27 July 2009

खीर पकाई जतन से और भैया सो जा बारे बीर

कल संडे था ना । पता है कल मेरे ब्‍लॉग को एक हफ्ता पूरा हो गया । कल तो मैंने सुबह से ही बहुत मस्‍ती की । ये देखिए सुबह-सुबह मैंने सोचा कि 'बेड' से 'जंप' मार दूं तो कैसा रहे । मम्‍मी-पापा की पैनी नज़र रहती है इसलिए मैं ऐसा नहीं कर पाया । IMG_3364-1और हां, पता है, कल मेरी 'खीर-चटाई' हो गई । डॉक्‍टर मामा और डॉक्‍टर अंकल सबने कहा था कि पांचवे महीने से मुझे solid food दिया जा सकता है । हमारे देश में नन्‍हे-मुन्‍नों को सबसे पहले मीठा खिलाने की परंपरा है । कल मेरी मम्‍मी ने इत्‍ती बढिया खीर बनाई कि क्‍या कहूं । पहले तो मुझे सिर्फ 'दूध' का स्‍वाद पता था । अब मुझे ये भी पता चल गया कि खीर का स्‍वाद कैसा होता है । ये  देखिए मम्‍मी ने कैसे चांदी की कटोरी में खीर रखी थी मेरे लिए ।  IMG_3475-1 जब खीर मेरे मुंह में गई और मुझे उसका मीठा स्‍वाद मिला तो मैं उछल पड़ा और उसके बाद मुझे लगा कि एक साथ पूरी खीर क्‍यों नहीं दी जा रही है । एक एक चम्‍मच करके क्‍यों दे रही हैं मम्‍मी ।
IMG_3462-1सब खा-पीके मैंने सोचा कि थोड़ा आराम कर लिया जाए । मम्‍मी मेरे लिए नया तकिया लाई हैं ना । ये देखो :  IMG_3428-1और हां कल रात कविता वाले डॉक्‍टर मामा ने मुझे कुछ कविताएं भेजी हैं । उन्‍होंने कहा कि खीर-चटाई थी तो ज़रा अमीर ख़ुसरो की ये पंक्तियां पढ़ो । 

खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।

कल उन्‍होंने मुझे अपने 'मंथली बर्थडे' पर ये कविता भी भेजी है । मेरे पापा को लगता है कि ये कैलाश गौतम की कविता है ।

जन्म दिन बेटे तुम्हारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
साथ लाया नया सूरज
और बीता कल हमारा
देर तक देखा निहारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
("बेटे" की जगह "जादू" पढ़ना )
फिर हमारे खून ने ही
हमें बिन बोले पुकारा
उठी गंगा की लहर सी
झिलमिलाती भावधारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
मन हुआ फिर मिले हमको
ज़िन्दगी अपनी दुबारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा
"माँ" तुम्हारी "खीर" सी महकी फिरी
हुई दादी बीच हलुए के, गरी
नाव जैसे पा गयी फिर
भंवर में खोया किनारा
सजी टोली की दुआएँ
टँका अक्षत का सितारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा ।


फिर डॉक्‍टर मामा ने मेरी मम्‍मी के लिए एक लोरी भी भेजी है । वो भी आपको पढ़नी ही पढ़ेगी । क्‍या पता आप लोगों के काम भी आ जाए । मेरे काम तो आने ही वाली
है । पक्‍का ।

भैया सो जा बारे बीर
बीर की निंदिया लागी, जमनाजी के तीर
आम से बांदो पालनों, पीपर से बांदी डोर
जों लो भैया सोवन न पाए, टूट गई लमडोर
अब नें रोओ मोरे बारे बीरन नैनन बह गए नीर
जब तक मोरो भैया सोहे झपट बनेंहो खीर
ताती-ताती खीर बनैहें ओई में डारहैं घी
बाई खीर जब भैया खैहें ठंडो परहै जी

अब कोई इत्‍ती लोरी सुनाए तो भला मुझे नींद कैसे नहीं आयेगी । गुड नाईट । मेरा मतलब गुड-डे । neend आप भी अपनी बात कहिए और सो जाईये ।

11 comments:

Anonymous said...

सच है; बस अमीर ख़ुसरो तक ही पहुंच सकते हैं तुम्हारे पापा !

"कैलाश गौतम" सही जवाब नहीं है ।

तीसरी वाली के जवाब में तो तुमसे अपने ऊपर छू-छू कलवाने का पूरा इन्तज़ामै किये बैठे हैं ।

मुल्ला की दौड़ मस्ज़िद तक । फिर पकड़ो अपने "उड़न-तश्तरी " जी को - सही जवाब के लिये !

- "वही"

जादू.... jaadoo said...

डॉक्‍टर मामा पापा कह रहे हैं कि ये जो जन्‍मदिन वाली कविता है ये तो शायद यश मालवीय जी की है । पर ये नीचे वाली लोरी का नहीं पता ।

जादू.... jaadoo said...

डॉक्‍टर मामा पापा कह रहे हैं कि बहुत मुमकिन है कि ये एक पारंपरिक बुंदेली लोरी हो ।

Anonymous said...

अब आये हैं पापा लाइन पर !

छू-छू का डर ऐसा ही होता है; सच्ची !!

:-)

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

किसकी है से क्या मतलब? जादू को बढ़िया लगी तो उसका कापी राइट! बुद्धिमान लोग इत्ता भी न समझते!

Udan Tashtari said...

सही पहचाना जादू-यश मालवीय जी की ही है यह रचना..

Dhiraj Shah said...

जादु की खीर अच्छा लगा।

रंजन said...

जादू..

बहुत प्यारी कविता.. मंथली बर्थडे की बिलेटेड शुभकामनाऐं..

प्यार..

PD said...

are, 2 din ho gaye aur Jadoo bete ka koi ata-pata nahi hai.. Kahan hain Jadoo ji?

Anonymous said...

Ritvik
are jadoo akele khir khaliae.aur mughe nahi pucha. aur ha tum khatro ke khiladi me kyon nahi jate.

सागर नाहर said...

आँखों में क्या जी...गज़ब की शैतानी!
पहली वाली तस्वीर में साफ दिख रहा है कि बड़े होकर आप कितने शरारती बनने वाले हो, पापा मम्मी को दिन रात दौड़ाने वाले हो।

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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