26 July 2009

जादू, डॉक्‍टर मामा और समीर अंकल की कवितागिरी

आज मेरा मंथली बर्थडे है ।
आज मुझे खीर चटाई जाने वाली है । देखिए ना देखते ही देखते मैं पांच महीने का हो गया । अभी-अभी ही तो मैं पैदा हुआ था और अस्‍पताल के पालने पर ऐसे लेटा हुआ था । या मुझे देखने आने वालों की गोद में सो रहा था । ये देखिए । बिना फ्लैश के खींची फोटो है ये । मेरे शुरूआती दिनों में फ्लैश लगाकर तस्‍वीरें खींचने की इजाज़त नहीं थी ।
jaadoo first day fotos_008फिर जब मैं अपने घर पर आ गया ना, तो अभी-अभी की ही बात है जब मैं सोते-सोते 'इस तरह' से मुस्‍कुरा रहा था । और मेरे पापा ने मेरी तस्‍वीर खींच ली थी । आप सोचेंगे कि ये मैं आंखें खोलकर कैसे सो रहा हूं । 'जादू' हूं ना ....मैं कुछ भी कर सकता हूं ।
IMG_2335एक दिन मैंने आपको अपने नन्‍हे-दोस्‍तों से मिलवाया था ना । 'टेडी-बेयर' मेरा सबसे अच्‍छा दोस्‍त है । हर वक्‍त वो मेरे साथ ही रहता है । देखिए एक दिन मैं सो रहा था तो टैडी-बेयर सबको शांत कर रहा था । सबको बोल रहा था 'श्‍श्‍ाशशश' मेरा जादू सो रहा है--चुप रहिए । bearफिर एक दिन मैं नहा के निकला तो मम्मी ने मुझे गुलाब का फूल बना दिया । उस दिन तो मुझे बड़ा मज़ा आया था । सच्‍ची । ये देखिए ।
roseअरे हां । पता है सागर नाहर अंकल की पोल खोल दी थी ना मैंने उस दिन । उसके बाद वो नाराज़ हो गए और कहने लगे--

किट्टा, किट्टा, किट्टा
पूरी चैट सबको बता दी ना, जाओ अब हम आपसे बात नहीं करेंगे.. हम आपकी चाची से पिटते हैं यह सब को क्यों बताया ?

अब देखो हम भी आपकी सारी बातें सबको बता देंगे,... यह भी कि जादूजी इत्ते बड़े यानि तीन महीने के हो कर अब तक नैपी गीली करते हैं... बिस्तर में छु- छु करते हैं.. और .. और.. मम्मी पापा के कपड़े गन्ने करते हैं।

किट्टा- किट्टा- किट्टा.. देखो अब मनाना मत वर्ना मैं मान जाऊंगा ।


लो अब सागर अंकल गुस्‍सा हो जाएंगे तो हैदराबाद में मेरी आव-भगत कौन करेगा । BBMAIN वैसे भी मेरे मम्‍मी-पापा को चारमीनार वाला ये शहर बहुत पसंद है । इसलिए सागर  अंकल को मैं मना रहा हूं । उनसे 'सॉरी' नहीं कहूंगा । मैं उनसे कह रहा हूं कि अंकल अब से तय रहा....जब भी आप मुझसे फोन पर बातें करेंगे या फिर जब भी आप मुझे मेल करेंगे या कोई कमेन्‍ट करेंगे यहां पर..........तो मैं सबको बताऊंगा/नहीं बताऊंगा/बताऊंगा/नहीं बताऊंगा । समझ गए ना । अब तो मान गए ना अंकल । मान जाईये वरना आपके ऊपर 'छू-छू' कर दूंगा हां ।

कल मेरे डॉक्‍टर मामा की एक चिट्ठी आई है । इस चिट्ठी के ज़रिए मामा ने 'समीर अंकल' को बुरा फंसा दिया है । पता नहीं समीर अंकल अब क्‍या करेंगे । मुझे कोई चिट्ठी आए और मैं सबको ना पढ़वाऊं । भला ऐसा कैसे हो सकता है । तो लीजिए पढिये डॉक्‍टर मामा ने क्‍या लिखा है ।
  

प्यारे-प्यारे जादू !

अब जब तुम्हारे ब्लॉग पर  हमारी मामागिरी पूरी तरह से शुरू हो ही गयी है, तो हमें ख़ुद अपने एक मामा जी की याद आ गयी है। मज़े की बाद यह कि वो तुम्हारे भी मामा ही हैं। है न अजीब बात ?
अरे ; हमारे-तुम्हारे क्या,वो तो तुम्हारे मम्मी-पापा के भी मामा हैं।

तो यह मामा जी भी जब तुम्हारे जितने बड़े थे, तो एक दिन अपनी मम्मी के पीछे पड़ गये थे । इस बात की याद हमें तुम्हारी एक फ़ोटो में तुम्हारे पहने कपड़े देखकर आयी :


हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला ।

सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ ।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कोई कुर्ता ही को भाड़े का ।

बच्चे की सुन बात, कहा माता ने अरे सलोने`
कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने ।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ ।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा ।

घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी होता है
नहीं किसी की भी आँखों को तू दिखलाई पड़ता है ।

 


अब तू ही यह बता नाप तेरी किस रोज़ लिवाएँ

सी दें एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन पे आये ।



अपनी टिप्‍पणी में 'कविता वाले डॉक्‍टर मामा' ने 'समीर अंकल' को ये कहके फंसा दिया है ।


ई तो गजबै हो गया !
तुम्हारे समीर अंकल उर्फ़ "उड़न तश्तरी" तो जब पैदा भी नहीं हुए थे, तब हमने सुनी थी यह कविता । उन्हें कब और कहाँ सुनने-पढ़ने को मिल गयी ?
....ख़ैर, वैसे भी हिसाब-किताब,बहीखाता वाले आदमी हैं,सो साथ में कविताओं का हिसाब-किताब भी रख लेना कोई बड़ी बात नहीं । तारीफ़ तो तब भी हमारी ही है,जो रोज़ इतने ख़ून-ख़राबे के बीच आधी सदी बाद भी यह पूरी की पूरी याद है हमें ।

जो भी हो,सही जवाब देकर तुम्हारे "उड़न तश्तरी" अंकल (यूँ इस नाम से तो आण्टी लगते हैं ) वाकई फँस गये हैं । अब यह भी बताएँ कि चिड़िया वाली कविता किसने लिखी थी(और हमने तुम्हें जो सुनाई उसमें कहाँ-कहाँ गलतियाँ थीं) ,तो हम वाकई मान जाएँ उनको !


देखो
'समीर चाचा' अब चैलेन्‍ज मिल ही गया है तो चाहे जितना समय लगे, अपन को जवाब देना ही है और वो भी सही-सही । है कि नहीं । अच्‍छा तो मैं चलता हूं । आज मेरी 'खीर-चटाई' जो है । बाय-बाय ।

16 comments:

रंजन said...

खीर चाटो.. फिर आओ..थोड़ी हमारे लिये भी..

ओम... said...

BADHIYA HAI .....KYA BAAT KAR RAHE HO

संगीता पुरी said...

बधाई हो !!

Nirmla Kapila said...

ररे हमारे लिये खीर नहीं रखी क्या? तो हमारी भी कुट्टी हा हा हा चलो आशीर्वाद फिर भी दे देती हूँ खीर खा खा कर जल्दी से बडे हो जाओ और नाम कमाओ सदा सुखी रहो खीर चटाई की बधाई

सैयद | Syed said...

खीर.... कहाँ है खीर ... मुझे भी खाना है...

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

मंथली बर्थ डे पर बधाई ठीक है अभी से खूब खीर खाओ और खुश रहो .सैयद जी को खीर जरुर खिलवा देना ...

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

Badhai ho

Anonymous said...

आज हम यहाँ जरा देर से आये न, इसलिये अब जाकर पता चला ।
कोई बात नहीं, बिलेटेड हैप्पी "मंथली बर्थडे" ऐण्ड "खीर चटाई" !
तो इस बार लो तीन कविताएँ ( एक तो हमारा रोज़ाना का कोटा और बाकी दो आज के इस दोहरे मौके पर स्पेशल !! )
१. पहली :(वैसे तो काफ़ी लम्बी है; पर तुम्हारी नाप के हिसाब से शॉर्ट-कट किये दे रहे हैं )

जन्म दिन बेटे तुम्हारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
साथ लाया नया सूरज
और बीता कल हमारा
देर तक देखा निहारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा
("बेटे" की जगह "जादू" पढ़ना )

फिर हमारे खून ने ही
हमें बिन बोले पुकारा
उठी गंगा की लहर सी
झिलमिलाती भावधारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा

मन हुआ फिर मिले हमको
ज़िन्दगी अपनी दुबारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा

"माँ" तुम्हारी "खीर" सी महकी फिरी
हुई दादी बीच हलुए के, गरी

नाव जैसे पा गयी फिर
भंवर में खोया किनारा
सजी टोली की दुआएँ
टँका अक्षत का सितारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा

२. दूसरी वाली तो एक लोरी है । जब नींद न आये तो मम्मी से सुनना और बिन खाये रोज़ खीर का मज़ा लेना :

भैया सो जा बारे बीर
बीर की निंदिया लागी, जमनाजी के तीर
आम से बांदो पालनों, पीपर से बांदी डोर
जों लो भैया सोवन न पाए, टूट गई लमडोर

अब नें रोओ मोरे बारे बीरन नैनन बह गए नीर
जब तक मोरो भैया सोहे झपट बनेंहो खीर
ताती-ताती खीर बनैहें ओई में डारहैं घी
बाई खीर जब भैया खैहें ठंडो परहै जी

३.तीसरी भी लगे हाथ सुन ही लो :

खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।

और इस बार किसी "उड़न तश्तरी"-वश्तरी के चक्कर में मत पड़ना । तुम्हारे पापा जानते हैं इस बार के तीनों ही कवियों के बारे में ! अगर न बताएँ, तो इस बार उनके ऊपर ही शू-शू कर देना ।
टा-टा !!!
तुम्हारे "वही"

Udan Tashtari said...

आज वाली कविता तो फिर दिनकर जी की ले आये मामा...लगता है दिनकर जी उनके प्रिय कवि रहे होंगे और सुभद्रा कुमारी चौहान भी..चिड़िया वाली कविता पढ़ई तो जरुर है. जरा दिमाग पर जोर डाल कर बतायेंगे:)

कविता तो बस यूँ ही याद है मगर जहाँ तक सुधार की बात है, जो मुझे याद आता है:

सबसे पहले अण्डे जैसा मेरे घर का था आकार,
तब मैं यही समझती थी बस , इतना सा ही है संसार |
फ़िर मेरा घर बना घोंसला , सूखे तिनकों से तैयार |
तब मैं यही समझती थी बस , इतना सा ही है संसार |
फ़िर मैं निकल गयी शाखों पर , हरी भरी थी , जो सुकुमार |
तब मैं यही समझती थी बस , इतना सा ही है संसार |
उड़ी जब मैं आसमान में , दूर तलक ये पंख पसार |
तब मेरी समझ में आया , बहुत बड़ा है यह संसार...


--बस, याददाश्त से लिखा है..मामा से कनफर्म करना जरा कि उन्हें भी यही कुछ याद आ रहा है क्या??

Anonymous said...

ई तो औरे सत्यानाश कर दिये हैं तुम्हारे "उड़न तश्तरी" जी चिड़िया वाली कविता का !
ख़ुद इतने बड़े कवि हैं और छ्न्द-मात्रा तक का ज्ञान नहीं ? जय हो !
उनसे तो हमही भले !!
- "वही"

PD said...

अरे, तुम्हारे कविता वाले मामाजी तो सबको मामू बनाने लग गये हैं.. :)

सागर नाहर said...

खीर खानी तो आती ही नहीं आपको, जब मुंह में चम्मच दिया तो कैसा मुंह बिगाड़ा मानो खट्टी चीज दे दी हो, हां यह बात अलग है बाद में खूब चटखारे लिये आपने।
आपके जन्मदिन की खूब खूब बधाई हो जादूजी।
अरे हां एक बात तो कहना भूल ही गया, उस फोटो में वाकई आप गुलाब का फूल ही लग रहे हो।

सागर नाहर said...
This comment has been removed by the author.
सागर नाहर said...

अरे मैं भी कितना भुलक्कड़ हूं, एक बात तो कहनी रह ही गई, और वह यह कि सागर अंकल की मस्का पालिश किसलिये हो रही है भई?
कम से कम हैदराबाद आने पर आवभगत ना करने का डर तो नहीं; मुझे लगता है कि कहीं सागर और पोल ना खोल दें इसका डर तो नहीं?
:)

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

अरे, पहली फोटो तो नत्तू पांड़े जैसी है!

Anonymous said...

"अरे, तुम्हारे कविता वाले मामाजी तो सबको मामू बनाने लग गये हैं.. :)" - PD
**********************
अब आपौ मुसीबत बुलाय रहे हो !
फ़िलहाल इसका जवाब हम बाद में देंगे; कभी ज़रा फ़ुर्सत से !!
- "मामा" ( जादू के )

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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