना, इसलिए इस सब में माहिर हैं मेरे डॉक्‍टर मामा । ये देखिए महाराजा फिर से अपनी 'अदा' में आ गए हैं । Maharaja
ऐसे कई खिलौनों की तस्‍वीरें भेजी है डॉक्‍टर मामा ने । सबकी सब 'जादुई-तस्‍वीरें' पर
हैं । जरूर देखिए और बताईये आपको क्‍या याद आया इन्‍हें देखकर । पता है मुझे देखकर तो मेरे मम्‍मी-पापा को अपना बचपन याद आता ही रहता है पर इन्‍हें देखकर तो उन्हें अपना बचपन और भी याद आ गया । वो कह रहे थे कि बरसों बाद लकड़ी के खिलौने देखने को मिले हैं उनको । पता है मेरे पापा भी ऐसे खिलौनों से बहुत खेले हैं और मम्‍मी भी । वो कह रहे थे कि तब तो मिट्टी के खिलौने भी होते थे । लेकिन आज मेरी जनरेशन के बच्‍चों को तो प्‍‍लास्टिक और रबर के खिलौनों से खेलना पड़ता
है । या फिर इलेक्‍ट्रॉनिक खिलौनों से ।

पापा कहते हैं कि बंदूकें, तोपें, युद्ध वाली गाडियां, मार-काट मचाने वाले 'पावर रेन्‍जर्स' आज के प्रतिनिधि खिलौने बन गये हैं । जबकि पहले बच्‍चों के मन पर 'हिंसा' की छाया भी नहीं पड़ने दी जाती थी । मम्‍मी कहती हैं कि वो बड़े धूम-धाम से अपनी कपड़े की बनी गुडिया और गुड्डे की शादी कराती थीं और घर पर बढिया खाना-वाना बनता था । धूम-धाम होती थी । आज की बार्बी-डॉल से पता नहीं क्‍यों उन्‍हें उतना जुड़ाव नहीं हो पाता है । सच्‍ची, ये सब मेरी मम्‍मी कहती हैं । अच्‍छा अब बस कीजिए । मम्‍मी पापा की सारी बातें सुनकर आपको थोड़ी बताऊंगा । बस आप इतना बता दीजिए कि आपको अपने बचपन के कौन-से खिलौने याद आते हैं ।


आपने मेरे ब्‍लॉग 'जादुई-तस्‍वीरें' पर बिल्‍ली-मौसी की तस्‍वीरें तो देख ही ली होंगी । इसलिए आज मैंने सोचा कि मैं आपको बिल्‍ली-मौसी का एक गाना सुनवा दूं । ये लीजिए सुनिए और मेरे साथ गाईयेगा भी । ठीक है ना


छुपाछुपी ओ छुपी आगड़-बागड़ जाई रे
चूहे मामा ओ मामा भाग बिल्‍ली आई रे
बिल्‍ली बोली म्‍याऊं काहे घबराओ
मैं तो चली काशी गले मिल जाओ
मत हम को बना अरी मौसी
तेरे दिल में जरूर है काला
किसी और को दिखला जाके
ये जोग, ये कंठी माला
राम का नाम लो, आंख से काम लो
कल जो हुआ था भूल जाओ भूल जाओ ।


छुपा छुपी ।।
मैं तो राम की जोगन अपना परलोक सुधारन जाऊं
आखिर तो बुढ़ापा ठहरा अब लौट के आऊं ना आऊं
दांत भी तेज़ तेरे, पंजे भी तेज़ हैं
मन में वही है दांव लगे तो लगाओ
छुपा छिपी ओ छिपी आगड़-बागड़ जाई रे ।।









अच्‍छा अब मैं चला.....पलटी खाकर मस्‍ती करने ।

29 July 2009

समीर अंकल को मिला ईनाम : डॉक्‍टर मामा से और मेरी तरफ से 'हैपी-बड्डे'

दो दिनों से मैं अपना ब्‍लॉग नहीं लिख पाया । फिर आज ही प्रशांत चाचू का चेन्‍नई से कमेन्‍ट आया :
अरे दो दिन हो गए और जादू-बेटा का अता-पता नहीं है । कहां हैं जादू जी ।

इसलिए मैंने सोचा कि अब तो बताना ही पड़ेगा सबको । पता है परसों मेरी मम्‍मी का गला ख़राब हो गया था । उसके बाद कल शाम को उन्‍हें बुख़ार आ गया । कल शाम को तो मम्‍मी डॉक्‍टर के पास नहीं गयीं । पर आज मैंने उनकी एक नहीं सुनी और उन्‍हें डॉक्‍टर के पास लेकर गया । अरे हमारे घर के पास ही तो हैं हमारे फैमिली-डॉक्‍टर । बस उनको बोला--'अंकल ये देखो मम्‍मी को बुख़ार है । ऐसी दवा दीजिए कि जल्‍दी ठीक हो जाएं । वरना मैं आपके ऊपर 'छू छू' कर दूंगा । डॉक्‍टर हंसे और उन्‍होंने फौरन अच्‍छी दवा दे दी । आप भी अपना ख्‍याल रखिएगा ।

इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा ने 'समीर अंकल' को उनकी पहले का सही जवाब देने के लिए ईनाम भी भेजा है । ये ईनाम है उनकी ऑटोग्राफ़ डायरी के दो पन्‍ने ।
Dinkar Autogrph-E10Yash Malviya Autogrph-E11

अरे हां...आज तो समीर अंकल का जन्‍मदिन भी है । मेरी तरफ से उनको केक । इस पर चार मोमबत्तियां इसलिए क्‍योंकि मेरे प्‍यारे समीर अंकल मन से अभी भी इत्‍ते बड़े ही हैं ।
happy-birthday-cake इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा ने ये बात भी लिखी है--

वैसे इस पन्ने में हमने अभी और जगह बचा रखी है,यश अंकल के बेटे अचिन्त्य भैया के भी ऑटोग्राफ़ के लिये,जो ख़ुद भी बहुत अच्छी कविताएँ लिखते हैं और जादू नम्बर एक जी के साथ  उनकी ही क्लास में पढ़ते थे ।
"उड़न-तश्तरी" अंकल को बता देना ( ताकि अपने बहीखाते में अभी से दर्ज़ कर लें )

इसमें जो 'जादू नंबर एक' का जिक्र हुआ है ना, वो मेरे बड़े भैया हैं । मेरे इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा के बेटे । पता है वो मेरे लिए एक कंप्‍यूटर गेम बना रहे हैं । अगर इस बात को सही करके बोलूं तो वो मेरा कंप्‍यूटर गेम बना रहे हैं । 'जादू' का कंप्‍यूटर गेम' । डॉक्‍टर मामा ने लिखा है--

............अब तो जादू नम्बर एक और दो जी बहुत बड़े हो गये हैं, हमसे भी लम्बे। नम्बर एक अब भी खेलते हैं, पर कम्प्यूटर से । पहले तो कम्प्यूटर गेम खेलते थे, अब न जाने क्या-क्या सॉफ़्टवेयर और कम्प्यूटर गेम ख़ुद ही बनाते रहते हैं । हमने कहा कि जादू नम्बर तीन के लिये भी एक गेम बना दो, तो बोले कि जादू "के लिये" क्या ख़ुद "जादू पर ही" गेम बना देंगे। लेकिन उस गेम में रखें क्या समझ नहीं  आ रहा है । एक तो  यह हो सकता है कि जादू जी ज़ोर-ज़ोर से गला फाड़कर रो रहे हैं और प्लेयर उन्हें तरह-तरह से चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं। जो जितनी ज़्यादा बार चुप कराये,उसका उतना ही ज़्यादा स्कोर। या फिर जादू जी दूसरों के घर से चीजें उठा-उठा कर ला रहे हैं । जितने ही ज़्यादा आइटम उतना ही ज़्यादा स्कोर। यह भी हो सकता है कि जादू जी छू-छू कर रहे हैं और सब लोग बचने के लिये भाग रहे हैं। जो जितनी ज़्यादा बार ख़ुद को बचा ले, उतना ज़्यादा स्कोर । अब जैसा ठीक हो, तुम बताना ।


तो समझे आप....ताज़ा ख़बर ये है कि मेरा यानी 'जादू' का 'एक्‍स्‍क्‍लूसिव कंप्‍यूटर गेम' बन रहा है । मुझे तो लगता है कि तीनों ही 'ऑप्‍शन' अच्‍छे हैं । अब जैसा मेरे अंचित भैया उचित समझें, गेम बना दें ।

कल मैं आपको बताऊंगा कि 'जादू नंबर एक' जिनका जिक्र ऊपर के बक्‍से में हुआ है, कैसे-कैसे खिलौनों से खेलते थे । इसी बहाने मैं खिलौनों पर बातें भी करूंगा और मेरा मन हुआ तो मैं कोई गाना भी सुना सकता हूं । सच्‍ची ।

जादू हूं ना मैं कुछ भी कर सकता हूं ।

27 July 2009

खीर पकाई जतन से और भैया सो जा बारे बीर

कल संडे था ना । पता है कल मेरे ब्‍लॉग को एक हफ्ता पूरा हो गया । कल तो मैंने सुबह से ही बहुत मस्‍ती की । ये देखिए सुबह-सुबह मैंने सोचा कि 'बेड' से 'जंप' मार दूं तो कैसा रहे । मम्‍मी-पापा की पैनी नज़र रहती है इसलिए मैं ऐसा नहीं कर पाया । IMG_3364-1और हां, पता है, कल मेरी 'खीर-चटाई' हो गई । डॉक्‍टर मामा और डॉक्‍टर अंकल सबने कहा था कि पांचवे महीने से मुझे solid food दिया जा सकता है । हमारे देश में नन्‍हे-मुन्‍नों को सबसे पहले मीठा खिलाने की परंपरा है । कल मेरी मम्‍मी ने इत्‍ती बढिया खीर बनाई कि क्‍या कहूं । पहले तो मुझे सिर्फ 'दूध' का स्‍वाद पता था । अब मुझे ये भी पता चल गया कि खीर का स्‍वाद कैसा होता है । ये  देखिए मम्‍मी ने कैसे चांदी की कटोरी में खीर रखी थी मेरे लिए ।  IMG_3475-1 जब खीर मेरे मुंह में गई और मुझे उसका मीठा स्‍वाद मिला तो मैं उछल पड़ा और उसके बाद मुझे लगा कि एक साथ पूरी खीर क्‍यों नहीं दी जा रही है । एक एक चम्‍मच करके क्‍यों दे रही हैं मम्‍मी ।
IMG_3462-1सब खा-पीके मैंने सोचा कि थोड़ा आराम कर लिया जाए । मम्‍मी मेरे लिए नया तकिया लाई हैं ना । ये देखो :  IMG_3428-1और हां कल रात कविता वाले डॉक्‍टर मामा ने मुझे कुछ कविताएं भेजी हैं । उन्‍होंने कहा कि खीर-चटाई थी तो ज़रा अमीर ख़ुसरो की ये पंक्तियां पढ़ो । 

खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।

कल उन्‍होंने मुझे अपने 'मंथली बर्थडे' पर ये कविता भी भेजी है । मेरे पापा को लगता है कि ये कैलाश गौतम की कविता है ।

जन्म दिन बेटे तुम्हारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
साथ लाया नया सूरज
और बीता कल हमारा
देर तक देखा निहारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
("बेटे" की जगह "जादू" पढ़ना )
फिर हमारे खून ने ही
हमें बिन बोले पुकारा
उठी गंगा की लहर सी
झिलमिलाती भावधारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
मन हुआ फिर मिले हमको
ज़िन्दगी अपनी दुबारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा
"माँ" तुम्हारी "खीर" सी महकी फिरी
हुई दादी बीच हलुए के, गरी
नाव जैसे पा गयी फिर
भंवर में खोया किनारा
सजी टोली की दुआएँ
टँका अक्षत का सितारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा ।


फिर डॉक्‍टर मामा ने मेरी मम्‍मी के लिए एक लोरी भी भेजी है । वो भी आपको पढ़नी ही पढ़ेगी । क्‍या पता आप लोगों के काम भी आ जाए । मेरे काम तो आने ही वाली
है । पक्‍का ।

भैया सो जा बारे बीर
बीर की निंदिया लागी, जमनाजी के तीर
आम से बांदो पालनों, पीपर से बांदी डोर
जों लो भैया सोवन न पाए, टूट गई लमडोर
अब नें रोओ मोरे बारे बीरन नैनन बह गए नीर
जब तक मोरो भैया सोहे झपट बनेंहो खीर
ताती-ताती खीर बनैहें ओई में डारहैं घी
बाई खीर जब भैया खैहें ठंडो परहै जी

अब कोई इत्‍ती लोरी सुनाए तो भला मुझे नींद कैसे नहीं आयेगी । गुड नाईट । मेरा मतलब गुड-डे । neend आप भी अपनी बात कहिए और सो जाईये ।

26 July 2009

जादू, डॉक्‍टर मामा और समीर अंकल की कवितागिरी

आज मेरा मंथली बर्थडे है ।
आज मुझे खीर चटाई जाने वाली है । देखिए ना देखते ही देखते मैं पांच महीने का हो गया । अभी-अभी ही तो मैं पैदा हुआ था और अस्‍पताल के पालने पर ऐसे लेटा हुआ था । या मुझे देखने आने वालों की गोद में सो रहा था । ये देखिए । बिना फ्लैश के खींची फोटो है ये । मेरे शुरूआती दिनों में फ्लैश लगाकर तस्‍वीरें खींचने की इजाज़त नहीं थी ।
jaadoo first day fotos_008फिर जब मैं अपने घर पर आ गया ना, तो अभी-अभी की ही बात है जब मैं सोते-सोते 'इस तरह' से मुस्‍कुरा रहा था । और मेरे पापा ने मेरी तस्‍वीर खींच ली थी । आप सोचेंगे कि ये मैं आंखें खोलकर कैसे सो रहा हूं । 'जादू' हूं ना ....मैं कुछ भी कर सकता हूं ।
IMG_2335एक दिन मैंने आपको अपने नन्‍हे-दोस्‍तों से मिलवाया था ना । 'टेडी-बेयर' मेरा सबसे अच्‍छा दोस्‍त है । हर वक्‍त वो मेरे साथ ही रहता है । देखिए एक दिन मैं सो रहा था तो टैडी-बेयर सबको शांत कर रहा था । सबको बोल रहा था 'श्‍श्‍ाशशश' मेरा जादू सो रहा है--चुप रहिए । bearफिर एक दिन मैं नहा के निकला तो मम्मी ने मुझे गुलाब का फूल बना दिया । उस दिन तो मुझे बड़ा मज़ा आया था । सच्‍ची । ये देखिए ।
roseअरे हां । पता है सागर नाहर अंकल की पोल खोल दी थी ना मैंने उस दिन । उसके बाद वो नाराज़ हो गए और कहने लगे--

किट्टा, किट्टा, किट्टा
पूरी चैट सबको बता दी ना, जाओ अब हम आपसे बात नहीं करेंगे.. हम आपकी चाची से पिटते हैं यह सब को क्यों बताया ?

अब देखो हम भी आपकी सारी बातें सबको बता देंगे,... यह भी कि जादूजी इत्ते बड़े यानि तीन महीने के हो कर अब तक नैपी गीली करते हैं... बिस्तर में छु- छु करते हैं.. और .. और.. मम्मी पापा के कपड़े गन्ने करते हैं।

किट्टा- किट्टा- किट्टा.. देखो अब मनाना मत वर्ना मैं मान जाऊंगा ।


लो अब सागर अंकल गुस्‍सा हो जाएंगे तो हैदराबाद में मेरी आव-भगत कौन करेगा । BBMAIN वैसे भी मेरे मम्‍मी-पापा को चारमीनार वाला ये शहर बहुत पसंद है । इसलिए सागर  अंकल को मैं मना रहा हूं । उनसे 'सॉरी' नहीं कहूंगा । मैं उनसे कह रहा हूं कि अंकल अब से तय रहा....जब भी आप मुझसे फोन पर बातें करेंगे या फिर जब भी आप मुझे मेल करेंगे या कोई कमेन्‍ट करेंगे यहां पर..........तो मैं सबको बताऊंगा/नहीं बताऊंगा/बताऊंगा/नहीं बताऊंगा । समझ गए ना । अब तो मान गए ना अंकल । मान जाईये वरना आपके ऊपर 'छू-छू' कर दूंगा हां ।

कल मेरे डॉक्‍टर मामा की एक चिट्ठी आई है । इस चिट्ठी के ज़रिए मामा ने 'समीर अंकल' को बुरा फंसा दिया है । पता नहीं समीर अंकल अब क्‍या करेंगे । मुझे कोई चिट्ठी आए और मैं सबको ना पढ़वाऊं । भला ऐसा कैसे हो सकता है । तो लीजिए पढिये डॉक्‍टर मामा ने क्‍या लिखा है ।
  

प्यारे-प्यारे जादू !

अब जब तुम्हारे ब्लॉग पर  हमारी मामागिरी पूरी तरह से शुरू हो ही गयी है, तो हमें ख़ुद अपने एक मामा जी की याद आ गयी है। मज़े की बाद यह कि वो तुम्हारे भी मामा ही हैं। है न अजीब बात ?
अरे ; हमारे-तुम्हारे क्या,वो तो तुम्हारे मम्मी-पापा के भी मामा हैं।

तो यह मामा जी भी जब तुम्हारे जितने बड़े थे, तो एक दिन अपनी मम्मी के पीछे पड़ गये थे । इस बात की याद हमें तुम्हारी एक फ़ोटो में तुम्हारे पहने कपड़े देखकर आयी :


हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला ।

सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ ।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कोई कुर्ता ही को भाड़े का ।

बच्चे की सुन बात, कहा माता ने अरे सलोने`
कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने ।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ ।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा ।

घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी होता है
नहीं किसी की भी आँखों को तू दिखलाई पड़ता है ।

 


अब तू ही यह बता नाप तेरी किस रोज़ लिवाएँ

सी दें एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन पे आये ।



अपनी टिप्‍पणी में 'कविता वाले डॉक्‍टर मामा' ने 'समीर अंकल' को ये कहके फंसा दिया है ।


ई तो गजबै हो गया !
तुम्हारे समीर अंकल उर्फ़ "उड़न तश्तरी" तो जब पैदा भी नहीं हुए थे, तब हमने सुनी थी यह कविता । उन्हें कब और कहाँ सुनने-पढ़ने को मिल गयी ?
....ख़ैर, वैसे भी हिसाब-किताब,बहीखाता वाले आदमी हैं,सो साथ में कविताओं का हिसाब-किताब भी रख लेना कोई बड़ी बात नहीं । तारीफ़ तो तब भी हमारी ही है,जो रोज़ इतने ख़ून-ख़राबे के बीच आधी सदी बाद भी यह पूरी की पूरी याद है हमें ।

जो भी हो,सही जवाब देकर तुम्हारे "उड़न तश्तरी" अंकल (यूँ इस नाम से तो आण्टी लगते हैं ) वाकई फँस गये हैं । अब यह भी बताएँ कि चिड़िया वाली कविता किसने लिखी थी(और हमने तुम्हें जो सुनाई उसमें कहाँ-कहाँ गलतियाँ थीं) ,तो हम वाकई मान जाएँ उनको !


देखो
'समीर चाचा' अब चैलेन्‍ज मिल ही गया है तो चाहे जितना समय लगे, अपन को जवाब देना ही है और वो भी सही-सही । है कि नहीं । अच्‍छा तो मैं चलता हूं । आज मेरी 'खीर-चटाई' जो है । बाय-बाय ।

25 July 2009

डॉक्‍टर मामा या कविताओं का ख़ज़ाना

अरे कल बड़ा मज़ा आया । पता है...मैंने उस दिन इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा की भेजी कविता आपको पढ़वाई थी ना । जिसका शीर्षक था--'मैं यही समझती थी बस इतना है संसार । इसके बाद डॉक्‍टर मामा ने मुझे बड़ी मज़ेदार बातें लिखी हैं । सबसे पहली बात तो ये है कि जो भी मुझसे कुछ कहता है या मुझे कुछ लिखता है, उसे मैं अपने ब्‍लॉग के ज़रिए सबको बता देता हूं । कल सागर अंकल से की गयी चैट मैंने सबको पता दी । ही ही ही । कित्‍ता मज़ा आया ना । इसके बाद डॉक्‍टर मामा ने मुझे ये लिखा---


हमारी पहली  चिट्ठी भी तुम सबको पढ़वा दोगे। अब तो हमें  बहुत ही डर लगने लगा है - तुमसे । हम तुम्हें कुछ लिखें-बताएँ,तो पता नहीं कब तुम्हारा मन करे और तुम सारी दुनिया को पढ़वा दो।

हमने तो कहीं अपना नाम तक नहीं लिखा था, क्योंकि मालूम था तुम तो समझ ही लोगे ,पर तुम तो लगे बाकी सबके सामने हमारी पोल खोलने । लेकिन क्या करें, तुम्हें लिखे बिना हमारा मन भी तो नहीं मानता । तो अब से हम वही बातें तुम्हें लिखेंगे ,जो तुम दूसरों को बता भी दो, तो  हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।

लगता है चिड़िया वाली कविता तुम्हें कुछ ज़्यादा  ही पसन्द आ गयी और दूसरों को भी । लोग हमें "कविता वाले मामा" भी कहने लग गये हैं । ठीक है यही सही ; अब से हम समय-समय पर तुम्हें यहाँ कविताएँ ही सुनाया करेंगे; ज़्यादातर वही जो हमने अपने बचपन में पढी-सुनी थीं । 


डॉक्‍टर मामा का ये जवाब मुझे बड़ा पसंद आया है । अरे इत्‍ती बढिया कविताओं की 'जुगाड़' जो लग गयी है । मेरे प्‍यारे-प्‍यारे डॉक्‍टर मामा ने मेरे बचपन को कवितामय बना दिया है । इसलिए जब उनसे मिलूंगा तो उनके गाल पर बहुत सारा प्‍यार करूंगा । सच्‍ची Tongue


अच्‍छा तो अब आपको बता दूं कि कल मैं अपने कमरे के लिए परदे ख़रीदने गया तो मैंने अपनी कौन-सी अदा दिखाई थी । कल थोड़ा ठंडा मौसम था ना इसलिए मम्‍मी-पापा मुझे एकदम 'तैयारी' से ले गए थे । ये देखिए :
ghoomnaaअब ज़रा डॉक्‍टर अंकल की चिट्ठी और उनकी टिप्‍पणी का मिला-जुला रूप पढिये ।

 


प्यारे-प्यारे जादू,

तुम्हारे दोस्तों से मिलकर बड़ा मज़ा आया । जब हम तुम्हारे जितने बड़े थे, तो हमारे भी कई ऐसे दोस्त तो थे ही ; साथ ही कई चलते-फिरते दोस्त भी थे । उनमें से हमारा बहुत प्यारा एक ख़रगोश भी था,जो अपने पूरे परिवार के साथ हमारे साथ रहता था और हमारे साथ ख़ूब खेलता था। उसके साथ हमने अपनी पहली सालगिरह पर एक तसवीर भी खिंचवाई थी, जो हम यहाँ तो नहीं लगा पा रहे हैं,लेकिन तुम्हें अलग से भेज दे रहे हैं :
Neeraj - First B'Day ( बताईये ज़माना कित्‍ता बदल गया है । डॉक्‍टर मामा असली ख़रगोश से खेलते थे और मैं नकली खिलौनों से । इस तस्‍वीर में तो डॉक्‍टर मामा मेरे जैसे लग रहे हैं ना
--जादू )


चिड़िया की तरह ही उस ख़रगोश ने भी हमें एक कविता सुनाई थी । लो सुनो : 


वन में एक घनी झुरमुट थी, जिसके भीतर जाकर

खरहा एक रहा करता था, सबकी आँख बचाकर।

फुदक-फुदक फुनगियाँ घास की,चुन-चुन कर खाता था

देख किसी दुश्मन को, झट झाड़ी में छुप जाता था ।

एक रोज़ आया उस वन में, कुत्ता एक शिकारी

लगा सूँघने घूम-घूम कर, वन की झाड़ी-झाड़ी ।

आख़िर वह झाड़ी भी आयी, जो खरहे का घर थी

मग़र ख़ैर उस बेचारे की लम्बी अभी उमर थी ।

लगी साँस कुत्ते की जो, खरहा सोते से जागा

देख काल को खड़ा पीठ पर, जान बचाकर भागा ।rabbit

झपटा पंजा तान, मगर खरहे को पकड़ न पाकर
पीछे-पीछे दौड़ पड़ा कुत्ता भी जान लगा कर ।

चार मिनट तक खुले खेत में रही दौड़ यह जारी

किन्तु तभी आ गयी सामने, घनी कँटीली झाड़ी।

भर कर एक छलाँग खो गया, खरहा बीहड़ वन में

इधर-उधर कुछ सूँघ फिरा, कुत्ता निराश हो वन में ।

एक लोमड़ी देख रही थी, यह सब खड़ी किनारे 

कुत्ते से बोली मामा, तुम तो खरहे से हारे ।

इतनी लम्बी देह लिये हो, फिर भी थक जाते हो

वन के छोटे जीव-जन्तु को भी न पकड़ पाते हो ।

कुत्ता हँसा अरी दीवानी, तू नाहक बकती है

इसमें है जो भेद, उसे तू नहीं समझ सकती है ।

मैं तो केवल दौड़ रहा था, अपना भोजन पाने

लेकिन खरहा भाग रहा था अपनी जान बचाने।

कहते हैं सब शास्त्र, कमाओ रोटी जान लगा कर

पर संकट में प्राण बचाओ, सारी शक्ति लगाकर ।

यह कविता हमें इसलिये भी याद आयी कि इसमें भी एक "मामा" जी हैं। कौन; तुम समझे या नहीं ?

यह तो करीब पचीस  साल बाद जब हम बहुत बड़े हो गये, तब हमें पता चला कि यह कविता दरअसल लिखी किसने थी । ज़रा पूछकर देखो तो, तुम्हारे मम्मी-पापा बता पाते हैं क्या ?.... या तुम्हारे ब्लॉग पर कोई अंकल-आण्टी ?  हिन्ट के तौर पर इतना ही कि हिन्दी साहित्य के बहुत ही प्रसिद्ध कवि हैं वो !

अब तो तुम यह भी समझ ही गये होगे कि कहानी-कविताओं के अलावा बहुत सारी पहेलियाँ भी आती हैं हमें ! 


तो डॉक्‍टर मामा ने इस कविता के ज़रिए एक पहेली भी rit पूछ डाली

है । 


देखें आप लोग इसका जवाब दे पाते हैं या नहीं ।

अब मैं चला । आज मैं जा रहा हूं अपने ऋत्विक भैया के पास । ये मेरी मौसेरे भाई हैं । और इनका कल 'हैपी बर्थडे' था । मैं सोच रहा हूं बर्थडे उनका है और गिफ्ट भी अपने लिए मैं उनसे ही वसूल लूं । कैसी रही ।


24 July 2009

जब मैंने सागर नाहर अंकल से चैट की

कल ज्ञान अंकल ने कहा---


क्या बड़ी बड़ी चमकदार आंखें हैं - जादू करतीं। मम्मी तुम्हारी कजरौटे से माथे पर कोने में टीका नहीं लगातीं - नजर न लग जाये! 


सच्‍ची अंकल ! कजरौटा यहां कहां मिलता है । प्‍लास्टिक की डिब्‍बी में जो काजल आता है ना, मेरी मम्‍मी उसे से कोने में एक छोटा-सा टीका लगा देती हैं ।
teeka
पहले मम्‍मी बीच में टीका लगाती थीं, लेकिन मैं हाथ से पोंछकर उसे मस्‍त चाट लेता
था । अरे हां...आपको पता है, कुछ समय पहले मेरी मालिश करने के लिए प्रतीक्षा आंटी आती थीं, वो तो तीन-तीन टीके लगती थीं । ये देखिए:
IMG_2801

रंजन अंकल ने कल बड़ा अच्‍छा काम किया, मेरे पापा से डेन्‍टान लाने को कहा । पर पापा एक बार में कहां सुनने वाले हैं । कल शाम को बारिश इतनी थी कि वो दवा लाने की बजाए सीधे घर ही आ गये । लगता है आज शाम को ज़रूर जायेंगे ।

और हां समीर अंकल  ने मेरे मम्‍मी-पापा के बारे में जिज्ञासा व्‍यक्‍त की और उनसे नमस्‍ते भी कहा । तो ताऊ जी पापा-मम्‍मा ने आपको भी नमस्‍ते भेजा है । और ये कहा है कि जल्‍दी ही आपसे मुलाक़ात भी होगी ।

कल मैंने वादा किया था कि मम्‍मी की लाई नई चीज़ें आपको दिखलाऊंगा । दरअसल आजकल उंगली-अंगूठा चूसने के अलावा मेरा एक काम है अपने होंठ चबाने का । इसलिए मम्‍मी बड़े-बूढ़ों और डॉक्‍टर की सलाह पर कुछ चीज़ें  लाई हैं । जिनको चबाने-चूसने में मुझे मज़ा आ रहा है । ये देखो : teathersमम्‍मी को आम बहुत पसंद हैं । ख़ासकर लंगड़ा और चौसा । इसलिए जब मेरे लिए 'टीथर' लाने की बारी आई तो मम्‍मी अभी से एक आम ले आईं कि लो ये चूसो । अब मैं हर मौसम में आम चूस सकता हूं ।
mango teather अच्‍छा अब मैं आपको वो चैट पढ़वाता हूं जो मैंने 'सागर अंकल' से संडे को की
थी । इसमें सागर अंकल की बहुत सारी पोल खुली है ।


sagarnahar: good morning Jaduji :)
जादू

: गुड मॉर्निंग अंकल । कहां थे आप ।

मैंने अपना ब्‍लॉग शुरू कर दिया ।


sagarnahar: सच्‍ची । अच्छा अब्बी देखते हैं, भई । छुबह से फालतू कामों में व्यछ्त थे।
जादू

: आप भी ना बश अंकल ।

इत्‍ते बिजी रहने ठीक बात नईं हैं


sagarnahar: सोरी .. सोरी।

आंईदा ध्यान लकेंगे।


जादू: ठीक है । वलना छोच लीजिए

आपके ऊपल छू छू कल दूंगा

हां


sagarnahar: :)

जादू

: खाना खाया आपने

या आंटी ने घल शे निकाल दिया

sagarnahar: हे हे हे,,, सबका आपके पापा जैसा थोड़ी होता है, हमें गर से नहीं निकालती, हमारी तो बस पिटाई होती है... किसी से कहना मत

:)

जादू: अले बाप ले ।

आपकी पिटाई होती है ।

मेले पापा को तो मम्‍मी घल से निकाल देती हैं ।

आप भी किछी छे कहना मत

sagarnahar: हां, पल किछी छे कहना मत वलना लोग कहेंगे

बड़े नाहर बनते हैं और मार खाते हैं

जादू: हम्‍म । मैं किसी को नहीं बतऊंगा छच्‍ची ।

जोल छे लगी तो नहीं आपको ।

sagarnahar: बहुत जोल छे लगी.. सर मे गूमड़ा हो गया

जादू : अले बाप ले

ऐछा क्‍या ।

पता है आज मैंने पिटाई कल दी ।

 


sagarnahar: अले किछकी पिटाई की


जादू: अपने नए वाले तकिये की ।

खूब जोल छे माला

वो लोने लगा


sagarnahar: ऐछा नई करना बेटा वो तो आपका दोस्त है ना  !
अच्छे बच्चे ऐछा नहीं करते । गन्नी बात ।


जादू

: अच्‍छा थीक है ।

अभी मैं चबा रहा हूं

sagarnahar: :) । क्‍या चबा रहे हो जादू

जादू: अले मैं एक नई चीज चबा रहा हूं ।

मम्‍मी चबाने वाले खिलौने लाईं है कल ।

उनको चबा चबा के उनकी चटनी बनानी है मुझे ।



sagarnahar: हां, ये अच्छा है। खुब चबाओ उनको तो वे बहुत बदमाछ है, उनका तो यही होना चाहिये  ।

जादू : थीक है

अंकल । आपके हैदराबाद में बालिश हो लही है क्‍या

sagarnahar: नईं बेटा तेज धूप पड़ लई है.. आपके शहर में

जादू : ही ही ही ।

बालिश हो लही है ।

बालिश ज्‍यादा होती है तो पता है मैं क्‍या कलता हूं ।

sagarnahar: क्या कलते हो?
जादू

: बार बार छू छू कलता हूं ।

sagarnahar: हां.. मैं छमझ गया था
जादू

: अले आपके कैछे पता ।

आप तो अंकल बले वो हैं

sagarnahar: आपके चैतन्य भैया भी ऐछे ही करते थे
जादू

:

अभी तो नईं कलते ना

sagarnahar:

और आपकी कोई गर्ल फ्रेन्ड बनी की नईं ?

किछी छे नहीं बोलूंगा
जादू

: थीक है पर पक्‍का प्रॉमिस करो

sagarnahar: पक्का

जादू

: एक बनी है श्रेया । थर्ड फ्लोर पर रहती है ।

मेरी ही बिल्डिंग में ।

मुझसे बड़ी है वो ।

sagarnahar: अच्छाऽऽ

जादू: हम्‍मम ।

हम रोज शाम को मिलते हैं

sagarnahar: बड़ी छोटी तो चलती है, कैछी है वो ।

अले वाह ।

जादू : बहुत  अच्‍छी है ।

हम रोज खेलते हैं शाम को ।

बिल्डिंग के नीचे ।

sagarnahar: गुड गुड...आपने उछके बाल खींचे की नईं ?
जादू

: खींचूंगा ।

आज शाम को

जोर से खींच दूं 

sagarnahar: हां... दोस्तों में चलता है इतना तो ।

और उचकि आंख में हाथ मत डालना
जादू

: तो फिर ठीक है ।

आज पक्‍का खींचूंगा ।

ठीक है नहीं डालूंगा उछकी आंख में उंगली


sagarnahar: शाबास, अच्छे बच्चे हो। आपके पापा से ज्यादा समझदार ...
आपको पता है मम्मी पापा के बाल खींचती है ?
जादू

: अच्‍छा ।

सच्‍ची ।

क्‍यों खींचती हैं

sagarnahar: पापा बाजार से सामान नहीं लाते ना इसलिये
जादू :

अंकल रूकिए मैं जरा आता हूं ।

एक जरूरी काम करने जा रहा हूं

sagarnahar: पापा और मम्मी को डाँटने.. अच्छा डाँट आओ
जादू: अरे नहीं अंकल मैं छूछू करने जा रहा हूं । बाय बाय ।



तो ये थी सागर अंकल से मेरी चैट । आपको कैसी लगी ज़रूर बताईयेगा । अब मैं चला, श्रेया के बाल खींचने हैं ना मुझे ।

23 July 2009

चलो अंगूठा चूसा जाए

पता है, मेरे शहर में अभी अच्‍छी बारिश हो रही है । हो सकता है कि शहर में पानी की जो किल्‍लत है वो शायद खत्‍म हो जाए । वरना सोचिए कि मैं अभी कुछ महीनों बाद अपने टब में 'छपर छपर' करके कैसे नहाऊंगा । कल जब मैंने कहा कि मैं तो चला अंगूठा चूसने तो 'समीर' अंकल ने कहा अंगूठा तो है ही नहीं मुंह में । अरे मैंने सोचा भला क्‍यों अपनी अंगूठा चूसने वाली फोटो लगाऊं । पर अब देख ही लीजिए । IMG_3319मम्‍मी-पापा दिन भर इस बात से परेशान रहते हैं कि आजकल मुझे अंगूठा चूसने का शौक चढ़ा हुआ है । शायद इस उम्र में सभी बच्‍चों को ये शौक़ चढ़ता होगा । लेकिन समय के साथ ये जुनून खत्‍म हो जाता होगा । पता है, मैं अलग अलग तरह से अंगूठा चूसता हूं । IMG_3071दिलचस्‍प बात ये है कि मैं केवल अंगूठा ही नहीं चूसता । बल्कि जो कुछ हाथ में आ जाए उसे ही चबाना या चूसना चाहता हूं । अख़बार खाने वाली तस्‍वीरें तो आप देख ही चुके हैं । अब ज़रा ये देखिए कि मैं अपने खिलौने को कैसे चूस रहा हूं ।
IMG_3259
लेकिन मुझे इस सबसे रोकने का एक तरीक़ा ये है । इसमें मुझे इसलिए मज़ा आता है क्‍योंकि मैं अपनी शरारतों को छोड़कर मस्‍त सो जाता हूं । IMG_3313और हां अब ज़रा  देखिए लगातार बारिश होने की वजह से मज़ा तो आ रहा है पर मेरे घर का क्‍या हाल है । IMG_3318हां तो अब मैं चला अंगूठा चूसने । वैसे कल आपको बताऊंगा कि मम्‍मी मेरे चबाने और चूसने के लिए क्‍या-क्‍या लाईं हैं । पहले आप बताईये कि आपको मेरी ये अदा कैसी लगी फिर आप भी अंगूठा चूसने का मज़ा लीजिए ।    

22 July 2009

खुद भी नहाओ दोस्‍तों को भी नहलाओ ।

हमारे शहर में कितनी बारिश हो रही है, कुछ पता भी है आपको । paani
उस दिन पाब्‍ला अंकल परेशान थे
कि उनके शहर में बारिश रूक ही नहीं रही है । बारिश हो तो भी दिक्‍कत है और ना हो तो भी दिक्‍कत है । ये देखिए हमारे शहर की बारिश का एक नज़ारा मेरे कैमेरे से । ये फोटो मैंने ही खींची है । सच्‍ची । आप देख रहे हैं कितना पानी भर गया है सड़क पर । कितनी गंदगी हो गयी है । छी छी ।

अरे हां, कल मैंने सोचा कि रोज़ की तरह खुद तो नहा लूं अपने दोस्‍तों को भी नहला
दूं । तो आईये आपको मिलवाऊं मेरे दोस्‍तों से । सबसे पहले मैंने नहलाया अपने teddy bear को । उसके बाद वो बेचारा इत्‍ता भारी हो गया कि मुझसे उठा ही नहीं । मम्‍मी ने उसे उठा के गैलेरी पर रख दिया । आज भी वो गैलेरी पर ही बैठा है । IMG_3277
उसके बाद बारी आई  डोनाल्‍ड

डक और उसके दो दोस्‍तों की । लेकिन वो तो नहाना ही नहीं चाहते थे । गंदू कहीं के । मैंने उन्‍हें ज़ोर से डांट लगाई और कहा कि आज मेरे साथ नहाना ही होगा । वरना मैं तुम लोगों से बात नहीं करूंगा । इसके बाद इन लोगों को भी सूखने के लिए खिड़की पर रख दिया । ये देखिए :
duck
इसके बाद बारी आई मेरे दो और दोस्‍तों की । इनके नाम है फ़रू और सीधू । मम्‍मी इन्‍हें मेरे पैदा होने के पहले से ही घर ले आईं थीं ।  जब मैंने अपने इन दोस्‍तों से कहा कि चलो चलो तुम भी नहा लो....तो बाईं ओर जो लाल वाला 'सीधू' है ना इसने कहा कि मुझे तो सर्दी-जुकाम हुआ है और दाहिनी तरफ वाले 'फरू' ने कहा कि उसे तो बुख़ार है । कित्‍ते बहानेबाज़ हैं ना ये लोग । चलो इस बार तो बच गए, अगली बार इन दोनों को शावर में नहलाऊंगा ।

IMG_2173आप सोच रहे होंगे कि मैंने इत्‍ती सारी बातें कीं लेकिन इस बात का क्‍या सुबूत है कि मैं नहाता हूं रोज़-रोज़ और मुझे पानी से खेलने में कितना मज़ा आता है । ये देखो, नहाने के बाद की मेरी अदा ।
IMG_3311और हां....मैंने तय कर लिया है कि सागर अंकल से उस दिन मेरी जो 'चैट' हुई थी...वो आप सबको पढ़वा दूंगा । और हां इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा की चिट्ठी भी तो है जो मुझे आपको पढ़वानी है । तो आते रहिएगा 'जादू' की दुनिया में । अब मैं चला अंगूठा चूसने । बाय बाय । 

21 July 2009

डॉक्‍टर मामा की भेजी कविता : मैं यही समझती थी बस इतना है संसार

पता है मेरी पहली पोस्‍ट पर मेरे इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा ने एक टिप्‍पणी की जो मुझे बहुत पसंद आई है । डॉक्‍टर मामा ने इसमें एक चिडि़या की कविता लिखी है । आप भी पढिए ।

हम सबके प्यारे-प्यारे जादू !bird-photography

अपने मम्मी-पापा की दुनिया में आये तुम्हें अभी छ: महीने भी  नहीं हुए और तुम इस ब्लॉगिंग की दुनिया में भी आ गये !! अच्छा लगा । यहाँ भी तुम्हारा बहुत-बहुत स्वागत !!!
अब आगे हम क्या कहें ? ज़्यादातर तो और लोग कह ही चुके हैं ।
हाँ ,बात बार-बार दुनिया या संसार की हो रही है,तो आज हम इसी पर तुम्हें एक गीत सुनाते हैं ,जो हमें एक चिडि़या ने सुनाया था। बहुत पहले सुनाया था न, सो बहुत ठीक से याद तो नहीं,लेकिन कु्छ इस तरह था :

सबसे पहले अण्डे जैसा मेरे घर का था आकार,
तब मैं यही समझती थी कि बस इतना सा है संसार ।
फिर मेरा घर बना घोंसला नन्हें तिनकों से तैयार,
तब मैं यही समझती थी कि बस इतना सा है संसार ।
फिर मैं बाहर आयी फुदकी नन्हीं शाखों पर सुकुमार,
तब मैं यही समझती थी कि बस इतना सा है संसार ।
फिर मैं खुले गगन में पहुंची उड़ी दूर तक पंख पसार,
तभी समझ में मेरी आया बहुत बड़ा है यह संसार ।

संसार में तुम्हारी प्रसिद्धि को भी इसी तरह पंख लगें,इसी शुभकामना और स्नेह के साथ,
हम हैं
अरे "वही" ; और कौन ?

 

 

 


तो ये थी मेरे डॉक्‍टर मामा की भेजी कविता । आपको एक बात और बतानी है, डॉक्‍टर मामा ने ही मुझे अपने जीवन की पहली चिट्ठी भेजी थी । लेकिन वो फिलहाल मैं आपको नहीं पढ़ाऊंगा । अगर मेरा मन किया तो ज़रूर पढ़ा दूंगा पर अभी नहीं ।

आप बताईये आपको ये कविता कैसी लगी ।

20 July 2009

बताईये ! अख़बार पढ़ा जाये, चाटा जाये या खाया जाए

कल मैंने ब्‍लॉग-जगत में अपना पहला क़दम रखा और आप सभी का आर्शीवाद और प्‍यार मिला मुझे । मुझे उम्‍मीद है कि आप इसी तरह से मुझे दुलराते रहेंगे । कल संडे था । मेरे पास बहुत सारी फुरसत थी । जब मैं अपनी 'मेल' चेक कर रहा था तो अचानक सागर अंकल ऑनलाइन आ गये और उन्‍होंने मुझसे खूब लंबी चैट की । किसी दिन वो चैट मैं आपको ज़रूर पढ़वाऊंगा ।

हमारे घर में अखबार के जुनूनी लोगों की कमी नहीं है । IMG_1810 मेरे दादाजी और मेरी दादीजी भी रोज समय निकालकर अखबार जरूर पढ़ते हैं । एक दिन दादाजी कह रहे थे कि पापा जब छोटे थे तो अखबार पर बैठकर उसके अक्षर जोड़कर पढ़ते थे । मम्‍मी-पापा सब रोज कई-कई अख़बार बड़े शौक और ध्‍यान से पढ़ते हैं । ये देखो मेरे चाचा हफ्ते भर के अखबार पढ़ रहे हैं । लगता है उन्‍हें पूरे हफ्ते टाइम नहीं मिला था अखबार पढ़ने का । मेरे पापा भी ऐसा ही करते हें । बल्कि अगर आज का अख़बार आज नहीं पढ़ पाए तो कल उसमें से अपने काम की खबरें पढ़ते हैं । तो मैंने सोचा कि मैं क्‍यों पीछे रहूं । इसलिए जैसे ही कल मुझे थोड़ा-सा वक्‍त मिला मैंने सोचा कि चलो अखबार पढ़ने का काम निपटा दिया जाए । फिर क्‍या था, मैंने जो किया वो आपके सामने है ।

टाइम्‍स ऑफ इंडिया में हिलेरी क्लिंटन के भारत आने की खबर में मेरी बहुत दिलचस्‍पी थी । मैंने ये खबर खूब ध्‍यान से पढ़ी । times crop 2फिर बारी आई नवभारत टाइम्‍स की । हिंदी अख़बार पढ़ना तो ज़रूरी है ना । हिंदी राष्‍ट्रभाषा जो है हमारी । तो जो अख़बार सामने दिखा मैंने फौरन उठा लिया । nbtफिर मुझे लगा कि इस अख़बार में से तो अच्‍छी-सी गंध आ रही है । ज़रूर इसका टेस्‍ट मज़ेदार होगा । मैंने सोचा चुपके से क्‍यों ना इसे भी 'चख' लिया जाए ।
eating paperपर मम्‍मी-पापा ने मुझे अख़बार ज्‍यादा चखने नहीं दिया । शायद ये खाने की चीज़ नहीं होती । अच्‍छा चलता हूं  । बहुत भुख्‍खू लगी है । मैं तो चला दुध्‍धू पीने । मम्‍मी !!!!!!!!!!!!!

  


आपने आज का अख़बार तो पढ़ा है ना ।



19 July 2009

मैं हूं आपका नटखट‍ दोस्‍त- जादू ।

लो मैं आ गया । मेरा मतलब मैं 'जादू' ब्‍लॉगिंग की दुनिया में आ गया । आप सोच रहे होंगे कि भला 'जादू' भी कोई नाम हुआ । अरे भई छब्‍बीस फरवरी 2009 को जब मैं पैदा हुआ था तो मेरे बबलू चाचू ने पहले ही दिन देखकर कहा था--'अरे ये तो जादू है' । उन्‍हें मैं फिल्‍म 'कोई मिल गया' के 'जादू' की तरह cute जो लगा था । उसके बाद परिवार के सभी लोग मुझे 'जादू' ही कहते हैं । वैसे मेरा एक असली नाम भी है, जो मैं आपको आगे चलकर कभी बताऊंगा । पहले ज़रा ये तो देखिए कि इस दुनिया में आने के बाद मैंने अपनी कौन-सी अदा सबको दिखाई थी ।  jaadoo first dayदरअसल मैं बहुत पहले ही अपना ये चिट्ठा शुरू करना चाहता था । पर क्‍या है ना कि इस दुनिया में आने के बाद मैं ज़रा 'बिज़ी' हो गया था । अब देखिए ना...कितने सारे काम करने पड़ते हैं मुझे । ये रही मेरे कामों की लिस्‍ट:
1. पॉटी और शूशू करना ।
2. दुध्‍धू पीना ।
3. मालिश करवाना
4. नहाना
5. हाथ-पैर हिला-हिलाकर खेलना jadoo rona
6. टॉनिक पीना
7. जब मरज़ी हो तो मुस्‍कुराना
8. खूब सारा सोना
9. और जब मन ना लगे तो ज़ोर-ज़ोर से रोना । ये देखिए मैं कैसे रोता हूं । वैसे रोना मुझे ज्‍यादा पसंद नहीं है । पर वो क्‍या है ना, कि मुझे जब टॉनिक और दवा पिलाई जाती है तो मुझे पसंद नहीं आता ( मुझे मम्‍मी-दुध्‍धू के अलावा कुछ पसंद नहीं है ना ) इसलिए मैं रोता हूं और सब मुझे चुप कराते हैं, तो बड़ा मज़ा आता है । अरे हां...ऊपर मैंने जो अपने कामों की लिस्‍ट दी है ना, उसमें कई काम छूट गए हैं । मैं अख़बार भी पढ़ता हूं । अपने झुनझुनों से खेलता भी हूं । और खूब गुनगुनाता भी हूं । लेकिन गुनगुनाना मैं अपनी एक अलग भाषा में करता हूं ।

अब देखिए ना इत्‍ता सारा लिखने के बाद मैं थक गया हूं । ये देखिए कित्‍ती नींद आ रही है । IMG_2781 तो अब मैं चलता हूं । लेकिन वादा करता हूं कि रोज़ आपको अपनी ख़बर देता रहूंगा ।
संडे है ना । मुझे दिन-भर सोना है । आप ज़रूर बताईये कि आपको मेरा ब्‍लॉग कैसा लगा । टा टा बाय बाय ।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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