25 July 2009

डॉक्‍टर मामा या कविताओं का ख़ज़ाना

अरे कल बड़ा मज़ा आया । पता है...मैंने उस दिन इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा की भेजी कविता आपको पढ़वाई थी ना । जिसका शीर्षक था--'मैं यही समझती थी बस इतना है संसार । इसके बाद डॉक्‍टर मामा ने मुझे बड़ी मज़ेदार बातें लिखी हैं । सबसे पहली बात तो ये है कि जो भी मुझसे कुछ कहता है या मुझे कुछ लिखता है, उसे मैं अपने ब्‍लॉग के ज़रिए सबको बता देता हूं । कल सागर अंकल से की गयी चैट मैंने सबको पता दी । ही ही ही । कित्‍ता मज़ा आया ना । इसके बाद डॉक्‍टर मामा ने मुझे ये लिखा---


हमारी पहली  चिट्ठी भी तुम सबको पढ़वा दोगे। अब तो हमें  बहुत ही डर लगने लगा है - तुमसे । हम तुम्हें कुछ लिखें-बताएँ,तो पता नहीं कब तुम्हारा मन करे और तुम सारी दुनिया को पढ़वा दो।

हमने तो कहीं अपना नाम तक नहीं लिखा था, क्योंकि मालूम था तुम तो समझ ही लोगे ,पर तुम तो लगे बाकी सबके सामने हमारी पोल खोलने । लेकिन क्या करें, तुम्हें लिखे बिना हमारा मन भी तो नहीं मानता । तो अब से हम वही बातें तुम्हें लिखेंगे ,जो तुम दूसरों को बता भी दो, तो  हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।

लगता है चिड़िया वाली कविता तुम्हें कुछ ज़्यादा  ही पसन्द आ गयी और दूसरों को भी । लोग हमें "कविता वाले मामा" भी कहने लग गये हैं । ठीक है यही सही ; अब से हम समय-समय पर तुम्हें यहाँ कविताएँ ही सुनाया करेंगे; ज़्यादातर वही जो हमने अपने बचपन में पढी-सुनी थीं । 


डॉक्‍टर मामा का ये जवाब मुझे बड़ा पसंद आया है । अरे इत्‍ती बढिया कविताओं की 'जुगाड़' जो लग गयी है । मेरे प्‍यारे-प्‍यारे डॉक्‍टर मामा ने मेरे बचपन को कवितामय बना दिया है । इसलिए जब उनसे मिलूंगा तो उनके गाल पर बहुत सारा प्‍यार करूंगा । सच्‍ची Tongue


अच्‍छा तो अब आपको बता दूं कि कल मैं अपने कमरे के लिए परदे ख़रीदने गया तो मैंने अपनी कौन-सी अदा दिखाई थी । कल थोड़ा ठंडा मौसम था ना इसलिए मम्‍मी-पापा मुझे एकदम 'तैयारी' से ले गए थे । ये देखिए :
ghoomnaaअब ज़रा डॉक्‍टर अंकल की चिट्ठी और उनकी टिप्‍पणी का मिला-जुला रूप पढिये ।

 


प्यारे-प्यारे जादू,

तुम्हारे दोस्तों से मिलकर बड़ा मज़ा आया । जब हम तुम्हारे जितने बड़े थे, तो हमारे भी कई ऐसे दोस्त तो थे ही ; साथ ही कई चलते-फिरते दोस्त भी थे । उनमें से हमारा बहुत प्यारा एक ख़रगोश भी था,जो अपने पूरे परिवार के साथ हमारे साथ रहता था और हमारे साथ ख़ूब खेलता था। उसके साथ हमने अपनी पहली सालगिरह पर एक तसवीर भी खिंचवाई थी, जो हम यहाँ तो नहीं लगा पा रहे हैं,लेकिन तुम्हें अलग से भेज दे रहे हैं :
Neeraj - First B'Day ( बताईये ज़माना कित्‍ता बदल गया है । डॉक्‍टर मामा असली ख़रगोश से खेलते थे और मैं नकली खिलौनों से । इस तस्‍वीर में तो डॉक्‍टर मामा मेरे जैसे लग रहे हैं ना
--जादू )


चिड़िया की तरह ही उस ख़रगोश ने भी हमें एक कविता सुनाई थी । लो सुनो : 


वन में एक घनी झुरमुट थी, जिसके भीतर जाकर

खरहा एक रहा करता था, सबकी आँख बचाकर।

फुदक-फुदक फुनगियाँ घास की,चुन-चुन कर खाता था

देख किसी दुश्मन को, झट झाड़ी में छुप जाता था ।

एक रोज़ आया उस वन में, कुत्ता एक शिकारी

लगा सूँघने घूम-घूम कर, वन की झाड़ी-झाड़ी ।

आख़िर वह झाड़ी भी आयी, जो खरहे का घर थी

मग़र ख़ैर उस बेचारे की लम्बी अभी उमर थी ।

लगी साँस कुत्ते की जो, खरहा सोते से जागा

देख काल को खड़ा पीठ पर, जान बचाकर भागा ।rabbit

झपटा पंजा तान, मगर खरहे को पकड़ न पाकर
पीछे-पीछे दौड़ पड़ा कुत्ता भी जान लगा कर ।

चार मिनट तक खुले खेत में रही दौड़ यह जारी

किन्तु तभी आ गयी सामने, घनी कँटीली झाड़ी।

भर कर एक छलाँग खो गया, खरहा बीहड़ वन में

इधर-उधर कुछ सूँघ फिरा, कुत्ता निराश हो वन में ।

एक लोमड़ी देख रही थी, यह सब खड़ी किनारे 

कुत्ते से बोली मामा, तुम तो खरहे से हारे ।

इतनी लम्बी देह लिये हो, फिर भी थक जाते हो

वन के छोटे जीव-जन्तु को भी न पकड़ पाते हो ।

कुत्ता हँसा अरी दीवानी, तू नाहक बकती है

इसमें है जो भेद, उसे तू नहीं समझ सकती है ।

मैं तो केवल दौड़ रहा था, अपना भोजन पाने

लेकिन खरहा भाग रहा था अपनी जान बचाने।

कहते हैं सब शास्त्र, कमाओ रोटी जान लगा कर

पर संकट में प्राण बचाओ, सारी शक्ति लगाकर ।

यह कविता हमें इसलिये भी याद आयी कि इसमें भी एक "मामा" जी हैं। कौन; तुम समझे या नहीं ?

यह तो करीब पचीस  साल बाद जब हम बहुत बड़े हो गये, तब हमें पता चला कि यह कविता दरअसल लिखी किसने थी । ज़रा पूछकर देखो तो, तुम्हारे मम्मी-पापा बता पाते हैं क्या ?.... या तुम्हारे ब्लॉग पर कोई अंकल-आण्टी ?  हिन्ट के तौर पर इतना ही कि हिन्दी साहित्य के बहुत ही प्रसिद्ध कवि हैं वो !

अब तो तुम यह भी समझ ही गये होगे कि कहानी-कविताओं के अलावा बहुत सारी पहेलियाँ भी आती हैं हमें ! 


तो डॉक्‍टर मामा ने इस कविता के ज़रिए एक पहेली भी rit पूछ डाली

है । 


देखें आप लोग इसका जवाब दे पाते हैं या नहीं ।

अब मैं चला । आज मैं जा रहा हूं अपने ऋत्विक भैया के पास । ये मेरी मौसेरे भाई हैं । और इनका कल 'हैपी बर्थडे' था । मैं सोच रहा हूं बर्थडे उनका है और गिफ्ट भी अपने लिए मैं उनसे ही वसूल लूं । कैसी रही ।


12 comments:

रंजन said...

जादू..

तुम भी न आदि जैसे हो.. कोई चिट्ठी मिले तो फटाक से ब्लोग पर.. सारी बातें सभी से..

डॉ मामा भी बहुत प्यारे लग रहे है और खरगोश कि कविता भी.. जादू जी..लेकिन ये लेखकों के मामले में हम कच्चे है.. तुम बताओगे तो जान लेगें.. वैसे अभी समीर अंकल आते होगें.. बता देगें..

और ऋत्विक भैया को बधाई!!

तुम्हे प्यार..

ओम आर्य said...

bahut hi sundar

‘नज़र’ said...

अरे वाह, तुमसे मिलके सचमुच अच्छा लगा!
---
चाँद, बादल और शाम

Udan Tashtari said...

जादू

यह कविता रामधारी सिंग ’दिनकर’ जी की है.

पहेली हल हो गई. :)

Udan Tashtari said...

अपने ऋत्विक भैया को हमारी तरफ से भी जन्म दिन की बधाई दे देना.

Udan Tashtari said...

रामधारी सिंग ’दिनकर’ जी = रामधारी सिंह ’दिनकर’ जी


नाम ठीक किया है. :)

रंजन said...

देख जादू मैने कहा था न समीर अंकल आयेगें और तेरी पहेली चुटकी में हल हो जायेगी... क्यों आया मजा... बेटा वो सबसे बडे़ जादूगर है...समझ ले..

Anonymous said...

ई तो गजबै हो गया !

तुम्हारे समीर अंकल उर्फ़ "उड़न तश्तरी" तो जब पैदा भी नहीं हुए थे, तब हमने सुनी थी यह कविता । उन्हें कब और कहाँ सुनने-पढ़ने को मिल गयी ?

....ख़ैर, वैसे भी हिसाब-किताब,बहीखाता वाले आदमी हैं,सो साथ में कविताओं का हिसाब-किताब भी रख लेना कोई बड़ी बात नहीं ।
तारीफ़ तो तब भी हमारी ही है,जो रोज़ इतने ख़ून-ख़राबे के बीच आधी सदी बाद भी यह पूरी की पूरी याद है हमें ।

जो भी हो,सही जवाब देकर तुम्हारे "उड़न तश्तरी" अंकल (यूँ इस नाम से तो आण्टी लगते हैं ) वाकई फँस गये हैं । अब यह भी बताएँ कि चिड़िया वाली कविता किसने लिखी थी(और हमने तुम्हें जो सुनाई उसमें कहाँ-कहाँ गलतियाँ थीं) ,तो हम वाकई मान जाएँ उनको !

- "वही"

Dhiraj Shah said...

आज ही पहली बार आया और मुझपे जादु चल गया ।

सागर नाहर said...

शाबास जादूजी के डैडी..
इस बदमाश को तो इसी तरह लपेट कर रखना चाहिये..पर एक बात है बेटा बंधी हुई हालत में भी आप बहुत प्यारे लग रहे हो।
डॉक्टर मामा वाकई में बहुत अच्छी कवितायें सुनाते हैं।
:)

Anonymous said...

Ritvik :-congratulation! ajj tumhara bhi 5 ve mahine ka birthday he.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

चलो हम भी सुनाते हैं मुरगी मां की कविता:
मुरगी मां घर से निकली
झोला ले बाजार चली
बच्चे बोले चेंचेंचें
हम भी अम्मा साथ चलें?

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

Lilypie - Personal pictureLilypie Second Birthday tickers

  © Free Blogger Templates Spain by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP