22 July 2009

खुद भी नहाओ दोस्‍तों को भी नहलाओ ।

हमारे शहर में कितनी बारिश हो रही है, कुछ पता भी है आपको । paani
उस दिन पाब्‍ला अंकल परेशान थे
कि उनके शहर में बारिश रूक ही नहीं रही है । बारिश हो तो भी दिक्‍कत है और ना हो तो भी दिक्‍कत है । ये देखिए हमारे शहर की बारिश का एक नज़ारा मेरे कैमेरे से । ये फोटो मैंने ही खींची है । सच्‍ची । आप देख रहे हैं कितना पानी भर गया है सड़क पर । कितनी गंदगी हो गयी है । छी छी ।

अरे हां, कल मैंने सोचा कि रोज़ की तरह खुद तो नहा लूं अपने दोस्‍तों को भी नहला
दूं । तो आईये आपको मिलवाऊं मेरे दोस्‍तों से । सबसे पहले मैंने नहलाया अपने teddy bear को । उसके बाद वो बेचारा इत्‍ता भारी हो गया कि मुझसे उठा ही नहीं । मम्‍मी ने उसे उठा के गैलेरी पर रख दिया । आज भी वो गैलेरी पर ही बैठा है । IMG_3277
उसके बाद बारी आई  डोनाल्‍ड

डक और उसके दो दोस्‍तों की । लेकिन वो तो नहाना ही नहीं चाहते थे । गंदू कहीं के । मैंने उन्‍हें ज़ोर से डांट लगाई और कहा कि आज मेरे साथ नहाना ही होगा । वरना मैं तुम लोगों से बात नहीं करूंगा । इसके बाद इन लोगों को भी सूखने के लिए खिड़की पर रख दिया । ये देखिए :
duck
इसके बाद बारी आई मेरे दो और दोस्‍तों की । इनके नाम है फ़रू और सीधू । मम्‍मी इन्‍हें मेरे पैदा होने के पहले से ही घर ले आईं थीं ।  जब मैंने अपने इन दोस्‍तों से कहा कि चलो चलो तुम भी नहा लो....तो बाईं ओर जो लाल वाला 'सीधू' है ना इसने कहा कि मुझे तो सर्दी-जुकाम हुआ है और दाहिनी तरफ वाले 'फरू' ने कहा कि उसे तो बुख़ार है । कित्‍ते बहानेबाज़ हैं ना ये लोग । चलो इस बार तो बच गए, अगली बार इन दोनों को शावर में नहलाऊंगा ।

IMG_2173आप सोच रहे होंगे कि मैंने इत्‍ती सारी बातें कीं लेकिन इस बात का क्‍या सुबूत है कि मैं नहाता हूं रोज़-रोज़ और मुझे पानी से खेलने में कितना मज़ा आता है । ये देखो, नहाने के बाद की मेरी अदा ।
IMG_3311और हां....मैंने तय कर लिया है कि सागर अंकल से उस दिन मेरी जो 'चैट' हुई थी...वो आप सबको पढ़वा दूंगा । और हां इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा की चिट्ठी भी तो है जो मुझे आपको पढ़वानी है । तो आते रहिएगा 'जादू' की दुनिया में । अब मैं चला अंगूठा चूसने । बाय बाय । 

9 comments:

रंजन said...

अंगुठा बाहर निकाल.. जादू.. तुम्हारा नाम बहुत प्यारा है.. और तुम्हारी मुस्कान के क्या कहने..

प्यार..

सैयद | Syed said...

Wah wah jaadu ji,

barish me bheege ki nahi?

... Na na mazak kar raha hu... Mat bheegna.

mehek said...

aare aapke kitne pyare dost hai:)

PD said...

अरे जादू बेटे! अपने दोस्तों को नहलाकर खिड़की पर टांगना कहां से सीखे? क्या पापा-मम्मी भी तुम्हे नहलाकर खिड़की पर टांगते हैं?
संभलकर रहना, एक दिन कहीं तुम्हारे ये दोस्त तुम्हें जबरी नहलाकर खिड़की पर ना टांग दें.. :)

Udan Tashtari said...

अरे महाराज, जितने प्यारे आप, उतने ही प्यारे खिलोने भी. रंजन अंकल क्यूँ डांट रहे हैं...अंगूठा तो है ही नहीं मूँह में?

PD said...

@ Sameer ji - Ranjan ji bol rahe hain ki pahle angutha muh me dalo, phir use bahar nikalo.. :)

कुश said...

हर बारिश की अपनी एक अलग कहानी है... जादू डियर

Anonymous said...

प्यारे-प्यारे जादू,

तुम्हारे दोस्तों से मिलकर बड़ा मज़ा आया । जब हम तुम्हारे जितने बड़े थे, तो हमारे भी कई ऐसे दोस्त तो थे ही ; साथ ही कई चलते-फिरते दोस्त भी थे । उनमें से हमारा बहुत प्यारा एक ख़रगोश भी था,जो अपने पूरे परिवार के साथ हमारे साथ रहता था और हमारे साथ ख़ूब खेलता था। उसके साथ हमने अपनी पहली सालगिरह पर एक तसवीर भी खिंचवाई थी, जो हम यहाँ तो नहीं लगा पा रहे हैं,लेकिन तुम्हें अलग से भेज दे रहे हैं । चिड़िया की तरह ही उस ख़रगोश ने भी हमें एक कविता सुनाई थी । लो सुनो :

वन में एक घनी झुरमुट थी, जिसके भीतर जाकर
खरहा एक रहा करता था, सबकी आँख बचाकर।

फुदक-फुदक फुनगियाँ घास की,चुन-चुन कर खाता था
देख किसी दुश्मन को, झट झाड़ी में छुप जाता था ।

एक रोज़ आया उस वन में, कुत्ता एक शिकारी
लगा सूँघने घूम-घूम कर, वन की झाड़ी-झाड़ी ।

आख़िर वह झाड़ी भी आयी, जो खरहे का घर थी
मग़र ख़ैर उस बेचारे की लम्बी अभी उमर थी ।

लगी साँस कुत्ते की जो, खरहा सोते से जागा
देख काल को खड़ा पीठ पर, जान बचाकर भागा ।

चार मिनट तक खुले खेत में रही दौड़ यह जारी
किन्तु तभी आ गयी सामने, घनी कँटीली झाड़ी।

भर कर एक छलाँग खो गया, खरहा बीहड़ वन में
इधर-उधर कुछ सूँघ फिरा, कुत्ता निराश हो वन में ।

एक लोमड़ी देख रही थी, यह सब खड़ी किनारे
कुत्ते से बोली मामा, तुम तो खरहे से हारे ।

इतनी लम्बी देह लिये हो, फिर भी थक जाते हो
वन के छोटे जीव-जन्तु को भी न पकड़ पाते हो ।

कुत्ता हँसा अरी दीवानी, तू नाहक बकती है
इसमें है जो भेद, उसे तू नहीं समझ सकती है।

मैं तो केवल दौड़ रहा था, अपना भोजन पाने
लेकिन खरहा भाग रहा था अपनी जान बचाने।

कहते हैं सब शास्त्र, कमाओ रोटी जान लगा कर
पर संकट में प्राण बचाओ, सारी शक्ति लगाकर ।

यह कविता हमें इसलिये भी याद आयी कि इसमें भी एक "मामा" जी है। कौन; तुम समझे या नहीं ?
यह तो करीब पचीस साल बाद जब हम बहुत बड़े हो गये, तब हमें पता चला कि यह कविता दरअसल लिखी किसने थी । ज़रा पूछकर देखो तो, तुम्हारे मम्मी-पापा बता पाते हैं क्या ?.... या तुम्हारे ब्लॉग पर कोई अंकल-आण्टी ? हिन्ट के तौर पर इतना ही कि हिन्दी साहित्य के बहुत ही प्रसिद्ध कवि हैं वो !

अब तो तुम यह भी समझ ही गये होगे कि कहानी-कविताओं के अलावा बहुत सारी पहेलियाँ भी आती हैं हमें !

- "वही"

Anonymous said...

अरे! बीच में कविता की दो लाइनें टाइप करने में छूट गयीं !!
(वैसे,उनके छूटने से कविता की कहानी में कोई ख़ास फ़र्क तो नहीं पड़ता,लेकिन सुनो तो फिर एक-एक लाइन पूरी सुनो;यार ! फिर यह भी तो पता चले कि हमें आज भी एक-एक लाइन पूरी याद है;कुछ भी भूला नहीं है । इन्हें कविता में सही जगह ख़ुद फ़िट कर लेना ):

"झपटा पंजा तान, मगर खरहे को पकड़ न पाकर
पीछे-पीछे दौड़ पड़ा कुत्ता भी जान लगा कर ।"

-"वही"

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

जादुई दिन

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