04 August 2009

कर पग गहि अंगूठा मुख मेलत

पता है आजकल मैं नये-नये करतब करने लगा हूं । पहले मैं सिर्फ अंगूठा चूसता था अपने हाथ का अंगूठा । लेकिन उसके बाद हुआ ये कि मैंने कोशिशें कीं और अब दोनों पैरों के अंगूठे मेरी गिरफ्त में आ गये हैं । आजकल मम्‍मी का काम बहुत बढ़ गया
है । पहले वो मेरे हाथ धुला-धुला कर परेशान थीं अब बार बार उन्‍हें मेरे पैर भी धुलाने पड़ते हैं । वैसे तो मम्‍मी मेरे लिए तरह तरह के 'टीथर्स' लाई हैं । पर कई बार मैं उन्‍हें चबा-चूस कर 'बोर' हो जाता हूं । इसलिए मां-पापा का ज़रा-सा ध्‍यान यहां-वहां भटका और मैं ये करतब करता हूं । देखिए । IMG_3545 कहते हैं कि श्रीकृष्‍ण भी अपना अंगूठा चूसा करते थे । सूरदास की ये पंक्तियां देखिए ज़रा--

कर पग गहि अंगूठा मुख मेलत
प्रभु पौढे पालने अकेले हरषि-हरषि अपने संग खेलत
शिव सोचत, विधि बुध्दि विचारत बट बाढयो सागर जल खेलत
बिडरी चले घन प्रलय जानि कैं दिगपति, दिगदंती मन सकेलत
मुनि मन मीत भये भव-कपित, शेष सकुचि सहसौ फन खेलत
उन ब्रजबासिन बात निजानी। समझे सूर संकट पंगु मेलत ।

ये रहा इन पंक्तियों का भावार्थ--


श्यामसुन्दर अकेले पलने में सोये हैं, बार-बार हर्षित होकर अपनी धुन में खेल रहे हैं । हाथों से चरण पकड़कर (पैर के) अँगूठे को वे मुख में डाल रहे हैं । इससे शंकर जी चिन्ता करने लगे, ब्रह्मा अपनी बुद्धि से विचार करने लगे (कि प्रलय का तो समय आया नहीं, क्या करना चाहिये?) अक्षयवट बढ़ने लगा, समुद्र का जल उमड़ पड़ा, प्रलयकाल के मेघ प्रलयकाल समझकर चारों ओर बिखरकर दौड़ पड़े (क्योंकि प्रलय के समय ही भगवान बालमुकुन्द-रूप से पैर का अँगूठा मुख में लेते हैं), दिक्पाल लोग (भूमि के आधारभूत) दिग्गजों को समेटने (वहाँ से हटाने) लगे। (सनकादि) मुनि भी मन-ही-मन भयभीत हो गये, पृथ्वी काँपने लगी, संकुचित होकर शेषनाग ने सहस्र फण उठा लिये (कि मुझे तो प्रभु की प्रलय-सूचना से पहिले ही फणों की फुंकार से अग्नि उगलकर विश्व को जला देना था,जब मेरे काम में देरी हुई।) लेकिन (यह सब आधिदैविक जगत में हो जाने पर भी ) उन व्रजवासियों ने (जो नन्दभवन में थे) कोई विशेष बात नहीं समझी । सूरदास जी कहते हैं-वे तो यही समझते रहे कि श्याम (खेल में) छकड़े को पैर से हटा रहा है ।


तो देखा आपने सूरदास जी ने अंगूठा चूसने का कितना अच्‍छा वर्णन किया है । वैसे आपको बता दूं कि ये पंक्तियां मैंने नहीं मेरे मम्‍मी-पापा ने ढूंढी हैं । वो भी कविता-कोश से । मुझे अभी इस सबका पता कहां है । आजकल मैं एक और करतब करता हूं । और वो है 'पलटी मारना' । और मैं केवल एक ही पलटी नहीं मारता । एक साथ दो पलटी । इसलिए मम्‍मी पापा को हमेशा मेरे आसपास रहना पड़ता है । ताकि मैं कहीं पलंग से या 'सैटी' से छलांग ना मार दूं । ज़रा ध्‍यान यहां से वहां हुआ और मैं पलंग पर एक सिरे से दूसरे सिरे पर पहुंच जाता हूं । ज़मीन पर भी यही हाल है ।
IMG_3515यहां भी अंगूठा चूसने से भला कैसे बचा जा सकता है । ये देखिए मैं क्या करता हूं ।
IMG_3521 वैसे मम्‍मी-पापा रंजन अंकल की बताई दवा ले आए हैं और मुझे दी भी जाने लगी है । अच्‍छा अब मैं चलता हूं । इलाहाबाद से इषिता दीदी और अनुवर्तिका दीदी ने मुझे राखी और चिट्ठी भेजी है । मैं अभी उसे 'पढ़ने' और 'खाने' जा रहा हूं । बाय बाय ।

10 comments:

रंजन said...

वाह जादू मजा आ गया दोस्त.. पल्टी मारना सीख गया तो तु हो गया पल्टुराम.. पहले आदि था..

पापा मम्मी को कहना सूरदास अंकल की कविता मुझे बहुत अच्छी लगी.. कल राखी बांधना और मस्ती करना..

प्यार..

संगीता पुरी said...

वाह .. खूब शैतानी करो .. मम्‍मी पापा को मम्‍मी पापा बनने की पूरी सजा दो।

ओम आर्य said...

bahut hi sundar

Udan Tashtari said...

बहुत सही जादू..तूफान मचाये रहो..पलट पलट कर सबको हालाकान कर दो. :)

Science Bloggers Association said...

Nazar na lage.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

noopur said...

good...

सैयद | Syed said...

वाह वाह ! मज़े हो रहे हैं....

...समीर अंकल के सुझाव पर भी गौर करना :)

Anonymous said...

RITVIK-Rakhi bandhne ke bad tum apne didi ko kya do ge.MUGHE Mughe bhi batao.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

क्या प्यारे! तुम्हारी देखा देखी हमने अपना पैर का अंगूठा चूसने की कोशिश की और स्पॉण्डिलाइटिस के दर्द से पीठ चिलक गई! :-)

सागर नाहर said...

पल्टी मारकर अंगूठा चूस कर बताओ तो मानें।
हाथ का नहीं पैर का!!!

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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