22 August 2009

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोए थे : जादुई कविता

अरे अरे बहुत दिनों से मैंने कोई कविता नहीं सुनाई । पता है पिछली पोस्‍ट पर मैंने लिखा था कि मेरे चाचाजी फ्लैट ख़रीदने के बारे में मुझसे राय मांग रहे थे । इस पर कोई अनाम जी हैं उन्‍होंने लिखा कि लगता है काफी पैसे वाले हैं तुम्‍हारे मामा और चाचा । इस पर 'कविता वाले डॉक्‍टर मामा' ने मुझे एक ऐसी कविता भेज दी जो मेरे पापा ने बचपन में अपने कोर्स में पढ़ी थी । साथ में डॉक्‍टर मामा ने क्‍या टिप्‍पणी की है वो आप यहां पढ़ सकते हैं ।

फिलहाल तो पढिये ये कविता ।

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,
और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !
पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।
सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।
मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।
मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,
ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।
अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।
औ' जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की
गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।
भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।
मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।
किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे
टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।
देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी -
जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।
निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,
बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे
और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,
नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।
तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे
अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ
हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे
बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को
मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है
यह धरती कितना देती है । धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को
नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को
बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।
इसमे सच्ची समता के दाने बोने है
इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है
इसमे मानव ममता के दाने बोने है
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले
मानवता की - जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।


कविता तो अच्‍छी है । डॉक्‍टर मामा ने हमेशा की तरह पूछा है कि इसके कवि कौन
हैं । मुश्किल सवाल नहीं है । पर मैं तो चला । नींद आ रही है मुझे इत्‍ती लंबी कविता सुनकर ।
IMG_2894 आप बताईये इसके रचयिता कौन हैं । खासतौर पर उड़नतश्‍तरी अंकल ।

14 comments:

मीनू खरे said...

बहुत अच्छी कविता है जादू. मैने भी एक ऐसी कविता लिखी थी जल्द ही उसे अपने ब्लॉग पर लगाऊँगी. पढ्ने ज़रूर आना.

ढेर सारे प्यार के साथ,

तुम्हारी
मीनू आंटी

मीनू खरे said...

और हाँ बेटा! तुम्हारी फोटो बहुत प्यारी है.
जब जगना तो मुझे आवाज़ दे देना.

Udan Tashtari said...

बेटा जादू

यह कविता तो हमारे कोर्स में भी थी:

इसके कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी हैं.

मामा को बता देना :)

Udan Tashtari said...

नींद में अच्छा किया जो काजल का टीका लगवा कर सोये, वरना नजर लग जाती है!! :)

कैटरीना said...

Dekte rahna koi pise tod na le.
वैज्ञानिक दृ‍ष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को उन्नति पथ पर ले जाएं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

अरे, याद आया मेरी चिदम्बरा की प्रति तो जाने कहां खो गयी है।
याद दिलाने को धन्यवाद मिस्टर जादू!

"डॉक्टर मामा" said...

"इसके कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी हैं.
मामा को बता देना :)" - Udan Tashtari
***********************************
हमें पता था ; पहले ही से !
:-))

Anonymous said...

jadoo tumhare mamaji itni acchi kavitaye sunate hai aur likhte hai.unse puchna ki kavi ki bajay doctor kaise ban gaye.

"डॉक्टर मामा" said...

"jadoo tumhare mamaji ....... kavi ki bajay doctor kaise ban gaye." - Anonymous
***********************************
इसके पीछे छ: बहुत ही ख़ास वजहें थीं :

१. हमें नींद से सख़्त नफ़रत थी ।
२. हम ज़िन्दगी का सारा मज़ा पहले ही ले चुके थे ।
३. बिना टेन्शन के हम रह नहीं पाते ।
४. पिछले जन्म में हमने घोर पाप किये थे ।
५. हम "गीता" के चक्कर में फँस गये थे, जिसने हमारे दिमाग़ में यह बात बिठा दी थी कि केवल कर्म(इलाज) करो, फल(फ़ीस) की इच्छा मत रखो । इस बारे में हम "मेरी गुड़िया है बीमार" वाली कविता के सन्दर्भ में पहले भी बता चुके हैं।
६. "ज़िन्दगी में हर चीज़ या काम के पीछे कोई वज़ह होती है" - इस बात को हम गलत साबित करना चाहते थे ।

सागर नाहर said...

जादूजी,
आपके डॉक्टर मामा भी अच्छी अच्छी कवितायें लेकर आते हैं, पढ़ना अच्छा लगता है।
मामा से पूछना कि डॉक्टरी ही करते हैं या..? :)
कहीं अपने मरीजों को भी कवितापैथी से तो ठीक नहीं करते!

सागर नाहर said...

मामा से पूछना कि डॉक्टरी ही करते हैं या..? :)

मामा से पूछना कि डॉक्टरी भी करते हैं या..? :)

"डॉक्टर मामा" said...

"मामा से पूछना कि डॉक्टरी भी करते हैं या..? :)" - सागर नाहर
********************
करते हैं ना......खाली समय में और क्या करें ?

अविनाश वाचस्पति said...

जादू जी जल्‍दी ही एक और जादू होने जा रहा है। इंतजार कीजिए ...

virendra singh said...

Ram Dhari Singh Dinkar ji is the poet

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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