21 July 2009

डॉक्‍टर मामा की भेजी कविता : मैं यही समझती थी बस इतना है संसार

पता है मेरी पहली पोस्‍ट पर मेरे इलाहाबाद वाले डॉक्‍टर मामा ने एक टिप्‍पणी की जो मुझे बहुत पसंद आई है । डॉक्‍टर मामा ने इसमें एक चिडि़या की कविता लिखी है । आप भी पढिए ।

हम सबके प्यारे-प्यारे जादू !bird-photography

अपने मम्मी-पापा की दुनिया में आये तुम्हें अभी छ: महीने भी  नहीं हुए और तुम इस ब्लॉगिंग की दुनिया में भी आ गये !! अच्छा लगा । यहाँ भी तुम्हारा बहुत-बहुत स्वागत !!!
अब आगे हम क्या कहें ? ज़्यादातर तो और लोग कह ही चुके हैं ।
हाँ ,बात बार-बार दुनिया या संसार की हो रही है,तो आज हम इसी पर तुम्हें एक गीत सुनाते हैं ,जो हमें एक चिडि़या ने सुनाया था। बहुत पहले सुनाया था न, सो बहुत ठीक से याद तो नहीं,लेकिन कु्छ इस तरह था :

सबसे पहले अण्डे जैसा मेरे घर का था आकार,
तब मैं यही समझती थी कि बस इतना सा है संसार ।
फिर मेरा घर बना घोंसला नन्हें तिनकों से तैयार,
तब मैं यही समझती थी कि बस इतना सा है संसार ।
फिर मैं बाहर आयी फुदकी नन्हीं शाखों पर सुकुमार,
तब मैं यही समझती थी कि बस इतना सा है संसार ।
फिर मैं खुले गगन में पहुंची उड़ी दूर तक पंख पसार,
तभी समझ में मेरी आया बहुत बड़ा है यह संसार ।

संसार में तुम्हारी प्रसिद्धि को भी इसी तरह पंख लगें,इसी शुभकामना और स्नेह के साथ,
हम हैं
अरे "वही" ; और कौन ?

 

 

 


तो ये थी मेरे डॉक्‍टर मामा की भेजी कविता । आपको एक बात और बतानी है, डॉक्‍टर मामा ने ही मुझे अपने जीवन की पहली चिट्ठी भेजी थी । लेकिन वो फिलहाल मैं आपको नहीं पढ़ाऊंगा । अगर मेरा मन किया तो ज़रूर पढ़ा दूंगा पर अभी नहीं ।

आप बताईये आपको ये कविता कैसी लगी ।

6 comments:

रंजन said...

जादू की जादूई कविता.. बहुत अच्छी है...

प्यार..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही प्यारी कविता है यह ..

PD said...

उनको डा. मामा नहीं.. कविता वाले मामा बोलना..

सागर नाहर said...

बड़े अच्छे मामाजी हैं भई आपके तो...बड़ी अच्छी अच्छी कविताय़ें लिखते हैं।
कविता पढ़ कर हमें तो बड़ा मजा आया, आपको भी आया?
और चिट्ठी पढ़वाने का मन हुआ या नहीं? इतने अच्छे मामाजी चिट्ठी कैसी लिखते होंगे पढ़ने की उत्सुकता है।

Udan Tashtari said...

प्यारी कविता है..

Anonymous said...

प्यारे-प्यारे जादू,

तुमने तो भई, हमारी पूरी चिट्ठी ही उतार डाली है अपनी इस पोस्ट में । साथ ही यह भी कहा है कि हमारी पहली चिट्ठी भी तुम सबको पढ़वा दोगे। अब तो हमें बहुत ही डर लगने लगा है - तुमसे । हम तुम्हें कुछ लिखें-बताएँ,तो पता नहीं कब तुम्हारा मन करे और तुम सारी दुनिया को पढ़वा दो। हमने तो कहीं अपना नाम तक नहीं लिखा था, क्योंकि मालूम था तुम तो समझ ही लोगे ,पर तुम तो लगे बाकी सबके सामने हमारी पोल खोलने । लेकिन क्या करें, तुम्हें लिखे बिना हमारा मन भी तो नहीं मानता । तो अब से हम वही बातें तुम्हें लिखेंगे ,जो तुम दूसरों को बता भी दो, तो हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।

लगता है चिड़िया वाली कविता तुम्हें कुछ ज़्यादा ही पसन्द आ गयी और दूसरों को भी । लोग हमें "कविता वाले मामा" भी कहने लग गये हैं । ठीक है यही सही ;अब से हम समय-समय पर तुम्हें यहाँ कविताएँ ही सुनाया करेंगे; ज़्यादातर वही जो हमने अपने बचपन में पढी-सुनी थीं । वैसे हमें कहानियाँ भी ढेरों आती हैं । (हमारा भी) "मन किया" तो वो भी सुना दिया करेंगे।

ठीक ?

- "वही"

जादू क्‍यों

हम हैं जादू के मम्‍मी-पापा ।
'जादू' अपनी मुस्‍कानें लेकर आया है हमारी दुनिया में ।
हम चाहते हैं कि ये मुस्‍कानें हम दुनिया के साथ बांटें ।

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