31 July 2009

मम्‍मी-पापा की बातें और 'छिपा-छिपी आगड़-बागड़ जाई रे'

मेरी मम्‍मी की तबियत अब ठीक है । मैंने उस दिन आपको बताया था कि उन्‍हें 'फ्लू' हो गया था । पता है एक दिन हम सब घूमने गए थे । मम्‍मी कुछ शॉपिंग कर रही थीं और उसी शॉप में एक 'बीन-बैग' रखा था । पापा ने मुझे 'बीन-बैग' पर डाल दिया । उसके बाद 'बीन-बैग' पर मैं ऐसे बैठा जैसे कोई शहंशाह बैठता है । ये देखिए:
IMG0034A'बीन-बैग' पर मैंने कुछ और अदाएं दिखाई हैं । जिन्‍हें आप मेरे तस्‍वीरों के ब्‍लॉग 'जादुई तस्‍वीरें' पर देख सकते हैं । मैंने तय किया है कि 'जादुई-तस्‍वीरें' पर आपको अपनी तस्‍वीरें नियमित रूप से दिखाता रहूंगा । ठीक है ना ।


अरे हां, पता है उस दिन डॉक्‍टर मामा ने अपने और 'जादू नंबर एक' और 'जादू नंबर दो' के खिलौनों की तस्‍वीरें भेजी थीं । जादू नंबर एक और दो तो समझ गए ना आप, डॉक्‍टर मामा के बेटे हैं ये । मुझे पुराने ज़माने के खिलौने देखकर बहुत अच्‍छा लगा । आप भी देखिएगा । सारी तस्‍वीरें मैंने 'जादुई-तस्‍वीरें' पर लगा दी हैं । झलक के तौर पर ये दो तस्‍वीरें देखिए । ये लकड़ी के खिलौने हैं । और इस पहली वाली तस्‍वीर में 'एयर इंडिया' के महाराजा कैसे ऊपर वाले से पनाह मांग रहे हैं । ज़रूर जादू नंबर एक या दो ने उनके साथ कोई ज़ुल्‍म किया होगा ।


Toys-35जब मैंने डॉक्‍टर मामा को ये बात बताई तो उन्‍होंने फौरन 'महाराजा' का ऑपरेशन कर दिया । सर्जन हैं ना, इसलिए इस सब में माहिर हैं मेरे डॉक्‍टर मामा । ये देखिए महाराजा फिर से अपनी 'अदा' में आ गए हैं । Maharaja
ऐसे कई खिलौनों की तस्‍वीरें भेजी है डॉक्‍टर मामा ने । सबकी सब 'जादुई-तस्‍वीरें' पर
हैं । जरूर देखिए और बताईये आपको क्‍या याद आया इन्‍हें देखकर । पता है मुझे देखकर तो मेरे मम्‍मी-पापा को अपना बचपन याद आता ही रहता है पर इन्‍हें देखकर तो उन्हें अपना बचपन और भी याद आ गया । वो कह रहे थे कि बरसों बाद लकड़ी के खिलौने देखने को मिले हैं उनको । पता है मेरे पापा भी ऐसे खिलौनों से बहुत खेले हैं और मम्‍मी भी । वो कह रहे थे कि तब तो मिट्टी के खिलौने भी होते थे । लेकिन आज मेरी जनरेशन के बच्‍चों को तो प्‍‍लास्टिक और रबर के खिलौनों से खेलना पड़ता
है । या फिर इलेक्‍ट्रॉनिक खिलौनों से ।

पापा कहते हैं कि बंदूकें, तोपें, युद्ध वाली गाडियां, मार-काट मचाने वाले 'पावर रेन्‍जर्स' आज के प्रतिनिधि खिलौने बन गये हैं । जबकि पहले बच्‍चों के मन पर 'हिंसा' की छाया भी नहीं पड़ने दी जाती थी । मम्‍मी कहती हैं कि वो बड़े धूम-धाम से अपनी कपड़े की बनी गुडिया और गुड्डे की शादी कराती थीं और घर पर बढिया खाना-वाना बनता था । धूम-धाम होती थी । आज की बार्बी-डॉल से पता नहीं क्‍यों उन्‍हें उतना जुड़ाव नहीं हो पाता है । सच्‍ची, ये सब मेरी मम्‍मी कहती हैं । अच्‍छा अब बस कीजिए । मम्‍मी पापा की सारी बातें सुनकर आपको थोड़ी बताऊंगा । बस आप इतना बता दीजिए कि आपको अपने बचपन के कौन-से खिलौने याद आते हैं ।


आपने मेरे ब्‍लॉग 'जादुई-तस्‍वीरें' पर बिल्‍ली-मौसी की तस्‍वीरें तो देख ही ली होंगी । इसलिए आज मैंने सोचा कि मैं आपको बिल्‍ली-मौसी का एक गाना सुनवा दूं । ये लीजिए सुनिए और मेरे साथ गाईयेगा भी । ठीक है ना


छुपाछुपी ओ छुपी आगड़-बागड़ जाई रे
चूहे मामा ओ मामा भाग बिल्‍ली आई रे
बिल्‍ली बोली म्‍याऊं काहे घबराओ
मैं तो चली काशी गले मिल जाओ
मत हम को बना अरी मौसी
तेरे दिल में जरूर है काला
किसी और को दिखला जाके
ये जोग, ये कंठी माला
राम का नाम लो, आंख से काम लो
कल जो हुआ था भूल जाओ भूल जाओ ।


छुपा छुपी ।।
मैं तो राम की जोगन अपना परलोक सुधारन जाऊं
आखिर तो बुढ़ापा ठहरा अब लौट के आऊं ना आऊं
दांत भी तेज़ तेरे, पंजे भी तेज़ हैं
मन में वही है दांव लगे तो लगाओ
छुपा छिपी ओ छिपी आगड़-बागड़ जाई रे ।।









अच्‍छा अब मैं चला.....पलटी खाकर मस्‍ती करने ।

10 comments:

रंजन said...

ओये जादू.. जादूई तस्वीर पर कुछ नहीं है....

जादू.... jaadoo said...

रंजन अंकल मैं अभी काम कर रहा हूं । पांच मिनिट में आ जायेंगी तस्‍वीरें । हो सकता है कि आज वाला गाना नहीं बजे । नया हूं ना । कुछ गड़बड़ हो रही है । थोड़ा रूकिये फिर जाईयेगा जादुई तस्‍वीरों पर ।

जादू.... jaadoo said...

रंजन चाचा अब सब ठीक है । पहुंचिए जादुई तस्‍वीरों पर ।

‘नज़र’ said...

हम्म बहुत बढ़िया जादू!

महामंत्री - तस्लीम said...

Bahut sundar.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Anonymous said...

जादू बेटे,लगता है मामा से कुछ ज़्यादा ही प्यार है । पहला गाना सुनवाया तो उसमें भी मामा !

लेकिन अगर मामा जी चूहा हैं तो फिर बिल्ली कौन है ? :-D

Dhiraj Shah said...

जादु की तरह जादु की तस्वीर भी जादु है।

मामा जी said...

"...तो फिर बिल्ली कौन है ? :-D? "
*****************************
अरे भई,जादू की मामी जी ; और कौन ?
(हे भगवान ! कैसे-कैसे लोग भेज दिये हैं इस दुनिया में,जो इतना भी नहीं समझते)
मुसीबत तो यह है कि यह बिल्ली हमें छोड़कर काशी भी नहीं जाती,क्योंकि काशी में अपना घर-द्वार,परिवार छोड़कर ख़ुदै सालों से प्रयाग आई हुई है - हमरे साथ रहने ।
ऊपर से काम-धन्धा कुछ ऐसा कि घर तो घर,बाहर भी हमारी जान नहीं बचती इससे(कुछ-कुछ जादू के मम्मी-पापा जैसा मामला है)!
:-(

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

वाह वाह!! जब काशी जायेंगे तो मौसी जी से जरूर मिलेंगे!

सागर नाहर said...

बाबू हमारे लिये तो बचपन में कपड़े की गुड़िया बनती थी जिसे हम ढुल्ली कहते थे, वैसी गुड़िया से आनन्दी (बालिका वधू) भी खेला करती है, और हां गेन्द भी कपड़े की बनती थी जिसे हम दड़ी या दड़ा कहते थे।
बड़े मजे थे बचपन में हमारे।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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