20 August 2009

जादू और चाचू की शिखर-वार्ता

आप मेरे बबलू चाचू को तो जानते ही हैं ना । अरे वही जिन्‍होंने मेरा नाम 'जादू' रखा babloo2
है । बबलू चाचू अकसर मेरे घर आते रहते हैं और अकसर मेरा उनके साथ 'विचार-विमर्श' होता रहता है । दरअसल बबलू चाचू भी मेरी तरह बहुत पढ़ाकू हैं ना इसलिए हमारी अच्‍छी 'छनती' है । आप तो जानते ही हैं कि जब दो 'पढ़ने लिखने वाले' मिलते हैं तो देश-दुनिया की कित्‍ती सारी बातें होती हैं । सो जब बबलू चाचू संडे को आए..मैंने सोचा कि इससे पहले कि वो अपने बड़े भैया यानी मेरे पापा के साथ बातों के बुलबुले बनाने लगें, चलो उनसे दुनिया के बारे में कुछ विचार-विमर्श कर लिया जाए ।

 



आजकल बबलू चाचू एक फ्लैट ख़रीदने का सोच रहे हैं । वो पूछने लगे कि बेटा जादू बताओ कि 'स्‍लो-डाउन' का 'प्रॉपर्टी-मार्केट' पर अब तक जो असर पड़ा है तुमको क्‍या लगता है कि वो अभी कायम रहेगा, या फिर 'प्रॉपर्टी-मार्केट' अब चढ़ने लगेगा । मैं समझ गया कि चाचू अभी 'प्रॉपर्टी' के दामों में और गिरावट का इंतज़ार कर रहे हैं ।  cha 1 मैंने चाचू से कहा कि देखिए मैंने अख़बारों में पढ़ा है कि अब 'मार्केट' सुधर रहा
है । हो सकता है कि 'वर्ल्‍ड-इकॉनॉमी' में अच्‍छा सुधार देखने को मिले । वैसे भी ईद-दशहरा-दीवाली आ रहे हैं । ज़ाहिर है कि बाज़ार ऐसे मौक़ों पर सुधर सकता है । आप और ज्‍यादा गिरावट का रास्‍ता मत देखिए और फटाफट एक फ्लैट ख़रीद लीजिए । हो सकता है कि ज्‍यादा इंतज़ार आपके लिए घाटे का सौदा बन जाए । IMG_3633चाचू को मेरे इस जवाब से मज़ा आ गया । फिर मैंने चाचू से कहा कि अच्‍छा मेरी एक समस्‍या हल कर दीजिए । मेरे पास कुछ पैसे हैं । कितने सारे लोग मुझे 'शगुन' के तौर पर पैसे देते रहते हैं, अब सबको मना तो नहीं कर सकता ना, वो बुरा मान गए तो...वैसे भी मैं इतना छोटा हूं । तो बताईये कि इन पैसों को मैं किस 'स्‍टॉक' में लगाऊं । चाचू से ये सवाल इसलिए पूछा क्‍योंकि उन्‍हें 'स्‍टॉक्‍स' की समझ मुझसे ज़रा ज्‍यादा ही है ।
cha 2चाचू तो लगे मुस्‍कुराने । बोले, बेटा जादू इत्‍ती जल्‍दी क्‍या है । फिलहाल 'स्‍टॉक्‍स' के बारे में सोचो भी मत । जब वक्‍त आयेगा तो मैं खुद ही तुमको सब सिखा दूंगा । अभी तो तुमको अपना एक सेविंग्‍स-अकाउंट खोलना है । और उसमें सारे पैसे जमा करते रहना है । बाक़ी बातें समय आने पर । तो मैंने चाचू से कहा अभी तो मम्‍मा ने सारे पैसे एक सुंदर से पैकेट में तारीख़ों और नामों के साथ सहेज कर रखे हैं ।

इसके बाद सवाल पूछने की बारी चाचू की थी । चाचू ने कहा--बोलो जादू इन दिनों कोई फिल्‍म देखी क्‍या तुमने । मैंने चाचू की तरफ देखा ।
cha 3
और बोला--अरे चाचू..आपको पता नहीं है क्‍या कि आजकल 'स्‍वाइन-फ्लू' फैला हुआ है । और सार्वजनिक-स्‍थानों पर नहीं जाना है । वैसे जो लास्‍ट फिल्‍म मैंने देखी थी, वो थी 'ओए लकी ओए' । तब मैं अपनी मम्‍मा के गर्भ में था । वैसे उस ज़माने में मैंने 'दसविदानिया', 'सिंग इज़ किंग', 'आपकी क़सम', 'लक बाइ चांस' 'रॉक-ऑन' और 'स्‍लमडॉग मिलिनेयर' जैसी फिल्‍में देखी थीं । आप बताईये आजकल कौन-सी फिल्‍म अच्‍छी है । चाचू बोले--'यार जादू, मैं तो हर हफ्ते फिल्‍म देखता हूं । इन दिनों मैंने 'कमीने' देखी । अच्‍छी नहीं लगी । 

हम बात ही कर रहे थे कि तभी खाना तैयार हो गया । और चाची ने आकर मुझे अपनी गोद में उठा लिया । बातें ख़त्‍म हुईं  । IMG_3627 

ये बातें आपको कैसी लगीं ज़रा बताईये तो सही ।


नूपुर दीदी ने पूछा है कि दो-चार दिनों से मैं कहां ग़ायब था । पता है मेरे घर का नेट-कनेक्‍शन अस्‍सी घंटों से बंद था । बताईये मैं क्या करता ।

12 comments:

रंजन said...

८० घन्टे बन्द... बहुत नाइंसाफी है..

वैसे बब्लु चाचु की बातें जोरदार है..

विनय ‘नज़र’ said...

अरे जादू तुम तो सलाहकार भी हो
---
मानव मस्तिष्क पढ़ना संभव

सैयद | Syed said...

तो सलाहकार जादू जी, आपके बबलू चाचू की समस्या का समाधान निकला या नहीं ?

Babloo said...

इकोनोमी, मार्केट और रियल इस्टेट तमाम मुद्दों के अलावा इस दिन 1980s के सबसे चालू गानों (जैसे कि "परिबतो के आजि मैं तकरा गया " और "तेरी मेहरबानियाँ" etc etc) की जुगलबंदी के साथ जादू ने ये भी सीखा की सबसे घटिया और चालू फ़िल्मी गानों का मज़ा कैसे लिया जाए.

अर्शिया said...

Bahut sundar.
( Treasurer-S. T. )

जादू.... jaadoo said...

अरे हां चाचू उस दिन आपने और पापा ने आपके ज़माने के कई गाने भी तो गाए थे । तेरी मेहरबानियां, तुमसे मिलकर ना जाने क्‍यूं, यार बिना चैन कहां रे, परबतों से आज मैं टकरा गया, तेरी तस्‍वीर मिल गयी, सोणी मेरी सोणी, मर्द तांगे वाला, मोहम्‍मद रफी तू बहुत याद आया, लंबू जी लंबू जी । और आप लोग कित्‍ता बेसुरा गा रहे थे ना ।

noopur said...

jadoo....yaar ...tum ..to bahot samajhdar hote ja rahe..ho....good keep it up....

Udan Tashtari said...

बड़ी हाई लेवल वार्तालाप रही...सर में दर्द हुआ. अमां, खेलने के दिन हैं भई..ये सब तो सारे जीवन बतियाना है .. :)

"डॉक्टर मामा" said...

तुम भी "क्या खाकर" बबलू चाचू के चक्कर में पड़ गये ?

अरे ; स्टॉक्स,प्रॉपर्टी मार्केट वग़ैरह के बारे में ही पूछना था ,तो सही आदमी से पूछते - हमसे ।

खाली कविता ही थोड़े सुनाते हैं हम !

Anonymous said...

tum to khandani rais nikle.lagta hai kafi paise vale hain tumhare chacha aur mama.

"डॉक्टर मामा" said...

"lagta hai kafi paise vale hain tumhare...mama."
-Anonymous
*********************************************
ज़रा धीरे बोलो "Anonymous" भइया (या बहिन;जो भी आप हों) ; इनकम टैक्स वाले न सुन लें कहीं !
( हालाँकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि ज़िन्दगी में दो चीज़ें शत-प्रतिशत निश्चित हैं - मौत और टैक्स )
हमें तो आप "कविता वाले मामा" ही रहने दो । हाँ "पैसे (की कविता) वाले मामा" ज़रूर कह सकते हो :

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,
और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !
पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।
सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।


मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।
मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,
ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।


अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।


औ' जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की
गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।
भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।


मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।
किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे
टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।


देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी -
जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।


निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,
बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे
और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,
नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।


तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे
अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ
हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे
बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को
मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है


यह धरती कितना देती है । धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को
नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को
बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर


रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।
इसमे सच्ची समता के दाने बोने है
इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है
इसमे मानव ममता के दाने बोने है
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले
मानवता की - जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।

बाकी, पैसों और कवि के नाम का हिसाब-किताब "उड़न-तश्तरी" अंकल के "हवाले" ।
( अब "हवाला कारोबार" में भी मत घसीट लेना हमारा नाम )

सागर नाहर said...

यार जादूजी,
अपने बबलू चाचा से कहकर मेरे कुछ पैसे भी कहीं निवेश करने में मदद करो ना। मैं जानता हूं वो आपका कहा मना नहीं कर पायेंगे। पैसे की कोई कमी नहीं, कल परसों ही गुल्लक तोड़ा तो नये पुराने सिक्के मिल कर साढ़े तीन सौ हुए थे। इस में विप्रो, रिलायंस और इन्फोसिस के हजार-हजार शेयर तो आ जायेंगे ना?
एक बाट और आपके पापा और बबलू चाचू की तरह हम भी उसी बेसुरे गायक के बहुत बड़े फैन हैं, कई बार उसी तरह बेसुरी आवाज में आपकी निर्मला चाची को कहते हैं तुमने दी आवाज तो ....
:)

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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