06 August 2009

जादू की पहली राखी

मैंने उस दिन आपको बताया था ना कि मेरी राखी आ गयी है और मैं उसे 'खाने' जा रहा हूं । मुझे पता नहीं था कि राखी बंधवाई जाती है 'खाई' नहीं जाती । वो तो कल 'रक्षाबंधन' के दिन मम्‍मी ने मुझे बताया । ये देखिए तस्‍वीरें कैसे बंधवाई मैंने अपनी राखी । 1पहले तो मैं इस तरह एकदम तैयार हो गया । नहा-धोकर, नए कपड़े पहनकर । एकदम तैयार । 2उसके बाद मैंने ईशिता और अनुवर्तिका दीदी की लिखी चिट्ठी को पढ़ा । फिर जब रंग-बिरंगी चिट्ठी कुछ ज्‍यादा ही अच्‍छी लग गयी तो उसे 'चख' लिया । 3फिर राखी बांधने के लिए थाली सजाई गई । मेरे 'दोस्‍त' ने थाली सजाने में कैसे मदद की, इस तस्‍वीर में आप देख सकते हैं ।  4    फिर मुझे राखी बांध दी गयी । ये देखिए : 5और उसके बाद..उसके क्‍या बाद क्‍या हुआ........ये देखिए । राखी खाई जा रही है ।
6फिर मम्‍मी ने बताया कि राखी खाई नहीं जाती । खाया तो कुछ और जाता है । मम्‍मी की गोद में मैं कैसा लग रहा हूं ।
7अच्‍छा अब ज़रा मेरी ईशिता और अनुवर्तिका दीदी की चिट्ठी पढ़ लीजिए जो उन्‍होंने मेरे नाम लिखी है । ( बॉक्‍स में उनकी तस्‍वीर भी है, बाईं ओर छुटकी अनुवर्तिका दीदी और दाहिनी ओर बड़की ईशिता दीदी )
   

प्रिय जादू
क्‍या कर रहे हो । सो रहे हो । बहुत सोते हो । कुछ काम-धाम किया करो । जाग didi जाओ और देखो दीदी ने लाल-हरी राखी भेजी है । लाल रंग तुम्‍हारे जीवन में उत्‍साह भरने के लिए और हरा रंग इसलिए कि तुम्‍हारा जीवन समृद्ध और सदा गतिमान रहे । कभी रूके नहीं, कभी झुके नहीं । टुकुर टुकुर देख रहे हो । दीदी को तो अभी तुमने देखा भी नहीं है । पहचानोगे कैसे । कोई बात नहीं । जब कभी मिलोगे तो दीदी तुम्‍हें पहचान लेगी । वैसे जान-पहचान बाहर से नहीं भीतर से हुआ करती है । सही पहचान तो तब होती है जब मन का दर्पण साफ़ हो । मैं मन के दर्पण में तुम्‍हें हमेशा देखा करती हूं । जब से तुम पैदा हुए हो ना तब से । तुम जब थोड़े-से बड़े हो जाओगे तो अपने आप मन के भीतर की पहचान होने लगेगी ।

सुना है कि तुम मेरी बुआ को बहुत हैरान करते हो । अच्‍छी बात है । बुआ को भी अच्‍छा ही लगता है । लेकिन धीरे-धीरे अपनी शरारतें कम करो । अच्‍छे बनो । इतने अच्‍छे कि तुमसे अच्‍छा कोई ना हो ।

अच्‍छा ये बताओ कि घर कब आओगे । तुमने अपना ब्‍लॉग बना लिया है । समय तो कम ही मिलता होगा ना । लेकिन समय निकालकर कभी बुआ को लिवा कर चले आओ । तुम्‍हारी दीदी तुम्‍हारा इंतज़ार कर रही है ।

समय से दूध पी लिया करो । थोड़ा पढ़ाई-लिखाई शुरू कर दो । हां मिठाई तो शायद तुम खा नहीं सकते इसलिए तुम्‍हें नहीं भेज रही हूं । घर आओगे तो सबसे अच्‍छी मिठाई खिलायेंगे तुम्‍हें । मेरी बुआ और फूफा को प्रणाम कहना । पढ़ने के बाद काफी थक गए होगे । इसलिए अब सो जाना ।

रक्षाबंधन की शुभकामनाओं के साथ
तुम्‍हारी दीदी
ईशिता ।

 

 

 

 

 

 

 


ईशिता दीदी की ये चिट्ठी काफी रंग-बिरंगी है । मैं इसे 'स्‍कैन' करके 'जादुई-तस्‍वीरें' पर चढ़ाने वाला हूं । क्‍या करूं टाइम नहीं होता है मेरे पास । जब फुरसत मिलेगी तो चढ़ाऊंगा ।

 



राखी से ठीक पहले मेरे 'कविता वाले डॉक्‍टर मामा' का मेल आया  । उन्‍होंने लिखा---

जादू जी !

तो अब राखी खाने की तैयारी है ?

एक तो तुम दिन भर वैसे ही जाने क्या-क्या खाते रहते हो; ऊपर से तुम्हारी मम्मी पूछती रहती हैं कि क्या खिलाएँ ?

इधर दो-चार दिनों से तुम्हें कोई कविता भी नहीं सुना पाये हम ।

तो,सारी कसर एक साथ पूरी किये दे रहे हैं ।

हमें लगता है कि ज़्यादा लम्बी कविताएँ तुम अभी याद नहीं कर पाओगे,तो लो सुनो एक छोटी कविता,जो हम अपने मामा जी को सुनाया करते थे (जब हमारा ......................खाने का मन होता था) :
Rasgulle

ओ मामा ओ मामा

जब तुम घंटाघर जाना

गोल-गोल रसगुल्ले लाना

उनको खाकर पढ़ने (अभी तो छू-छू करने) जाऊँ

राजा बेटा मैं बन जाऊँ :


Gulabjamun 
ये तस्‍वीरें भी मामाजी ने ही भेजी हैं ।

 

 

 

 

 

 


अरे हां ईशिता दीदी ने भी एक कविता भेजी है जो उन्‍होंने मेरे लिए ही लिखी है ।

ये पढ़ना तो बहुत ज़रूरी है ।
जादू भैया जादूगर
ऐसा कोई जादू कर
दीदी भैया साथ रहें
मीठी मीठी बात करें
जल्‍दी से तू आ जा घर
ऐसा कोई जादू कर
राखी है ये प्‍यार भरी
मुस्‍की मारो प्‍यार भरी
दीदी ताके रोज़ डगर
जल्‍दी से तू आ जा घर

12 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

सही है- राखी खायी नहीं जाती । ईशिता और अनुवर्तिका दीदी की चिट्ठी बड़े काम की है जादू - सब चख ले रहे हो !

Udan Tashtari said...

वाह रे जादू..सुन्दर राखी और दीदीयों की चिट्ठी. बहुत बढ़िया.

Nirmla Kapila said...

वाह भई जादू तुम्हारा जादू तो सिर चढ के बोल रहा है खुश रहो आशीर्वाद्

रंजन said...

जादू... तुझे राखी की बधाई.. दीदी की चिट्ठी बहुत प्यारी है... और राखी बहुत सुन्दर..

प्यार..

सैयद | Syed said...

Jaadu ji, raksha bandhan ki shubhkamnayen.

Science Bloggers Association said...

Haardik Shubhkaamnaayen.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बड़ी जबरदस्त पंच लाइन है:
जादू भैया जादूगर
ऐसा कोई जादू कर

मामा जी said...

भई जादू जी,

देखा हमारा असर ?

इशिता और अनुवर्तिका दीदी भी कविता सुनाने लग गयीं ; सुनाने क्या लिखने ही लग
गयीं !

तो,इसी बात पर

कुछ भी नहीं हैं उनसे कम
कविता लिख सकते हैं हम

हमारे लिये भी बायें हाथ का खेल है यह
और लो; "फटाफट" लिख भी डाली (हालाँकि लिखी है दाहिने हाथ से) :

राखी आयी राखी आयी
जादू जी की राखी आयी

प्यारी नन्ही गोल कलाई
उस पर पहली बार सजाई

की उस दिन जो खीर-चटाई
या फिर रबड़ी दूध-मलाई

और जो "टीथर" मम्मी लायी
उनमें मजा नहीं वो भाई

मौज नहीं वो उनमें आयी
जो अब जाकर मैंने पायी

राखी खायी राखी खायी
जादू जी ने राखी खायी

वैसे एक बात बता दें तुम्हें - बच कर रहना ।
दुनिया में सबसे छुतही बीमारी है - कविता ।

देखो ना; हमसे इशिता और अनुवर्तिका दीदी को लग गयी और फिर उनसे वापस हमें !
पाण्डे अंकल (ज्ञानदत पाण्डेय) को जो लगी,सो अलग !!

है कि नहीं ?

रंजन said...

जादू तुम्हारे मामा मस्त है.. कभी मिलाओ न.

प्यार.

मामा मस्तराम said...

"जादू तुम्हारे मामा मस्त है.. कभी मिलाओ न." - रंजन
*****************************************
सोर्स भी लगाया तो किससे ?

अरे,जादू जी "क्या खा कर*** " मिलाएँगे,जब वो ख़ुद ही नहीं मिले हैं आज तक हम से(हमारा मतलब आमने-सामने)।
(***आज से ये हमारा तक़िया-कलाम हुआ,जादू जी के लिये)

वैसे मिलवा तो रहे हैं रोज़ यहाँ ब्लॉग पर ; और "कितना" मिलना चाहते हैं भाई ?

- मामा मस्तराम

Ritvik said...

Jadoojee tumhare didi ki kavita to bohut achi he. ab tum unhe kya gift doge ye bhi sochlo.

सागर नाहर said...

यार आपके तो मजे हैं, गुलाब जामून, रसगुल्ले, दीदी की चिट्ठी और राखी सब कुछ एक ही दिन में चख लिये!
और राखी पर दीदी को क्या भेंट दी, ये बताया नहीं?

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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